Work Hours: कितना सही है चार दिन काम, तीन दिन आराम का फार्मूला
Work Hours: भारत की विषम जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रम मंत्रालय की ओर से संसद को हाल ही में एक प्रस्ताव भेजा गया है जिसमें एक दिवस में काम करने के अधिकतम समय को 12 घंटे करने पर विचार करने को कहा गया है। हालांकि हफ्ते में काम करने की अधिकतम सीमा 48 घंटे ही रहेगी वह नहीं बढ़ेगी। यानी अगर कोई कर्मचारी रोज 12 घंटे काम करता है तो वह हफ्ते में सिर्फ चार दिन काम करेगा और 3 दिन छुट्टी रहेगी या उसे फिर ओवर टाइम मिलेगा।
इस बीच इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति देश के युवाओं से सप्ताह में 70 घंटे, तथा इससे भी दो कदम आगे बढ़कर ओला के मालिक भाविश अग्रवाल युवाओं से सप्ताह में 140 घंटे काम करने की बात कह कर हमेशा से विवादास्पद रहे मुद्दे को फिर से बीच बहस में लाकर खड़ा कर दिया है। नारायण मूर्ति ने सुझाव दिया है कि देश की उत्पादकता में सुधार के लिए भारतीय युवाओं को सप्ताह में 70 घंटे कार्य करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण के तौर पर जर्मनी और जापान का हवाला देते हुए भारत की कार्य उत्पादकता में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया है।

वहीं ओला के मालिक भाविश अग्रवाल का कहना है कि दादा दादी की पीढ़ी ने आजादी की लड़ाई लड़कर देश को आजाद कराया, मां-बाप की पीढ़ी ने रोटी, कपड़ा, मकान का इंतजाम किया, अब आज की पीढ़ी की जिम्मेवारी है कि भारत को दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए प्रति सप्ताह 140 घंटे तक काम करें।
लगभग 100 साल पहले वर्ष 1930 के दशक में महान अर्थशास्त्री कींस ने अमेरिका और यूरोप में काम के घंटे कम होने के बावजूद कामगारों की उत्पादकता में बढ़ोतरी के मामलों को देखते हुए भविष्यवाणी की थी कि वर्ष 2030 आते-आते कामगारों का सप्ताह में सिर्फ 15 घंटे काम करना ही उत्पादकता के लिहाज से भरपूर होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि यह ट्रेंड वैश्विक होता जाएगा।
बाद के दिनों में बढ़नी बेतहाशा उत्पादकता की दर को देखते हुए कई अर्थशास्त्री एवं समाजशास्त्रियों ने भविष्य में काम के अंत की भी घोषणाएं की थी। तब यह लग रहा था कि मानवता काम और जीवन के अन्य सुखों के बीच संतुलन बनाने की ओर बढ़ रही है। लेकिन उदारवादी आर्थिक सुधारों ने इसकी राह में बाधा खड़ी कर दी। मजदूर संगठनों के कमजोर होने के कारण नियोक्ताओं द्वारा हायर एंड फायर की नीति के तहत ठेका पद्धति को बढ़ावा दिया गया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि कठोर श्रम सफलता की नींव होती है, लेकिन यह केवल इसमें निवेश किए गए घंटे पर निर्भर नहीं करता। समर्पण और उत्साह अधिक मायने रखता है। इसे लेकर अब तमाम मजदूर संगठन, एचआर प्रोफेशनल, चिकित्सक आदि अपनी अपनी राय दे रहे हैं। ज्यादातर का कहना है कि काम के घंटे बढ़ाने से युवाओं में तनाव बढ़ेगा। हार्ट अटैक के मामले बढ़ जाएंगे, निद्रा संबंधी परेशानियां बढ़ेगी। फास्ट फूड और अनियमित आहार ग्रहण करने से समय से पहले मोटापा हो जाएगा। तनाव के स्तर में वृद्धि के कारण दुश्चिंता और अवसाद की आशंका बढ़ जाएगी।
वहीं दूसरी तरफ कार्य घंटे बढ़ने से कार्यशील महिलाओं के लिए अपने बच्चों की देखभाल की जिम्मेवारियों को प्रबंध करना चुनौती पूर्ण हो जाएगा। सुदीर्घ कार्य घंटा और पारिवारिक उत्तरदायित्वों से एक साथ जूझना कार्यशील महिलाओं के करियर की प्रगति में बाधक बन सकता है।
यह सही है कि आने वाला वक्त गिग (अस्थायी) इकोनामी का है यानी कि जब गिग इकोनामी का बोलबाला होगा, उस वक्त स्थाई नौकरियां न के बराबर होगी। बाजार में बस फ्रीलांस और कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरियों का चलन होगा। भारत में आज स्टार्टअप का जोर है। देश में 40 करोड़ से अधिक लोगों को मुद्रा लोन दिया जा चुका है। देश में छोटे किराना की दुकानों की संख्या सवा करोड़ के आसपास है।
