Transgender: क्या ट्रांसजेंडर की कानूनी और सामाजिक स्थिति बदलेगी?
Transgender: पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अलग अलग मामलों में सुनाये गये आदेश के बाद एक बार फिर ट्रांसजेंडर की चर्चा है। संबंधित पक्षों से शीर्ष अदालत द्वारा मांगे गये जवाब के बाद ये मुद्दा प्रासंगिक हो गया है कि क्या देश में ट्रांसजेंडर की कानूनी और सामाजिक स्थिति बदलेगी?
केरल के एक ट्रांसजेंडर ने इसी शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है। इसकी सुनवाई चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यों की खंडपीठ कर रही है। इस याचिका में सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरी में ट्रांसजेंडर के लिए होरिजॉन्टल रिजर्वेशन या क्षैतिज आरक्षण की मांग की गयी है। इस याचिका को स्वीकारते हुए उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकारों और केंद्र सरकार से ट्रांसजेंडर को आरक्षण की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में याचिकाकर्ता ने प्रार्थना की है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षण में कट-ऑफ अंक, आयु में रियायतें आदि भी शामिल होनी चाहिए।

ट्रांसजेंडर के लिए आरक्षण को लेकर उठापटक की स्थिति इसलिए बन रही है क्योंकि सरकार इन्हें अलग से वर्टिकल आरक्षण देना चाह रही है जबकि इस समुदाय की मांग क्षैतिज आरक्षण के तहत जनरल, एससी, एसटी, ओबीसी सभी कैटेगरी में ट्रांसजेंडर के लिए रिजर्वेशन की मांग है। क्षैतिज आरक्षण ऐसा आरक्षण है जिसमें किसी विशेष वर्ग जैसे- महिलाओं, पूर्व सैनिकों और विकलांग व्यक्तियों को हर कैटेगरी में कुछ आरक्षण दिया जाता है। इसमें जाति के साथ साथ वर्ग आधारित आरक्षण भी मिल जाता है और हर वर्टिकल आरक्षण कैटेगरी को मिलने वाली सुविधाएं एवं छूट भी मिलती हैं। फिलहाल कर्नाटक एकमात्र राज्य है, जहां ट्रांसजेंडर को एक प्रतिशत की सीमा तक आरक्षण दिया गया है।
अधिकारों के स्पष्टीकरण और रिजर्वेशन को लेकर ऐसी याचिका पहली नहीं है। अभी पिछले ही हफ्ते एक महिला कांस्टेबल की जेंडर बदलने की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया है। मामले में याची ने हाईकोर्ट के समक्ष आग्रह किया था कि वह जेंडर डिस्फोरिया से पीड़ित है और खुद को एक पुरुष के रूप में पहचानती है। वह सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी कराना चाहती है। उच्च न्यायालय ने उस याचिका को स्वीकारते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है।
दरअसल याची महिला कांस्टेबल ने पहले पुलिस विभाग को लिखा था कि उसे पुरुष के तौर पर स्वीकार किया जाए और वह ट्रांसजेंडर सर्जरी करवाना चाहती है। लेकिन पुलिस विभाग से कोई उत्तर या स्पष्टीकरण इस सर्जरी को लेकर नहीं मिला तो अंततः उसे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
दरअसल स्त्री से पुरुष बन जाने के बाद अपनी नौकरी की स्थिति को लेकर ऐसे लोगों की शंका वाजिब भी है। इस समुदाय की ऐसी अनगिनत शंकायें कानूनी स्थिति को लेकर अब भी बरकरार है। इस समुदाय ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है और बदस्तूर यह अभी भी ज़ारी है। लेकिन ट्रांसजेंडर्स ने अपने अधिकारों की लड़ाई में सबसे बड़ी जीत 2014 में हासिल की थी जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तीसरा जेंडर होने का अधिकार दिया था। न्यायालय में संविधान के आर्टिकल 16,18 और 21 का हवाला देते हुए कहा था कि ट्रांसजेंडर भी भारत के नागरिक हैं और अन्य नागरिकों की तरह उन्हें शिक्षा, रोजगार और समाज में स्वीकार्यता का अधिकार है।
आगे उच्चतम न्यायालय ने इन्हें सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग बताकर शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सुविधाओं में केंद्र और राज्य सरकारों को आरक्षण देने की बात कही थी। हालांकि आरक्षण के तरीकों के बारे में कोई दिशा निर्देश नहीं दिया और गाड़ी यहीं आकर रुक गई। हालांकि इसके तहत कुछ बुनियादी अधिकार जरूर मिले जैसे फैसले में नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षण की सिफारिश की गई। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को लिंग परिवर्तन सर्जरी के बिना अपनी नयी पहचान घोषित करने का अधिकार भी दिया गया।
