Bangladesh Elections: दुनियाभर में क्यों हो रही है बांग्लादेश के विपक्ष विहीन चुनाव की चर्चा?
7 जनवरी को बांग्लादेश में अभी मतदान खत्म भी नहीं हुआ था कि दुनियाभर की समाचार एजंसियों ने चुनाव परिणाम बताने शुरु कर दिये थे। 'बांग्लादेश में एक बार फिर अवामी लीग की सरकार बनना तय हो गया। शेख हसीना पांचवीं बार प्रधानमंत्री बनेगी।" दुनियभार की समाचार एजंसियों की यह भविष्यवाणी अनायास तो नहीं थी।
अगले दिन 8 जनवरी को जब चुनाव परिणाम आने लगे तो वही हुआ जो दुनियाभर के पोलिटिकल पंडित भविष्यवाणी कर रहे थे। मुजीबुर्रहमान की बेटी शेख हसीना की पार्टी को एक बार फिर दो तिहाई से अधिक बहुमत मिल गया। बांग्लादेश की जातीय संसद में 300 सीटें हैं जिसमें से 299 पर मतदान हुआ था। इस 299 सीटों में से 222 सीट अवामी लीग को मिली है। 62 निर्दलीय जीते हैं जबकि जातीय पार्टी को 11 सीटें मिली हैं।

जब सबकुछ ठीक है। चुनाव हुए। कई दलों ने चुनाव भी लड़ा। लगभग शांतिपूर्वक 40 प्रतिशत मतदान भी हुआ तो फिर दुनियाभर की समाचार एजंसियां चुनाव परिणाम आने से पहले ही परिणामों की इतना सटीक भविष्यवाणी कैसे कर रही थीं? केवल जीत की भविष्यणावी भर नहीं बल्कि दुनिया के अधिकांश मीडिया हाउस इसे विपक्ष विहीन एकतरफा चुनाव बताकर इसकी आलोचना क्यों कर रहे हैं?
असल में लगातार तीसरी बार बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीऐनपी) ने आम चुनाव के बॉयकॉट का ऐलान किया था। बीएनपी 2014 से जातीय संसद के चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही है। बीएनपी बांग्लादेश की बड़ी राजनीतिक हैसियत वाली पार्टी है और चार बार सरकार बना चुकी है।
इस पार्टी की स्थापना पाकिस्तान समर्थक जनरल जियाउर्रहमान ने 1978 में की थी। उनकी विधवा बेगम खालिदा जिया इस समय इस पार्टी की प्रमुख हैं जो दो बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रह चुकी हैं। जियाउर्रहमान खुद भी बांग्लादेश के राष्ट्रपति रह चुके थे और 1981 में बांग्लादेश आर्मी के ही लोगों ने पाकिस्तानी समर्थक होने के कारण उनकी हत्या कर दी थी। लेकिन जियाउर्रहमान की हत्या के बाद भी बीएनपी की पाकिस्तानी परस्ती में कमी नहीं आयी।
अवामी लीग की शेख हसीना कट्टरपंथी इस्लाम के खिलाफ हैं और वो एक साझा संस्कृति वाले बांग्लादेश की पक्षधर हैं। इसके उलट बीएनपी मजहबी राजनीति करती है और उसके आसपास ही बांग्लादेश के सारे कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पलते बढते हैं जिनको मुख्य रूप से पाकिस्तान से समर्थन मिलता है। इसलिए 2013 में बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब कट्टरपंथी और पाकिस्तान परस्त जमात ए इस्लामी को बैन कर दिया तब शेख हसीना ने जमात ए इस्लामी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की। इस्लामिक संगठनों द्वारा जब इस कार्रवाई का विरोध किया गया तब शेख हसीना ने ऐसे विरोध को भी कठोरता से कुचल दिया था।
2016 में जमात ए इस्लामी के चीफ मोतिउर्रहमान को फांसी देकर शेख हसीना ने साहसिक कदम उठाया क्योंकि मोतिउर्रहमान पर बांग्लादेश में अवैध तरीके से हथियार लाकर बांग्लादेश को अस्थिर करने का आरोप लगा था। मोतिउर्रहमान अवामी लीग की सेकुलर नीति का विरोधी था और बांग्लादेश की खुफिया एजंसियों को अंदेशा था कि पाकिस्तान की मदद से वह बांग्लादेश से शेख हसीना को खत्म करने का प्लान बना रहा था। उसके हथियारों की तैयारी भी इसी दिशा में थी।
अब क्योंकि शेख हसीना कट्टरपंथी इस्लाम के खिलाफ हैं और सबसे बड़ी बात कि भारत से बेहतर रिश्ता रखने की पक्षधर हैं, इसलिए बांग्लादेश में पाकिस्तान समर्थक दल या संगठन आम चुनावों का बहिष्कार करने लगे हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का बहिष्कार इसी कारण से है। वरना कोई कारण नहीं था कि वह इस तरह से लगातार तीसरी बार चुनावों का बहिष्कार करती। इसी बहिष्कार को लेकर दुनियाभर की समाचार एजंसियां और इस्लामिक समर्थक बांग्लादेश के चुनावों को एकतरफा चुनाव बताते आ रहे हैं।
