कैरियर की अंधी दौड़ का शिकार हो रही युवा पीढ़ी
Student Suicide: ऐसे समय में जब देश में आम चुनाव की सरगर्मी चल रही है, उसी समय अलग अलग राज्यों में बारी बारी से बच्चों के दसवीं बारहवीं के रिजल्ट भी आ रहे हैं। जिनका रिजल्ट आ रहा है वो अभी देश के मतदाता नहीं हैं इसलिए उनके लिए चुनाव से ज्यादा जरूरी उनका अपना रिजल्ट है।
जो बच्चे दसवीं बारहवीं की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास करके कैरियर बनाने के लिए आगे बढ़ना चाहते हैं उनमें कुछ राजस्थान की कोचिंग सिटी कोटा भी पहुंच जाते हैं। 16-17 साल की कच्ची उम्र में जब उन्हें संसार की कोई खास समझ नहीं होती, जीवन के उतार चढाव का कोई खास अनुभव नहीं होता, उस आयु में वे कोटा पहुंचकर अपना कैरियर बनाने में जुट जाते हैं।

जो बच्चे अपनी इच्छा से ऐसा कर रहे हैं उनके सामने तो कोई समस्या नहीं है लेकिन जिन बच्चों की अनिच्छा के बावजूद उन्हें कोटा की कोचिंग फैक्ट्री में धकेल दिया जाता है, उनमें से हताश निराश कुछ बच्चे अपनी जीवनलीला को ही समाप्त कर देते हैं। बीते एक हफ्ते में फिर से दो बच्चों ने अपने मां बाप से क्षमा मांगते हुए अपनी जान दे दी। दोनों के मरने की एक ही वजह थी, कोचिंग की पढ़ाई के बोझ से दबी मासूम जानों का कहना था कि हमसे यह नहीं हो पायेगा।
भारत में कैरियर का प्रेशर एक महामारी की तरह फैल रहा है। जीवन जीने के लगभग सभी तरीकों को अप्रासंगिक घोषित करके सिर्फ कुछ तरीकों को सफलता का मानक घोषित कर दिया गया है। खासकर मध्यवर्ग के सामने आज जो सबसे बड़ी चुनौती है वह है अपने बच्चे का अपने से बेहतर कैरियर बनाना। मिडिल क्लास के इस 'बेहतर कैरियर' की लिस्ट बड़ी छोटी है। सिविल सर्वेन्ट, डॉक्टर, इंजीनियर, सॉफ्टवेयर इंजीनियर या फिर फाइनेन्सियल सेक्टर जैसे कुछ चुनिंदा क्षेत्र ही हैं जिसे मिडिल क्लास कैरियर की सफलता मान बैठा है।
इसलिए इन क्षेत्रों में अपने बच्चों को घुसाने और किसी तरह पास करवा देने के लिए वह न केवल अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर रहा है बल्कि अपने बच्चों पर भी दिन रात पढ़ाई का दबाव बना रहा है ताकि किसी भी तरह से वो इन्हीं कुछ चुनिंदा सेक्टर में वह अपना कैरियर बना ले। मिडिल क्लास को लगता है कि ऐसा हो जाने पर या तो उनका बच्चा विदेश चला जाएगा और विदेश नहीं भी गया तो देश में ही इतना पैसा कमा लेगा कि उसकी जिन्दगी सुख चैन से कट जाएगी।
लेकिन जो लोग ऐसा सोचते हैं वो एक बात नहीं सोच पाते कि किसी के भी साथ उसकी इच्छा या रुचि के विपरीत हम उससे जो कुछ करवाते हैं, हम उस पर गुलामी को थोपते हैं। फिर वह भले ही हमारा अपना बच्चा ही क्यों न हो। अगर उसकी इच्छा पढने की नहीं है तो जबर्दस्ती उसको पढाना भी उसके बाल मन के साथ अपराध करना है। अगर वह किसी खास फील्ड में अपना कैरियर नहीं बनाना चाहता तो उस ओर उसे धकेलना भी उसके साथ मानसिक प्रताड़ना और क्रिमिनल एक्ट ही समझा जाएगा।
अक्सर ऐसा वही मां बाप करते हैं जो अपनी जड़ों से कट चुके हैं। जिन्होंने अपने जीवन की परंपरागत जड़ों को आधुनिकता की अंधी दौड़ में काट दिया है उनके लिए कैरियर में सफलता जीवन जीने का आधार बन गयी है। कैरियर में सफल नहीं होंगे तो अच्छा पैसा नहीं कमा पायेंगे और अगर अच्छा पैसा नहीं कमा पाये तो 'सुख चैन' का जीवन नहीं जी पायेंगे। इसके साथ ही समाज में व्यर्थ का प्रदर्शन और दिखावा भी कई बार अपने ही बच्चों के साथ अन्याय का कारण बन जाता है जिसका परिणाम कभी कभार आत्महत्या के रुप में सामने आता है।
