विपक्ष क्यों नहीं बना पा रहा कड़े मुकाबले का माहौल?
Chunav Prachar: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अविश्वास प्रस्ताव पर बहस का जवाब देते हुए भाजपा 370 पार और एनडीए 400 पार का नारा दिया था। विपक्ष भाजपा के इसी नारे में उलझ कर रह गया। उसका संविधान और लोकतंत्र को खतरे वाला घिसा पिटा प्रलाप जनता को उद्वेलित नहीं कर पाया। वह भूल गया कि 2019 में भी वह संविधान और लोकतंत्र को खतरे की बातें करता रहा था।
जब इंडी एलायंस बना था तो विपक्ष के नेता दावा कर रहे थे कि कम से कम 300 सीटों पर भाजपा के सामने एक ही उम्मीदवार खड़ा किया जाएगा, विपक्ष न तो इसे साकार कर पाया, न ही मुकाबले का नेरेटिव बना पाया। तीन राज्यों पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल में तो इंडी एलायंस सीट शेयरिंग ही नहीं पर पाया।

उत्तर प्रदेश में बसपा, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस और बीजू जनता दल ने विपक्षी एकता की कोशिश नाकाम बना दी। विपक्ष किसी एक मुद्दे को भी खड़ा नहीं कर पाया, जो भाजपा और मोदी के लिए मुश्किल खड़ी करता। लोकतंत्र, संविधान और आरक्षण खत्म करने का डर इंडी एलायंस के काल्पनिक मुद्दे हैं। जिनका मोदी, शाह और नड्डा ने एक एक बार जवाब देकर मामला ठंडा कर दिया।
चुनावी मुद्दे वे होने चाहिएं, जो जनता को सीधे प्रभावित करें। उपरोक्त तीनों मुद्दे सिर्फ बौद्धिक बहस के मुद्दे हैं। विपक्ष महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दों को बेहतर ढंग से उठा रहा है, लेकिन इन दोनों मुद्दों को स्वरोजगार के ढेरों विकल्पों और चारों तरफ दिखाई दे रहे राष्ट्र के विकास ने कमजोर कर दिया है। जाति आधारित जनगणना एक सीमित क्षेत्र का मुद्दा है। उन क्षेत्रों की जनता भी जानती है कि ओबीसी आरक्षण बढ़ जाने से नौकरियों में उन्हें कोई फायदा नहीं होगा, क्योंकि नई टेक्नोलॉजी आने से सरकारी नौकरियां ही घटती जाएँगी।
विपक्ष ऐसे मुद्दों की पहचान नहीं कर पाया है, जिनसे मोदी का वोट बैंक प्रभावित हो या पहली बार वोट डालने वाले 6 करोड़ वोटर प्रभावित हों। इंडी एलायंस बनते समय जो हवा बनी थी, वह हवा पहले दौर का मतदान शुरू होने से पहले ही हवा हो गई। एलायंस न तो साझा कार्यक्रम तय कर पाया, न एक भी साझा रैली कर पाया।