इसके पहले ब्रिटिश काल में जो कानून इनके लिए थे वो अमानवीय थे, जो 1952 में निरस्त तो कर दिये गए परंतु आज़ाद भारत में वोट देने का अधिकार भी इन्हें 1994 में मिला। 2014 के बाद कुछ सकारात्मक बदलाव 2019 में आया जब ट्रांसजेंडर पर्सन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट बना, जो इनके हितों की रक्षा करता नज़र आ रहा है। इसके तहत कोई ट्रांसपर्सन अपनी जेंडर आइडेंटिटी खुद डिसाइड कर सकता है।
इस कानून के तहत एक खास सर्टिफिकेट भी जारी किया जाता है जो उनके जेंडर चेंज होने का प्रमाण देता है। एक ट्रांसपर्सन जिला मजिस्ट्रेट के पास जेंडर आइडेंटिटी सर्टिफिकेशन की अर्जी दे सकता है। बहुत से विवादों और कई संशोधनों के साथ भी यह बिल इनके आरक्षण के विषय पर बहुत स्पष्टता नहीं रखता है। इसी कारण इस समाज से बार-बार याचिकाओं की झड़ी लगाई जा रही है।
अभी केरल के ट्रांसजेंडर जैसी इसी तरह की याचिका का जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने जुलाई में कहा था कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले से जुड़े पहले से निर्धारित आरक्षण का लाभ उठा सकते हैं। उनके लिए कोई अलग आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। इसी साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (नालसा) बनाम भारत संघ के 2014 के ऐतिहासिक मामले में दिए गए अपने आदेश का अनुपालन नहीं करने का आरोप लगाने वाली एक याचिका पर अवमानना नोटिस जारी किया था।
लेकिन इस समुदाय की लड़ाई सिर्फ कानूनी स्तर पर नहीं है। इनकी सामाजिक स्वीकृति की लड़ाई भी लंबी और अभी तक लगभग बेनतीजा ही है। हम ट्रांसजेंडर शब्द को ही गलत तरीके से परिभाषित कर लेते हैं। विदित हो कि ट्रांसजेंडर LGBTQ समुदाय का एक अंग जरूर है पर ये गे, लेस्बियन नहीं हैं। ट्रांसजेंडर व्यक्ति ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित होते हैं जिन्हें लगता है कि उनका लैंगिक व्यवहार और विचार जन्म के समय उन्हें दिए गए लिंग में फिट नहीं होते हैं। जन्मजात ट्रांसजेंडर के अलावा जब किसी व्यक्ति के जननांगों और मस्तिष्क का विकास उसके जन्म से निर्धारित लिंग के अनुरूप नहीं होता है तब महिला यह महसूस करने लगती है कि वह पुरुष है और पुरुष यह महसूस करने लगता है कि वह महिला है।
परंतु जिस तरीके से यह तृतीय प्रकृति समाज में तिरस्कृत और उपेक्षित है वह सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है। कहते हैं इस समाज का समर्पण और त्याग धैर्य श्रीराम के काल से है। जब राम वन गमन किए तो अयोध्या के बाहर तक प्रजा छोड़ने गई थी। राम के कहने पर सब वापस लौट गए थे परंतु यह समाज 14 वर्षों तक राम की प्रतीक्षा में नगर के बाहर रहा।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति सदियों से भारतीय समाज का हिस्सा रहे हैं। वेदों ने तीन लिंगों के होने को मान्यता दी है। प्राचीन हिंदू कानून के सबसे मौलिक ग्रंथों में से एक, मनुस्मृति तीन लिंगों की जैविक उत्पत्ति की व्याख्या करती है। इसके अनुसार नर बीज (मेल सीड) की मात्रा अधिक होने पर नर संतान उत्पन्न होती है। यदि मादा बीज (फीमेल सीड) की मात्रा अधिक होती है, तो कन्या उत्पन्न होती है और जब दोनों समान मात्रा में होते हैं, तो तीसरे लिंग का जन्म होता है।
दोनों सबसे प्रसिद्ध हिंदू महाकाव्य रामायण और महाभारत, अरावन और शिखंडी के पात्रों द्वारा तीसरे लिंग के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। इसका अर्थ यह है कि ट्रांसजेंडर की स्वीकार्यता यह किसी पश्चिमी आधुनिकतावाद का परिणाम नहीं बल्कि भारत के प्राचीन ग्रंथों में भी इनकी स्वीकार्यता है। ग्रंथों से लेकर आज के कानून में भले इनकी मान्यता दिख रही हो पर सवाल यह है कि समकालीन समाज इन्हे पूरी तरह कब स्वीकार करेगा?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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