Yasser Arafat: हमास के हमले के बाद क्यों याद आये यासिर अराफ़ात?
हमास ने भले ही इजरायल पर हमले करके उसे लहूलुहान कर दिया है और इस पर अपनी पीठ थपथपा रहा हो परन्तु दुनियाभर में ऐसे लोगों की तादात बहुत अधिक है जो आज भी यह मानते हैं कि हिंसा के जरिए फ़लस्तीन कभी-भी इजरायल से नहीं जीत सकता है।
जब से फ़लस्तीन में यहूदी अपने राष्ट्र की स्थापना के उद्देश्य से आकर बसना शुरू हुए तब से हिंसा और युद्ध से उनका मुकाबला किया जा रहा है और इजरायल कामयाब होता जा रहा है और फ़लस्तीन धूल में मिलता जा रहा है। हिंसा का समीकरण अब तक हमेशा इजरायल के पक्ष में ही बैठता रहा है। वह हिंसा का जवाब और अधिक हिंसा से देता है।

हिंसा का रास्ता फ़लस्तीन को कहीं नहीं ले जा सकता, ऐसा लोग आज नहीं महसूस कर रहे हैं बल्कि फ़लस्तीन के नेता रहे यासिर अराफ़ात भी अपने जीवन के आखिरी दो दशकों में महसूस करने लगे थे। जीवन भर एक गुरिल्ला योद्धा के रुप में वे फ़लस्तीन के लिए लड़ते रहे और अंत में उन्होंने हिंसा की निरर्थकता समझ ली थी। उन्होंने अपने समय में इजरायल से शांति समझौते किये और शांति बहाली की कोशिश रंग भी लायी।
हमास के उग्र युद्धोन्मादग्रस्त संगठन के उदय ने उन्हें किनारे लगा दिया और अराफ़ात के तमाम प्रयास धूल में मिल गए। पर युद्ध के इस माहौल में लोग फिर से उन्हें याद कर रहे हैं। और ऐसे मार्ग के बारे में सोच रहे हैं जो फ़लस्तीन को उसका वाजिब हक दिला सके। इसलिए आइए जानते हैं कि कौन थे यासिर अराफ़ात, कैसी थी उनकी ज़िंदगी और क्या था फ़लस्तीन-इजरायल संकट के समाधान का उनका सूत्र?
अराफ़ात का जन्म 1929 में कायरो, मिस्र में तब हुआ था जब उनकी मातृभूमि फ़लस्तीन पर एक नए यहूदी राष्ट्र की स्थापना का कुचक्र शुरू हो चुका था। उनके पिता फ़लस्तीन से जाकर कायरो में बस गए थे। कुछ समय को छोड़कर अराफ़ात के बचपन से लेकर जवानी के दिन ज्यादातर कायरो में ही बीते।
उनके कायरो यूनिवर्सिटी में पढ़ने के दौरान ही इजरायल की स्थापना की कोशिश और उसके अरब विरोधियों के बीच संघर्ष तेज हो चुका था। इजरायल के विरोध में एक अरब राष्ट्रवाद की विचारधारा ने अराफात के भी जुझारू और कल्पनाशील दिमाग में लहरें उठानी शुरू कर दी थीं। वे कायरो के फ़लस्तीन समर्थक स्टूडेंट्स आंदोलन में शामिल हो गए। 19 वर्ष की कच्ची अवस्था में वे पक्के अरब राष्ट्रवादी बन चुके थे। अरब राष्ट्रवाद की झंडाबरदार और यहूदी राष्ट्रवाद की प्रचंड विरोधी मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ मिलकर 1948 के अरब-इजरायल युद्ध में एक लड़ाके के रूप में शामिल हुए। नवजात इजरायल के हाथों अरब देश एक साथ परास्त हुए तो अराफ़ात निराश होकर एक बार फिर कायरो यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने लगे। 1952 से 1956 के दौर में वे कायरो स्थित जनरल यूनियन ऑफ फलस्तीनी स्टूडेंट्स के अध्यक्ष रहे।
कुवैत में इंजीनियर की नौकरी और अपनी कम्पनी खोलकर जीविकोपार्जन किया। पर इसी दौरान उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर अल फ़तह नाम से एक संगठन बनाया जिसका उद्देश्य था फिलिस्तीन की धरती से यहूदियों की विदाई। 1964 में जब पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन बना तो वे कुवैत से आकर इससे जुड़ गए। अरब लीग के सौजन्य से बना यह ऐसा संगठन था जो फ़लस्तीन की आज़ादी के लिए समर्पित सभी संगठनों का साझा मंच था।
1967 में अरब देशों और इजरायल के बीच छह दिवसीय युद्ध के बाद एक तरफ इजरायल और सशक्त हुआ और अरबों की एकता छिन्न-भिन्न होने लगी वहीं दूसरी तरफ पीएलओ के एक घटक दल के रूप में अल फ़तह सबसे बड़े मंच के रूप में उभरा। जब अल फ़तह उभरा तो उसके संस्थापक नेता के नाते यासर अराफ़ात भी फ़लस्तीन के सर्वोच्च नेता और वैश्विक चेहरे के रूप में उभर कर सामने आए।