भारत में अभी स्कूलों में भी कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि बच्चे को उसकी रुचि के अनुसार शिक्षा दी जाए। यूरोपीय आदर्शों पर विकसित हुए हमारे स्कूल एक ऐसी "फैक्ट्री" में तब्दील हो गये हैं जहां जैसा भी कच्चा माल जाए उसे एक ही सांचें में ढालकर एक जैसी प्रतिभा के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जाता है। क्लर्क और सेवादार पैदा करनेवाली शिक्षा की इस मैकाले प्रणाली से छुटकारा पाने के बजाय हम लगातार इसमें धंसते ही जा रहे हैं। इस प्रणाली की सबसे बड़ी खामी सभी के लिए एक ही प्रकार की शिक्षा है जिसके कारण बच्चे की स्वाभाविक प्रतिभा विकसित होने की बजाय दमित हो जाती है।
इस प्रकार की दोषपूर्ण शिक्षा व्यवस्था से निकले किसी बच्चे के सामने सिर्फ एक ही रास्ता बचता है कि वह एक गलाकाट प्रतिस्पर्धा में घुसकर किसी भी तरह से अपने लिए थोड़ी सी जगह बना ले। जगह बन गयी तो वह सफल है और अगर जगह नहीं बन पायी तो वह भी अपने आपको असफल मानता है और लोग भी उसे असफल समझते हैं। सबसे पहले तो हमें जीवन की इस संकुचित और दोषपूर्ण मानसिकता से अपने आपको तथा अपने बच्चों को बाहर निकालना चाहिए। दूसरी बात यह कि लोग किस बात को सफलता मान रहे हैं यह हमारे लिए मानक नहीं होना चाहिए। हमारे लिए जीवन की सफलता वह है जिसमें हम पूर्णता का अनुभव कर सकें।
जीवन की सफलता जीवन की पूर्णता में है। कैरियर के रूप में हमें भी वही रास्ता चुनना चाहिए जिससे हमारे जीवन में हमें पूर्णता का अनुभव हो। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पूर्णता की इस अनुभूति का नौकरी और कैरियर एकमात्र रास्ता नहीं है। जीवन में पूर्णता का अनुभव करने के लिए बहुविध आयाम है। पारिवारिक, सामाजिक या फिर आंतरिक रूप से अपने आपको समृद्ध करके हम जीवन में इस पूर्णता और उस सच्चे सुख चैन को पा सकते हैं जिसकी तलाश कैरियर बनाने में करते हैं।
लेकिन एक ओर जहां मां बाप पहली कक्षा से बच्चों को पढाई में अव्वल आने का दबाव बनाने लगते हैं वहीं दूसरी ओर थोड़ी समझ आते ही नौजवान कैरियवाद का शिकार बन जाते हैं। कैरियरवाद की अंधी दौड़ में शामिल होकर वो कुछ भी करने और कहीं भी जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। जीवन जीने के दोनों तरीके गलत हैं और ये दोनों ही तरीके किसी को भी सिर्फ अवसाद और हताशा की ओर ले जाएंगे। इसी गलत जीवन दर्शन का परिणाम है कि कभी छोटे छोटे अबोध बच्चे पढाई के बोझ से बचने के लिए घर छोड़कर भाग जाते हैं तो किशोर नौजवान कैरियर बनाने का दबाव झेलते झेलते फांसी का फंदा चुन लेते हैं।
कोटा में 10 हजार करोड़ का कोचिंग कारोबार है। स्वाभाविक है कोई भी राज्य सरकार इसको बर्बाद नहीं करना चाहेगी। इसलिए पुलिस प्रशासन की ओर से आत्महत्या रोकने के लिए कुछ 'जरूरी इंतजाम' किये जा रहे हैं। लेकिन पुलिस प्रशासन द्वारा जो उपाय किये जा रहे हैं वो सरकारी खानापूर्ति और दिखावटी हैं। समस्या वहां है ही नहीं जहां इसे रोकने का प्रयास किया जा रहा है। समस्या परवरिश और कैरियर बनाने के पारिवारिक दबाव में है।
घर परिवार और दोस्तों से दूर ये हताश निराश बच्चे एकांत पाते ही जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं। 2016 से अब तक का आंकड़ा देखें तो कोटा में औसत हर साल 18-20 बच्चे आत्महत्या करते हैं। पिछले साल तो यह आंकड़ा 27 तक पहुंच गया है। फिर भी लोग हैं कि कैरियवाद की अंधी दौड़ में फंसकर अपने बच्चों को खुद ही मौत के मुंह में धकेल रहे हैं, बिना यह समझे कि उनके बच्चे की वास्तविक क्षमता या इच्छा क्या है।
कोटा ही नहीं पूरे देश में बच्चों और कि़शोर नौजवानों को इससे बचाना है तो उन पर पढाई और कैरियर का दबाव डालने से बचना होगा। अपने बच्चों को उनकी स्वाभाविक रूचि का कैरियर बनाने दें। अपनी रुचि के क्षेत्र में जाएंगे तो नाम और पैसा तो बनायेंगे ही लेकिन उससे बड़ी उपलब्धि यह होगी कि सच्चे सुख चैन से अपना जीवन बिताएंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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