• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

समाज में कैंसर के रूप में फैल रही हैं दुष्कर्म की घटनाएं

By Dr Neelam Mahendra
|

नई दिल्ली। एक वो दौर था जब नर में नारायण का वास था लेकिन आज उस नर पर पिशाच हावी है। एक वो दौर था जब आदर्शों नैतिक मूल्यों संवेदनाओं से युक्त चरित्र किसी सभ्यता की नींव होते थे लेकिन आज का समाज तो इनके खंडहरों पर खड़ा है। वो कल की बात थी जब मनुष्य को अपने इंसान होने का गुरूर था लेकिन आज का मानव तो खुद से ही शर्मिंदा है। क्योंकि आज उस पिशाच के लिए न उम्र की सीमा है न शर्म का कोई बंधन। ढाई साल की बच्ची हो या आठ माह की क्या फर्क पड़ता है। मासूमियत पर हैवानियत हावी हो जाती है।

समाज में कैंसर के रूप में फैल रही हैं दुष्कर्म की घटनाएं

लेकिन इस प्रकार की घटनाओं का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि ऐसी घटनाएं आज हमारे समाज का हिस्सा बन चुकी हैंऔर खेद का विषय यह है कि ऐसी घटनाएं केवल एक खबर के रूप में अखबारों की सुर्खियां बनकर रह जाती हैं समाज में आत्ममंथन का कारण नहीं बन पातीं। नहीं तो आखिर क्यों एक बच्ची पलक झपकते ही अपने घर के सामने से लापता हो जाती है और दो दिन बाद उसकी क्षप्त विक्षिप्त लाश मिलती है जिसके अंग भी पूरे नहीं होते। क्यों एक पांच साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या करके उसका चेहरे को ईटों से इस कदर कुचल कर नदी में फेंक दिया जाता है कि उसके शव की अनेक हड्डियां टूटी मिलती हैं।

क्यों ग्यारह बारह साल की हमारी बच्चियां दर्द सह रही हैं

क्यों एक दसवीं में पढ़ने वाली छात्रा छेड़खानी से इतनी परेशान हो जाती है कि आत्महत्या कर लेती है। क्यों एक दस माह की बच्ची से एक नाबालिग दुष्कर्म कर लेता है। क्यों ग्यारह बारह साल की हमारी बच्चियां एक बच्चे को जन्म देने की पीड़ा सहने के लिए विवश होती हैं। क्या ऐसी घटनाओं के लिए केवल वारदात को अंजाम देने वाला आरोपी ही जिम्मेदार होता है ? जी नहीं पूरा समाज जिम्मेदार होता है वो मां जिम्मेदार होती है जो अपने बेटे में संस्कारों के बीज नहीं डाल पाई वो पिता जिम्मेदार होता है जो अपने बेटे को एक औरत की इज़्ज़त करना नहीं सीखा पाया वो बहन जिम्मेदार होती है जो उस कलाई पर राखी बांधने को तैयार हो जाती है जिस हाथ ने किसी की आबरू से खिलवाड़ किया हो वो पत्नी जिम्मेदार होती है जो अपने पति को ऐसी करतूतों के बाद भी उसे स्वीकार करती है वो परिवार जिम्मेदार होता है जो अपने घर गहने बर्तन तक को बेच कर अपने दुराचारी बेटे को कानून की गिरफ्त से छुड़ा लाता है वो वकील जिम्मेदार होते हैं जो चंद पैसों की खातिर अपनी कानून की पढ़ाई का पूरा उपयोग उस आरोपी को फांसी के फंदे से छुड़ाने में लगा देते हैं वो जज जिम्मेदार होते हैं जो सब जानते समझते हुए भी " साक्ष्यों के आभाव में" आरोपी को बाइज़्ज़त बरी कर देते हैं वो पुलिस जिम्मेदार होती है भृष्ट आचरण के वशीभूत केस को कमजोर करने का काम करती है वो डॉक्टर जिम्मेदार होते हैं जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अधूरा सच लिखते हैं वो समाज जिम्मेदार होता है तो ऐसे परिवार से नाता जोड़ लेता है उसका सामाजिक बहिष्कार नहीं करता। वो कानून जिम्मेदार होता है जो पीड़ित को न्याय दिलाने में नाकाम रह जाता है वो व्यवस्था दोषी है जिसमें बलात्कार के आरोपियों को फांसी की सज़ा तो सुना दी जाती है लेकिन दी नहीं जाती है। जी हां 2018 में ही दुष्कर्म के 58 मामलों में आरोपी को फांसी की सज़ा सुनाई गई लेकिन एक को भी फांसी दी नहीं गई।