स्वरोजगार से जुड़े लोग चाहे वह फेरी लगाने वाले हो या पकौड़ा तलने वाले, पहले से ही 70 घंटा से अधिक कम कर रहे हैं। समाज में सबसे अधिक बदनाम माने जाने वाले राजनीतिक नेता और पुलिस वाले भी प्रति सप्ताह 70 घंटे से अधिक काम करते हैं। देश के बड़े शहरों में सरकारी कर्मचारी भी हफ्ते में 40 से 45 घंटे काम करते हैं लेकिन उनके ऑफिस जाने में लगने वाले समय को जोड़ दिया जाए तो उनका भी हफ्ते में 70 घंटे से अधिक हो जाता है। लेकिन एआई के भरोसे खड़ी होने वाली गिग इकोनामी के दौर में सरकारें भी अग्नि वीर की तरह कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरियों की तरफ जाना चाहेंगी।
आज पूंजी की दुनिया में पूरी दुनिया को बाजार में बदल दिया है। हर चीज बिकने को तैयार है लेकिन इसकी कीमत पूंजी के मालिक ही तय करेंगे। इतिहास में लौट कर देखें तो दुनिया में व्यापारिक पूंजी जब औद्योगिक पूंजी के रूप में विकसित होने लगी तो उसी के साथ समाज में एक नए वर्ग का उदय हुआ जिसे हम आम बोलचाल की भाषा में मजदूर कहते हैं। विकास के लिए इन्हीं मजदूरों को सदा से बलि का बकरा बनाया जाता रहा है। पूंजी के मालिक अपने पूंजी के विकास के लिए कामगारों से 16 से 18 घंटे तक का काम लिया करते थे। 17वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में मजदूरों ने एकजुटता दिखाई तथा कुर्बानी देकर काम के घंटे काम किए जाने की लड़ाई जीती थी। वर्ष 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर में काम के 8 घंटे तय हुए जिसे बाद में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी मान्यता दी।
इस दौरान अनेक शोध सर्वेक्षणों से यह बात निकलकर आई है कि काम के घंटे कम होने के बावजूद अनेक देशों में उत्पादकता बढ़ी है। यानी कि उत्पादकता का सीधा संबंध काम के घंटे से न होकर उचित वेतन और प्रोत्साहन, प्रशिक्षण की गुणवत्ता, उच्च कुशल और तकनीकी, काम और जीवन संतुलन, आगे बढ़ाने के अवसर आदि से अधिक है। लेकिन भारत में स्थितियां भिन्न है।
भारत में 90% से ज्यादा श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं जहां न सिर्फ उनके काम के घंटे कानूनी रूप से निर्धारित प्रति सप्ताह 48 घंटे से ज्यादा है बल्कि उन्हें राज्य की ओर से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल पाती है। काम की परिस्थितियां भी दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। असंगठित क्षेत्र के लोगों की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। चमकते दमकते आईटी सेक्टर में काम करने वाले भी कमोबेश कुली या गिग वर्कर बंधुआ मजदूर की हालत में है। भारत में वेतन का खर्च घटाकर कंपनियों का लाभ बढ़ाने की बात हो रही है।
दुनिया के कई देशों में काम के घंटे कम किए जाने की मांग हो रही है, क्योंकि प्रति सप्ताह 35 से 40 घंटे काम कर विकसित देश अमीर बने हुए हैं। ऐसे में भारतीय युवाओं से नारायण मूर्ति के 70 घंटे और भावेश अग्रवाल के 140 घंटे काम करने की मांग कर उत्पादकता बढ़ाने और देश को विकसित देशों की तरह अमीर बनाने की मांग समझ से परे है।
काम और आराम के बीच संतुलन जरूरी है। अगर जीवन में काम जरूरी है तो उसी अनुपात में आराम भी जरूरी है। दुनिया के विकसित देश जिन्होंने सप्ताह में 40 घण्टे काम के मॉडल को लागू किया है वो ज्यादा प्रगति कर रहे हैं। वो तो इसे 8 घण्टे और घटाकर 32 घण्टे पर लाने की तैयारी कर रहें तब क्या भारत जैसे देश में जहां प्रचुर मात्रा में श्रम संसाधन उपलब्ध हैं वहां 70 घण्टे श्रम की बात करने का क्या तुक है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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