सिर्फ एक रैली दिल्ली में हुई, वह भी चुनावी रैली नहीं थी, बल्कि केजरीवाल की गिरफ्तारी के खिलाफ थी। विपक्ष ऐसा समझता है कि उस रैली से मोदी सरकार की ओर से ईडी और सीबीआई के दुरूपयोग के खिलाफ विपक्ष की एकता का संदेश गया है। जबकि मोदी सरकार ने ठीक चुनाव के वक्त अरविन्द केजरीवाल और हेमंत सोरेन को गिरफ्तार करके एक केलकुलेटेड गेम खेला था।
नरेंद्र मोदी के बनाए जाल में फंस कर विपक्ष ने इन दोनों मुख्यमंत्रियों की गिरफ्तारी के खिलाफ एकजुटता दिखा अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मार ली। क्योंकि किसी भी अदालत ने इन दोनों मुख्यमंत्रियों को जमानत नहीं दी। दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी को क़ानूनन जायज ठहरा देने के बाद संदेश उलटा हो गया। संदेश यह हो गया है कि यह गठबंधन अपने भ्रष्ट नेताओं को बचाने के लिए बनाया गया है।
दिल्ली की रामलीला मैदान की एक रैली में हेमंत सोरेन की पत्नी और अरविन्द केजरीवाल की पत्नियों को झारखंड के मुख्यमंत्री और दिल्ली के मंत्रियों से ज्यादा महत्व दिया गया। जबकि दोनों पहले राजनीति में नहीं थीं। रैली में इन दोनों गिरफ्तार मुख्यमंत्रियों की पत्नियों के अलावा सभी नेताओं के बेटे बेटियाँ मंच पर पहली लाईन में दिखाई दिए, जैसे लालू यादव के बेटे तेजस्वी, शरद पवार की बेटी सुप्रिया, मुलायम यादव के बेटे अखिलेश आदि।
इस रैली ने मोदी का वह काम कर दिया, जो वह सौ भाषणों से भी नहीं कर सकते थे। पिछले दस साल से वह भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ जंग का एलान कर रहे थे। दिल्ली की रैली ने उनके इन दोनों ही मुद्दों को देश के लिए गंभीर और सही साबित कर दिया।
लगभग सभी ओपिनियन पोल बता रहे हैं कि विपक्ष की रैली नरेंद्र मोदी के लिए वरदान साबित हुई। चुनावों के समय दोनों मुख्यमंत्रियों के खिलाफ की गई कार्रवाई से विपरीत नेरेटिव भी बन सकता था। लेकिन इन गिरफ्तारियों के बाद जब मोदी ने कहा कि "भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी जंग आगे भी जारी रहेगी, जो लोग राजनीतिक गिरफ्तारियों का आरोप लगा रहे हैं, उन्हें किसी अदालत से जमानत नहीं मिल रही।" तो इन दोनों की गिरफ्तारी ने मोदी की भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रतिबद्धता का नेरेटिव बना दिया।
सभी ओपिनियन पोल भाजपा और एनडीए की सीटें 2019 के मुकाबले ज्यादा बता रहे हैं। 2019 में भाजपा खुद 303 सीटें जीती थीं, एनडीए के पार्टनर 50 सीटें जीते थे। अगर हम सभी ओपिनियन पोल का अनुपात निकालें, तो एनडीए की करीब 12 सीटें बढ़ कर 365 हो रही हैं। यह 3.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।
दूसरी तरफ ओपिनियन पोल्स के मुताबिक़ यूपीए के मुकाबले इंडी एलायंस की सीटें घट रही है। सत्रहवीं लोकसभा में यूपीए की 91 सीटें थीं, उसमें तृणमूल कांग्रेस की 22, समाजवादी पार्टी की 5, और आम आदमी पार्टी की एक सीट शामिल नहीं थी, क्योंकि ये तीनों दल यूपीए में शामिल नहीं थे।
अब ये तीनों दल इंडी एलायंस में शामिल हैं, इसलिए इन्हें जोड़ लें तो सत्रहवीं लोकसभा में इन सभी दलों की 119 सीटें बनती हैं। इनमें उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी यूपीए में नहीं थी, लेकिन उद्वव ठाकरे समेत जो नया इंडी एलायंस बना है, उसे ओपिनियन पोल में 122 सीटें बताई जा रही हैं। तो इंडी एलायंस ने क्या हासिल किया।
वैसे जरूरी नहीं कि ओपिनियन पोल सही साबित हों। क्योंकि बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र में कड़े मुकाबले की खबरें आ रही हैं। हालांकि चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर (जो पिछले नौ साल से विपक्षी दलों के रणनीतिकार रहे हैं, पिछले विधानसभा चुनाव में वह ममता बनर्जी के रणनीतिकार थे) ने बंगाल में भाजपा की सीटें तृणमूल कांग्रेस से ज्यादा होने की भविष्यवाणी की है।
मोदी का टार्गेट 400 पार का है, लेकिन किसी भी ओपिनियन पोल ने यह नहीं बताया है कि एनडीए 400 पार कर सकता है, या भाजपा 370 को छू सकती है। लेकिन अगर भाजपा दस सीटें भी बढ़ा ले गई, तो वह इसी नारे की सफलता मानी जाएगी, क्योंकि इस नारे ने सीटें घटने नहीं दी।
इंडिया टीवी और सीएनएक्स के ओपिनियन पोल ने एनडीए को सर्वाधिक 393 सीटें मिलने और इंडी एलायंस को सौ से भी कम सीटें मिलने की भविष्यवाणी की है। भविष्यवाणी यह है कि भाजपा हिन्दी पट्टी के दिल्ली समेत दस राज्यों में पिछली बार वाला नतीजा दोहराने जा रही है।
हालांकि किसी भी ओपिनियन पोल ने जमीनी हकीकत को इस लिहाज से नहीं देखा कि राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में कई सीटों पर कड़ा मुकाबला हो रहा है। पिछली बार इन तीनों ही राज्यों की सारी 42 सीटें एनडीए जीता था, लेकिन इस बार कम से कम चार-पांच सीटें घट सकती हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश में उन सीटों की भरपाई हो सकती है। बंगाल के अलावा झारखंड और उड़ीसा में भी भाजपा की सीटें बढ़ रही हैं, लेकिन महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार में पिछली बार वाला नतीजा नहीं रहने वाला।
तमिलनाडु के बारे में कुछ ओपिनियन पोल भाजपा को छह सीटें दे रहे हैं, भाजपा इससे पहले 1999 में द्रमुक के साथ गठबंधन में एक बार चार सीटें जीती थी। इसके अलावा दोनों में से किसी द्रविड़ गठबंधन में रहते हुए भी भाजपा दो से तीसरी सीट नहीं जीत सकी। 2014 से लगातार भाजपा लोकसभा चुनाव गैर द्रविड़ दलों के साथ गठबंधन बना कर लड़ रही है। 2014 में वह कन्याकुमारी सीट जीती थी, 2019 में वह भी हार गई।
इस बार उसके बड़ी ताकत के रूप में उभरने की भविष्यवाणी की जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। तिकोने मुकाबले में द्रमुक को फायदा होने की उम्मीद ज्यादा है। अगर भाजपा अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन करके 1999 में जीती चारों सीटों के अलावा सिर्फ उन्हीं सीटों पर चुनाव लड़ती, जहां कांग्रेस के उम्मीदवार थे, तो भाजपा की जोरदार एंट्री संभव थी।












Click it and Unblock the Notifications