1969 में अराफ़ात पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष बन गए और जीवन के अंत तक बने रहे। जॉर्डन मुख्यालय के दौरान इस संगठन को अराफ़ात ने एक राज्य के भीतर राज्य बना दिया था। इसकी एक गुरिल्ला फौज थी। इससे तंग आकर जॉर्डन के राजा ने इसे बाहर निकाल दिया। अब लेबनान इसका मुख्यालय बना लेकिन लेबनान पर इजरायल के हमले ने इसे ट्यूनीशिया शिफ्ट करने के लिए मजबूर किया। इस बीच अराफ़ात एक बार प्लेन क्रैश और एक बार हत्या की योजना से बाल-बाल बच निकले।
जिंदगी अब अराफ़ात के लिए शह और मात का खेल बन चुकी थी। भूमिगत होकर रहना और देश-विदेश में लगातार गोपनीय यात्राएँ करना यही उनका जीवन था। इसी दौर में उन्होंने अपनी से आधी उम्र की सुहा तवील से शादी की। 1983 से 1993 तक वे ट्यूनीशिया में रहकर फ़लस्तीन की लड़ाई लड़ते रहे। पर यही वह दौर भी है जब वे हिंसा की क्षमता पर संदेह करने लगे और शांतिपूर्ण समाधान के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया। जो अराफ़ात बंदूक की ताकत से इजरायल को नेस्तोनाबूद करने के लिए चालीस साल से लड़ रहे थे वे ही अब शांति का पथिक बनने को तैयार हो गये।
इसके लिए जरूरी था कि वे इजरायल के अस्तित्व को वैधता दें और फिर फ़लस्तीन के लिए समझौता करें। 1988 में उन्होंने अपने एक शत्रु राष्ट्र के वजूद को स्वीकार किया और उसकी तरफ दो राष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर बात करने की मंशा जाहिर की। इसके काफी पहले 1974 में संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि वे एक हाथ में जैतून की डाल लिए हुए हैं दूसरे हाथ में एक स्वतंत्रता सेनानी की पिस्तौल लिए हुए हैं। यानी एक हाथ में शांति का प्रतीक दूसरे में हिंसा का। 1988 तक आते आते उन्होंने दोनों हाथों में जैतून की डालें पकड़ने का संकल्प ले लिया।
मां के मरने के बाद वे अपने ननिहाल येरुशलम में कुछ साल रहे। इस दौर के बचपन की एक घटना उनके दिमाग में हमेशा रही कि उनके ननिहाल के घर में ब्रिटिश फौज ने आधी रात को घुसकर मारपीट की थी, फर्नीचर तोड़ डाले थे। इस समय से लेकर चार दशकों तक उनका जीवन हिंसा और प्रतिहिंसा के सबसे रक्तरंजित अनुभवों से भरा था फिर भी उन्हें हिंसा में रास्ता दिखना बन्द हो रहा था।
1988 में जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ की एक सभा में पीएलओ की नीति पलट की घोषणा की और कहा कि वे हिंसा और आतंकवाद रास्ता छोड़ रहे हैं और मध्यपूर्व के सभी राज्यों (इजरायल समेत) के हक़, सुरक्षा का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि हम सभी राष्ट्रों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व चाहते हैं। इजरायल सरकार ने अराफ़ात के साथ बात की और 1993 में ऐतिहासिक ओस्लो समझौता (प्रथम) हुआ। जिसके तहत पीएलओ को इजरायल ने फ़लस्तीन का वैध प्रतिनिधि माना, 1994 में पैलेस्टिनीयन नेशनल अथॉरिटी बनी जिसे फ़लस्तीन को रामल्ला में मुख्यालय बनाकर फ़लस्तीन का शासन चलाने का हक मिला। 1995 में ओस्लो समझौता (द्वितीय) हुआ जिससे फ़लस्तीन में चुनाव कराने की व्यवस्था हुई और 1996 के चुनाव में अराफ़ात अथॉरिटी के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
पर इसी समय इजरायल और फ़लस्तीन दोनों देशों में शांतिप्रक्रिया की विरोधी ताकतें मजबूत हुईं। हमास अल फ़तह पर हावी होने लगा और उधर 1996 में बेंजमिन नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने। फिर शांति और संवाद की प्रक्रिया ठंढी पड़ गयी। अराफ़ात की 2004 में पेरिस में मृत्यु के साथ शांति प्रक्रिया अब तक के लिए निरस्त हो गयी।
अब तो हमास और नेतन्याहू मिलकर मध्यपूर्व में शांति को वहाँ दफ़्न कर चुके हैं जहाँ से उसके फिर से जी उठने की संभावना बहुत कम बची है। न रहे यासिर अराफ़ात, न रहे यित्जाक राबिन, न रहे शिमोन पेरेज, न रही शांति। इन तीनों को संयुक्त रूप से मध्यपूर्व में शांति बहाली के प्रयासों के लिए 1994 का नोबल शांति पुरस्कार मिला था। अब देखते हैं इस इलाके में फिर कब शांति के 'नोबल' पैदा होते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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