पीओके को लेकर पशोपेश में क्यों है भारत?
PoK: पीओके अर्थात पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बड़ा ही कूटनीतिक बयान दिया है। यूपी के बलिया में एक चुनावी सभा में बोलते हुए उन्होने कहा है कि "हमें पीओके को कब्जा करने की जरूरत नहीं है। पहले से ही वह हमारा है। हम किसी भी देश पर कब्जा करने के लिए महाशक्ति बनने नहीं जा रहे हैं।"
रक्षामंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब एक ओर देश में चुनाव चल रहे हैं तो दूसरी ओर पीओके में पाकिस्तानी पुलिस और प्रशासन के खिलाफ स्थानीय लोगों ने मोर्चा खोल रखा है। यहां हमें यह समझने की जरूरत है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों की लड़़ाई रोटी और बिजली की नहीं है। उनकी लड़ाई इस्लामाबाद द्वारा उनके साथ किए गए धोखे और शोषण के विरुद्ध है।

9 मई से लगातार सड़कों पर आए पीओके के लोग वापस अपने घरों को जाने के लिए तैयार नहीं है। 23 अरब के इस्लामाबाद पैकेज को उन्होंने एक तरह से ठुकरा दिया है। पुलिस और सेना के बल पर पाकिस्तान के हुक्मरान उन्हें एक बार फिर से दबाने की कोशिश कर रहे हैं पर इस बार वहां के लोग अपनी जान को दांव पर लगाकर अपने हक की लड़ाई लड़ लेना चाहते हैं।
दुनिया को दिखाने के लिए पाकिस्तान ने 23 अरब रुपये के एक पैकेज की घोषणा की है। इस पैकेज में आटा 50 रुपये किलो और बिजली 3 रुपये यूनिट देने की बात कही गई है। शाहबाज शरीफ और इस समय पाक अधिकृत कश्मीर के वजीर ए आजम यह कहना नहीं भूलते कि इतनी सस्ती बिजली इस समय दुनिया में कहीं नहीं हो सकती। गुलाम कश्मीर के प्रधानमंत्री अनवर उल हक इस मामले में भारत को खुद ही शामिल कर लेते हैं। यह समझाने के लिए कि नई दिल्ली 3 रुपये प्रति यूनिट बिजली अपने कश्मीर को किसी भी हालत में नहीं दे सकता।
उनकी इस बात से जाहिर है कि गुलाम कश्मीर के लोग भारत के प्रति लालसा की नजर से देख रहे हैं। उनके पास इस बात की पक्की खबर है कि भारतीय कश्मीर में किस तरह का विकास है। उनकी तरह भारतीय कश्मीर के लोग छोटी छोटी सुविधाओं के लिए तरसते नहीं हैं। गुलाम कश्मीर के वाशिंदों ने यह भी देखा है कि भारत सरकार किस तरह अपने कश्मीर को अधिकार संपन्न बना रही है। लोगों की शिक्षा और चिकित्सा का पूरा इंतजाम कर रही है। यहां की सड़कें और आधारभूत संरचनाएं उनके लिए सपने जैसे लगते हैं।
भारतीय कश्मीर की खुशहाली देखकर गुलाम कश्मीर के लोगों को खुद पर पछतावा होता है। उन्हें यह महसूस होता है कि इस्लामाबाद में बैठी सरकार ने उनके पैंरों में जंजीर बांध रखी है। पाकिस्तान की सेना ने उन्हें अपना गुलाम समझ लिया है और उनका दैहिक, भौतिक और मानसिक शोषण कर रहा है। तभी वे एक सुर से यह नारा बुलंद करते हैं- 'ये जो दहशतर्गी है, उसके पीछे वर्दी है' और 'पाकिस्ताानी फौजियों, छोड़ दो कश्मीर को'। गुलाम कश्मीर के लोगों की इस आवाज और चीत्कार को केवल रोटी और बिजली की कमी के रूप में नहीं देख सकते।
गुलाम कश्मीर के साथ पाकिस्तान का धोखा ऐतिहासिक है। खुद गुलाम कश्मीर के एक रिटायर्ड जज का कहना है कि पाकिस्तान के संविधान, जिसे वे आइन कहते हैं, में ही कश्मीर के साथ भेदभाव है। 77 साल में भी पाकिस्तान की आइन ने गुलाम कश्मीर के लोगों के लिए कोई जगह नहीं बनाई। इस्लामाबाद की हुकूमत ने सिर्फ एक जागीर की तरह गुलाम कश्मीर का इस्तेमाल किया। पाकिस्तान के संविधान में वहां के कश्मीर की कोई पहचान नहीं है। ना तो वह पाकिस्तान का सूबा है और ना आजाद मुल्क। एक एक कैबिनेट नोट के जरिए इस्लामाबाद कश्मीर पर हुकूमत करता है। वहां की सभी संपतियों को हासिल करने, संसाधनों का इस्तेमाल पूरे पाकिस्तान के लिए करने और बदले में जिंदा रहने लायक कुछ फंड जारी करने के अलावा इस्लामाबाद और कोई अधिकार गुलाम कश्मीर को नहीं देता।
