Bhauma Pradosh 2024 Katha: भौम प्रदोष आज, अवश्य सुनें यह कथा, दूर होंगे कष्ट

Bhauma Pradosh 2024 Katha: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन मंगलवार होने से भौम प्रदोष का शुभ संयोग बना है। इस बार 15 अक्टूबर 2024 मंगलवार को भौम प्रदोष का संयोग बन रहा है। इस दिन रवियोग और सर्वार्थसिद्धि योग भी बन रहा है।

भौम प्रदोष का व्रत रखने से भगवान शिव के साथ हनुमानजी की कृपा भी प्राप्त होती है। इस दिन व्रत रखकर शिवजी का पूजन करें और भौम प्रदोष व्रत की कथा अवश्य सुनें।

Bhauma Pradosh 2024 Katha

ऐसी मान्यता है कि भौम प्रदो की कथा सुने या पढ़े बिना व्रत की पूर्णता नहीं होती और कथा सुनने वाले को किसी न किसी रूप में आकर हनुमान जी दर्शन अवश्य देते हैं।

चलिए जानते हैं इस व्रत की कथा-

प्राचीन काल की बात है। एक नगर में एक वृद्धा रहती ी। उसका एक पुत्र था जिसका नाम मंगल था। वह प्रत्येक मंगलवार को हनुमानजी का व्रत रखकर अपनी क्षमतानुसार उपलब्ध साधनों से हनुमानजी का पूजन किया करती थी। उन्हें भोग बनाकर अर्पित तरती थी। व्रत वाले दिन वह घर भी नहीं लीपती थी। जब वृद्धा को व्रत करते हुए कई वर्ष बीत गए तब हनुमानजी ने सोचा कि वृद्धा की परीक्षा ली जानी चाहिए।

हनुमानजी ने वृद्धा के घर जाने के लिए भौम प्रदोष का दिन चुना। व साधु का वेश बनाकर वृद्धा के द्वार पर जा पहुंचे और आवाज लगाई- इस घर में है कोई हनुमान का भक्त। पुकार सुनकर वृद्धा बाहर आई और साधु को देखकर बोली- कहिए महाराज आपकी क्या सेवा करूं। मेरी टूटी-फूटी झोपड़ी है, जो बन पड़ेगा करूंगी।

'मैं बहुत भूखा हूं, भोजन करना चाहता हूं'

साधु वेशधारी हनुमानजी बोले- मैं बहुत भूखा हूं, भोजन करना चाहता हूं। तू थोड़ी सी भूमि लीपकर उसे शुद्ध कर दे, हम उसी पर बैठकर भोजन बनाएंगे।

'आप भूमि लीपने के अतिरिक्त जो भी काम कहेंगे मैं करूंगी'

वृद्धा ने कहा- महाराज आज मैंने हनुमानजी का व्रत रखा है, आप भूमि लीपने के अतिरिक्त जो भी काम कहेंगे मैं करूंगी।

साधु ने वृद्धा के हाथों ही पुत्र की पीठ पर अग्नि जलवाई

इस पर साधु ने कहा- ठीक है फिर तू अपने पुत्र को बुला, मैं उसे औंधा लिटाकर उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा। यह सुनकर वृद्धा चौंक गई किंतु वह अपने वचन से मजबूर थी, इसलिए उसने पुत्र को बुलाया और साधु के हवाले कर दिया। साधु ने वृद्धा के हाथों ही पुत्र की पीठ पर अग्नि जलवाई। आग जलाकर वृद्धा दुखी मन से अपने घर के अंदर जाकर रोने लगी।

'महाराज अब उसे कैसे पुकारूं'

साधु ने भोजन बनाकर वृद्धा से कहा कि जा अपने पुत्र को भी पुकार ले भोजन करने के लिए। वृद्धा ने कहा- महाराज अब उसे कैसे पुकारूं। लेकिन साधु ने जोर डाला और कहा कि पुकार अपने पुत्र को।

वृद्धा ने पुत्र को पुकारा और पुत्र मंगल दौड़ता हुआ आया

साधु के कहने पर वृद्धा ने पुत्र को पुकारा और पुत्र मंगल दौड़ता हुआ, मुस्कुराता हुआ वृद्धा के सामने आ खड़ा हुआ। यह देख वृद्धा को आश्चर्य मिश्रित सुख प्राप्त हुआ। वह साधु के चरणों में गिर पड़ी और हनुमानजी ने उसे अपने असली रूप में दर्शन दे दिए।

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