यह बात सही है कि बीएनपी के बहिष्कार के कारण मतदान में भी कमी आती है और बांग्लादेश में चुनाव को लेकर वैसा उत्साह नहीं रहता जैसा होना चाहिए। बांग्लादेश के लोकतंत्र समर्थक ऐसी परिस्थिति से दुखी हैं। बांग्लादेश की चुनाव विश्लेषक शरमीन मुर्शिद कहती हैं: "यह बिना व्याकरण वाला चुनाव था। मैंने ऐसा कोई चुनाव नहीं देखा। यह किसी भी चीज़ में फिट नहीं बैठता। परिणाम वही हैं जो होने चाहिए थे।" शरमीन कहती हैं कि "यह एक ऐसा चुनाव था जिसमें एक ही दल (अवामी लीग) पक्ष और विपक्ष दोनों ओर था। उसके साथ 27 छोटे दल थे और सब अवामी लीग के चुनाव निशान पर चुनाव लड़ रहे थे। कई जगह तो विपक्ष का उम्मीदवार भी अवामी लीग द्वारा ही खड़ा किया गया था ताकि मतदान हो सके।"
बांग्लादेश के अर्थशास्त्री अनु मोहम्मद कहते हैं कि "बांग्लादेश में आम चुनाव एक लोक उत्सव की तरह होते हैं। चुनाव ही ऐसा समय होता है जब जनता अपने वोट की मालिक नजर आती है। लेकिन 2014 से अब 2023 तक वह उत्साह कहीं दिखाई नहीं देता। जो कुछ हुआ है वह महज एक औपचारिकता थी, जिसे पूरा कर लिया गया है।"
अनु मोहम्मद आगे कहते हैं कि "जो लोग इन चुनावों (2014 से 2023) के दौरान मतदाता बने उन्हें उस उत्सवी माहौल का अनुभव नहीं हुआ जो होना चाहिए था। पूरे चुनाव के दौरान देशभर में कर्फ्यू जैसे हालात बने रहे। अवामी लीग के समर्थक जरूर सक्रिय दिखते हैं लेकिन उनके समूह भी छोटे हैं। व्यापक स्तर पर यह समझ लोगों में बनी हुई है कि अवामी लीग सत्ता में बनी रहेगी। ऐसे चुनाव आयोजित करके उन्होंने (शेख हसीना ने) एक प्रणाली के रूप में चुनाव, एक संगठन के रूप में चुनाव आयोग और विचार के तौर पर लोकतंत्र के विचार को प्रभावी तौर पर कमजोर कर दिया है।"
इन राजनीतिक विश्लेषकों की चिंता जायज है। लोकतंत्र एक बहुदलीय या बहुध्रुवीय व्यवस्था है जिसे एक दलीय नहीं बनाया जा सकता। बांग्लादेश में ऐसा है भी नहीं। दर्जनभर छोटे दल तो मैदान में उतरते ही हैं इसके अलावा बड़ी संख्या में निर्दलीय भी चुनाव लड़ते हैं। लेकिन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के न होने से पक्ष विपक्ष के बीच वैसा राजनीतिक टकराव नहीं होता जो लोकतंत्र को जीवंत बनाता है।
इसके लिए शेख हसीना की अवामी लीग से अधिक दोषी खालिदा जिया और उनकी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी है। उनको चुनाव लड़ने से किसी ने नहीं रोका है। वो अपनी ओर से लगातार चुनावों का बहिष्कार कर रही हैं क्योंकि वो एक ऐसे समावेशी बांग्लादेश की पक्षधर नहीं हैं जिसके प्रशासन का आधार इस्लाम नहीं बल्कि सेकुलर कानून हों। वो बांग्लादेश को एक कट्टरपंथी इस्लामिक स्टेट बनाना चाहती हैं जिसे दुनिया में पाकिस्तान के अलावा शायद ही कोई और पसंद करेगा। शेख हसीना के कार्यकाल में उनकी यह मंशा पूरी होती नहीं दिख रही इसलिए खालिदा जिया चुनावों का ही बहिष्कार करके बैठ गयी हैं।
जबकि दूसरी ओर अवामी लीग ने समावेशी बांग्लादेश, पड़ोसियों से बेहतर रिश्ता और सेकुलर शासन व्यवस्था को महत्व दिया है। अब तक जो चुनाव परिणाम आये हैं उसमें उनकी पार्टी से 9 अल्पसंख्यक हिन्दू उम्मीदवार चुनाव जीत चुके हैं। उनकी इस नीति के कारण बांग्लादेश के कम्युनिस्ट भी उनके ग्रैंड एलायंस का हिस्सा हैं। फिर यह समझना सचमुच मुश्किल है कि बांग्लादेश के आमचुनाव को विपक्ष विहीन बतानेवाले लोग इसका दोष अवामी लीग को क्यों दे रहे हैं? अगर कोई दोषी है तो वह बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी है जो अपनी कट्टरपंथी और कम्युनल नीति को सफल होता न देख आम चुनावों से ही अलग हो जाती है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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