यही नहीं एक साजिश के तहत पाकिस्तान के हुक्मरान गुलाम कश्मीर के लोगों को अपने पांव पर खड़ा होने नहीं देते। ना यहां कोई उद्योग लगाते हैं और ना ही यहां पढाई लिखाई की सुविधा बढ़ाते हैं। इसका सीधा कारण यह समझ में आता है कि पाकिस्तान अंदर से डरता है कि एक विकसित गुलाम कश्मीर उनके कंट्रोल में नहीं रह सकता।
जो फाॅर्मूला भारत के कश्मीर के साथ पाकिस्तान 77 साल से लगाने की कोशिश कर रहा है, उसी फार्मूले को गुलाम कश्मीर में आने देने से डरता है। वह नहीं चाहता कि गुलाम कश्मीर के लोग खुद मुख्तारी की बात करें। यह इस छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है कि गुलाम कश्मीर के कुल बजट में सिर्फ 7 या 8 प्रतिशत राजस्व ही वहां से कर के रूप में मिलता है, बाकी सारा बजट इस्लमाबाद की हुकूमत जारी करती है और वह भी इस शर्मनाक बयान के साथ कि पाकिस्तान के आर्थिक हालात ठीक नहीं होने के बावजूद उसकी सरकार गुलाम कश्मीर को पैसा दे रही है।
गुलाम कश्मीर सीधे तौर पर इस्लामाबाद में बनने वाली हुकूमत के अधीन होता है। पाकिस्तान में जिसकी सरकार होती है, गुलाम कश्मीर में भी उसी का वजीरे आजम होता है। इस समय वहां पीएमएलएन के नेतृत्व में मिली जुली सरकार है, तो गुलाम कश्मीर में भी पीएमएलएन का ही वजीरे आजम है और सरकार में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के लोग भी हैं। एक बात और है, इस्लामाबाद में किसी भी परिवर्तन का असर भले ही गुलाम कश्मीर की सरकार पर तत्काल पड़ता है, लेकिन गुलाम कश्मीर को एक टेररिस्ट लांचिग पैड बनाए रखने की नीति में कोई बदलाव नहीं होता।
अभी कुछ ही दिन पहले इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ की गुलाम कश्मीर इकाई के नेता सरदार अब्दुल क्यूम नाजी का खुला बयान आया था कि 'कश्मीर ना तो सूबा है, ना आजाद मुल्क है, बल्कि यह तो भारत के खिलाफ कश्मीर मामले को जिंदा रखने का लांच पैड की तरह है।' नाजी ने यह भी कहा कि इस कश्मीर में जनता की जो बगावत सामने आई, वैसी बगावत तो 1971 में भी नहीं हुई और यह बगावत भारत में मोदी के चुनाव को फायदा पहुंचाएगी।
एक ओर पाकिस्तान के नेता पीओके में बगावत को भारत से जोड़कर उसे इलेक्शन में लाभ पहुंचाने वाली बता रहे हैं तो वहीं हमारे यहां रक्षा मंत्री अलग ही लाइन ले रहे हैं। वो ये तो कह रहे हैं कि तकनीकी तौर पर पीओके तो हमारा है ही इसलिए उस पर कब्जा करने की जरूरत क्या है? लेकिन देश के लोगों के मन में यह सवाल तो उठता ही है कि नक्शे पर अखण्ड रूप से भारत का हिस्सा दिखनेवाला गिलगित और पीओके जमीन पर भारत के साथ कब एकाकार होगा? सवाल यह भी है कि राजनाथ सिंह चुनावी सभा में भी अगर पीओके को लेकर इस तरह से गोलमोल बात कर रहे हैं तो क्या सरकार के स्तर पर भी इसी तरह की गोलमोल नीति के साथ पीओके को डील किया जा रहा है जो कश्मीर में आतंकवाद का लांचिग पैड बना हुआ है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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