कानून का भी डर आज खत्म होता जा रहा है

हालात यह है कि 2012 के निर्भया कांड के दोषियों को हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक के द्वारा उनकी फांसी की सज़ा बरकरार रखने के बावजूद आज तक फांसी नहीं दी गई है। शायद इसलिए कानून का भी डर आज खत्म होता जा रहा है। नहीं तो क्या कारण है कि अलीगढ़ की इस दिल को दहला देने वाली ऐसी वारदात को अंजाम देने वाला शख्स इससे पहले 2014 में अपनी ही बेटी से दुष्कर्म करने के बावजूद दोबारा एक अन्य बच्ची के साथ उसी अपराध को और अधिक दरिंदगी के साथ दोहरा पाया वो भी तब जब अपने ही क्षेत्र के थाने में उसके खिलाफ यूपी गुंडा एक्ट में तीन तीन मुकदमे दर्ज हों। कानून और न्याय की इसी लचर व्यवस्था के कारण बलात्कार जैसी घटनाएं अब इस समाज का कैंसर बनती जा रही हैं।

आरोपी हो या पीड़ित दोनों ही के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं है

आज हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ चाहे आरोपी हो या पीड़ित दोनों ही के लिए ना उम्र की कोई सीमा है न सामाजिक वर्ग की और ना ही मानसिक स्थिति। कुछ समय पहले तक केवल आदतन अपराधी या मानसिक रूप से विक्षिप्त प्रवर्ति वाले लोग ही ऐसी घटनाओं को अंजाम देते थे लेकिन आज नाबालिग बच्चों से लेकर बूढ़े तक इस अपराधी मानसिकता में लिप्त हैं। पहले अनजान लोग ऐसे अपराध को अंजाम देते थे आज रिश्ते तार तार हो रहे हैं। जिस समाज में दूधमुंही और अबोध बच्चियां तक बुरी नज़र का शिकार हो रही हों उस समाज का इससे अधिक क्या पतन होगा। ऐसी स्थिति में जब कानून अपना काम नहीं कर पा रहा तो समाज को आगे आना होगा ।

अब हमें खुद पहल करनी होगी

हम एक ऐसे लाचार समाज के रूप में विकसित होने के बजाए जो कि न्याय के लिए कानून और सरकार का मोहताज है खुद को ऐसे समाज के रूप में विकसित करें जो अपने नैतिक मूल्यों के बल पर इंसानियत का रखवाला हो। इतिहास गवाह है कि अगर समाज खुद ना चाहे तो कोई सरकार कोई कानून उसे नहीं बदल सकता लेकिन अगर समाज चाहे तो सरकारें बदल जाती हैं कानून बदल जाते हैं। बदलाव वो ही स्थाई होता है जो भीतर से निकले इसलिए आज आवश्यक है कि यह बदलाव समाज के भीतर से निकले। आज हमने अपनी बच्चियों को एक ऐसी दुनिया दे दी है जहाँ वो अपने ही घर में भी सुरक्षित नहीं हैं।लेकिन अब हमें खुद पहल करनी होगी। इस समाज का नव निर्माण करना होगा। देश की सीमाओं की रक्षा तो हमारे वीर सैनिक कर ही रहे हैं नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए आज समाज के हर व्यक्ति को सैनिक और हर मां को मदर इंडिया बनना होगा।

यह पढ़ें: कठुआ रेप-मर्डर केस में सांजी राम समेत 6 आरोपी दोषी करार, 1 बरी, जानिए अहम बातें

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Sexual abuse of children. Rape/ sexual violence against adults.Rape is cancer of our Society.
For Daily Alerts

Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more