Administration of Delhi: राष्ट्रीय राजधानी में विधानसभा और राज्य सरकार का औचित्य क्या है?
दिल्ली में विधानसभा के गठन का निर्णय ही गलत था, क्योंकि किसी देश की राष्ट्रीय राजधानी में अलग से प्रांतीय सरकार नहीं होती।

11 मई को सुप्रीमकोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने दो असंवैधानिक फैसले दिए थे| इनमें से एक को केंद्र सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से ठीक कर लिया है, और दूसरे पर काम होना बाकी है| एक फैसला दिल्ली सरकार को प्रशासनिक अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग का अधिकार देने का था| और दूसरा राज्यपाल और चुने हुए सदनों के स्पीकर के अधिकारों से संबंधित था|
केंद्र सरकार ने 19 मई को अध्यादेश जारी करके दिल्ली में ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए तीन सदस्यीय प्राधिकरण का गठन कर दिया है, जिसका अध्यक्ष मुख्यमंत्री को ही बनाया गया है, जिसमें दिल्ली के मुख्य सचिव और गृह सचिव बाकी दो सदस्य होंगे| फैसला बहुमत के आधार पर होगा, फिर भी कोई विवाद होगा, तो लेफ्टिनेंट गवर्नर को अंतिम अधिकार होगा| इस तरह अध्यादेश के जरिए सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले को पलट दिया है|
दिल्ली के प्रशासनिक अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग का अधिकार दिल्ली सरकार को देने का निर्णय असंवैधानिक था। क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने इस बात को पूरी तरह अनदेखा किया कि दिल्ली संपूर्ण राज्य नहीं है, बल्कि एक केंद्र शासित प्रदेश है। 1991 में जब दिल्ली में विधानसभा गठन की गई थी, तो दिल्ली को सिर्फ क़ानून बनाने के अधिकार दिए गए थे, प्रशासनिक अधिकार नहीं दिए गए थे| प्रशासनिक अधिकार लेफ्टिनेंट गवर्नर के पास ही थे, और वह भी अफसरों और अधिकारियों की दो कमेटियों की सिफारिश पर ही ट्रांसफर पोस्टिंग का काम करते थे|
वैसे तो दिल्ली में विधानसभा का गठन ही गलत था, क्योंकि दुनिया के किसी देश की राष्ट्रीय राजधानी में अलग से सरकार नहीं होती, राष्ट्रीय राजधानी सीधे राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के अधीन होती है, क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी में दुनिया भर के दूतावास और सभी केन्द्रीय एजेंसियों के दफ्तर होते हैं| दुनिया भर के देशों में राष्ट्रीय राजधानी का प्रशासन मेट्रोपोलिटन काउंसिल संभालती है| इसलिए इंदिरा गांधी ने 1966 में दिल्ली विधानसभा को समाप्त करके दिल्ली मेट्रोपोलिटन काउंसिल का गठन किया था|
1991 में नरसिंह राव ने दिल्ली विधानसभा का गठन दिल्ली के कांग्रेसी नेताओं के दबाव में किया था। मकसद सिर्फ यह था कि दिल्ली के वरिष्ठ नेताओं के हाथ में सत्ता की रेवड़ियां आ सकें| दिल्ली विधानसभा गठन के बाद पहले पांच साल भाजपा की सरकार थी, तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। फिर पन्द्रह साल कांग्रेस की सरकार थी, इन 15 सालों के दौरान केंद्र में छह साल तक एनडीए की सरकार थी| पहले केंद्र में कांग्रेस सरकार के समय भाजपा, और फिर केंद्र में एनडीए सरकार के समय कांग्रेस दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग जरुर करती रही, लेकिन कभी प्रशासनिक अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग का विवाद खड़ा नहीं हुआ|
लेकिन जबसे अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, उनका किसी न किसी मुद्दे पर केंद्र सरकार अथवा लेफ्टिनेंट गवर्नर के साथ विवाद होता रहता है| पिछले दस सालों में तीन लेफ्टिनेंट गवर्नर बदल चुके हैं, तीनों के साथ उनका विवाद रहा| दर्जनों बार वह लेफ्टिनेंट गवर्नर के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर चुके हैं।
2013 में जब पहली बार कांग्रेस ने समर्थन देकर उन्हें मुख्यमंत्री बनवाया था, तब से केजरीवाल दिल्ली को पूर्ण राज्य समझ कर वे सभी अधिकार मांग रहे थे, जो एक पूर्ण राज्य को मिलते हैं| कभी वह दिल्ली पुलिस को अपने नियन्त्रण में लेने की मांग करते थे, कभी प्रशासनिक अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग पर अधिकार की मांग करते थे|
मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीने बाद ही वह प्रशासन पर सम्पूर्ण नियंत्रण के लिए हाईकोर्ट चले गए थे| दिल्ली हाईकोर्ट ने 2016 में अपने फैसले में कहा था कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, दिल्ली में विधानसभा जरुर है, लेकिन दिल्ली यूनियन टेरिटरी है, इसलिए दिल्ली का प्रशासक लेफ्टिनेंट गवर्नर है| इस तरह दिल्ली सरकार की याचिका खारिज कर दी गई थी|
दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ 2017 में केजरीवाल सुप्रीमकोर्ट गए थे| पहले दो जजों की बेंच ने विभाजित फैसला दिया था, फिर तीन जजों की बेंच ने इसे पांच सदस्यीय बेंच को रेफर कर दिया था| केजरीवाल की उसी याचिका पर सुप्रीमकोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने 11 मई को केजरीवाल के पक्ष में फैसला दिया और दिल्ली सरकार को प्रशासनिक अधिकारों के साथ ट्रांसफर पोस्टिंग के अधिकार भी दे दिए|
यह निर्णय संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ तो है ही, दिल्ली को अराजकता की तरफ धकेलने वाला भी है| सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले से संविधान के मूल ढांचे की अवधारणा का उल्लंघन हुआ है| संविधान के अनुच्छेद एक में भारत के क्षेत्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश परिभाषित होते है| दिल्ली में विधानसभा जरुर है, लेकिन यह केंद्र शासित प्रदेश है। इसका अर्थ यह है कि केंद्र शासित प्रदेश का शासन सिर्फ केंद्र से होगा|
दिल्ली में 1991 में विधानसभा सिर्फ इसलिए गठित की गई थी, ताकि दिल्ली की जनता के प्रतिनिधि क़ानून बनाकर प्रशासन के लिए गाईड लाईन तय कर दें| जबकि सुप्रीमकोर्ट की संविधान पीठ ने संविधान के अनुच्छेद एक में भारी फेरबदल करते हुए दिल्ली के लिए एक विशेष श्रेणी का ही गठन कर दिया, जिसे सुई जेनेरिस कहा गया। सुई जेनेरिस लेटिन भाषा का शब्द है, जिसका कानूनी अर्थ है, अपने आप में विशिष्ट नई श्रेणी|

इस तरह संविधान पीठ ने दिल्ली के लिए एक ऐसी श्रेणी बना दी, जो अभी तक थी ही नहीं और यह संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है| हालांकि अगर मी लार्ड की बात मान कर दिल्ली को एक विशिष्ट नई श्रेणी भी माना जाए तो भी इस बात से इंकार नहीं किया सकता कि दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश अर्थात यूनियन टेरिटरी है| यह भारत की राजधानी और यूटी है इसलिए इसका शासन कोई और नहीं बल्कि केंद्र ही कर सकता है|
संविधान के अनुच्छेद 239 एए में दिल्ली में सिर्फ विधानसभा का प्रावधान किया गया था, ताकि स्थानीय आकांक्षाओं की पूर्ति हो सके| विधानसभा का गठन करते समय दिल्ली की भावी सरकार को प्रशासनिक अधिकार नहीं दिए गए थे| दिल्ली विधानसभा के गठन का यह उद्देश्य कभी नहीं रहा कि यूटी पर स्थानीय सरकार का नियंत्रण हो जाए और यह केंद्र सरकार के नियंत्रण से बाहर हो जाए| संविधान के 14वें हिस्से में स्पष्ट प्रावधान है कि सेवाएं केंद्र या राज्य के अधीन हैं, यूटी के अधीन नहीं, और दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, दिल्ली यूनियन टेरिटरी है| सुप्रीमकोर्ट की सवैधानिक पीठ ने इस महत्वपूर्ण बात को नजरअंदाज किया, जबकि सोलिसीटर जनरल ने बार बार कोर्ट को बताया था कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है|
सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले पर केजरीवाल ने अपने मंत्रियों के साथ मिठाई खाई| फैसला आते ही उन्होंने पहली प्रेस कांफ्रेंस में ही अफसरों को धमकाना शुरू कर दिया था और लगभग सौ अफसरों का तुरंत ट्रांसफर कर दिया| केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं, लेकिन कोई विभाग उन्होंने अपने पास नहीं रखा हुआ, सुप्रीमकोर्ट के फैसले से ट्रांसफर पोस्टिंग का अधिकार उनके पास आ गया था| वह किसी भी अफसर को बुला कर, जो भी काम कहते, वह उसे करना पड़ता। लेकिन उन सब गलत कामों के लिए जिम्मेदार वह अफसर होता, और वही फंसता|
हालांकि केंद्र सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के 11 मई के फैसले पर पुनर्विचार की याचिका भी दाखिल की है, लेकिन अध्यादेश जारी कर के 1991 के क़ानून को ठीक भी कर दिया है, जिससे प्रशासनिक अधिकार राष्ट्रपति के पास ही रहेगा| 1991 के क़ानून में इसका स्पष्ट प्रावधान नहीं था| अब केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका और अरविन्द केजरीवाल की अध्यादेश को चुनौती वाली याचिका का निपटारा अध्यादेश की रोशनी में होगा| केंद्र सरकार के इस अध्यादेश में साफ़ कहा गया है कि कानून बनाने का अधिकार संसद के जरिए केंद्र सरकार को है, सुप्रीमकोर्ट को नहीं| दिल्ली को राज्य मानने का संविधान पीठ का फैसला संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है|
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