Unrest in Congress: कमलनाथ की बगावत को किस नजरिए से देखें
Unrest in Congress: श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर में रामलला के विग्रह में प्राण प्रतिष्ठा के बाद कांग्रेस में भगदड़ की स्थिति है| एक तरफ कांग्रेस के कई बड़े नेता कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं| तो दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर वैसी ही गुटबाजी शुरू हो गई है, जैसी विवादित ढांचा टूटने के बाद शुरू हो गई थी|
अयोध्या में विवादित ढांचा टूटने के बाद अर्जुन सिंह ने नरसिम्हा राव को जिम्मेदार मानते हुए पार्टी के भीतर उनके खिलाफ गुटबाजी शुरू कर दी थी| अर्जुन सिंह का मानना था कि नरसिम्हा राव ने जानबूझ कर बाबरी ढांचा टूटने दिया था|

उन्हीं अर्जुन सिंह के राजनीतिक चेले कमलनाथ ने मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले हिन्दू राष्ट्र के पैरवीकार धीरेन्द्र शास्त्री को अपने निर्वाचन क्षेत्र छिंदवाडा में बुला कर पार्टी के भीतर नई बहस शुरू कर दी थी|
अर्जुन सिंह के दूसरे चेले और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इशारों ही इशारों में कमलनाथ के उस कदम का विरोध भी किया था| हालांकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के भीतर दोनों एक ही कैंप के माने जाते रहे हैं| 2018 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ खड़े हो कर दिग्विजय सिंह ने ही कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनवाया था| पच्चीस साल पहले 1993 में श्यामा चरण शुक्ल के खिलाफ खड़े हो कर कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया था|

कांग्रेस में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है, आज़ादी से पहले और बाद में भी पार्टी में गुटबाजी होती रही है| इंदिरा गांधी के वक्त तक पार्टी के भीतर कई प्रेशर ग्रुप हुआ करते थे, जो पार्टी को मध्य मार्गी बनाए रखने के लिए हाईकमान को एक तरफ झुकने से रोकते थे| इंदिरा गांधी के पार्टी तोड़ देने के बाद कांग्रेस में सब कुछ बदल गया था|
इसके बाद कांग्रेस में एक नया दौर शुरू हुआ जब अपने प्रादेशिक नेताओं को काबू में रखने के लिए कांग्रेस हाई कमान खुद भी राज्यों में गुटबाजी को हवा देता रहता था| यह सिलसिला इंदिरा गांधी के बाद सोनिया-राहुल के समय भी चलता रहा| पंजाब में अमरिंदर सिंह को नियन्त्रण में रखने के लिए नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया था| हरियाणा में भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को नियन्त्रण में रखने के लिए अशोक तंवर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया था|
राज्यों के कांग्रेसी नेता एक दूसरे गुट के खिलाफ कांग्रेस मुख्यालय में धरने प्रदर्शन भी करते रहे हैं| मध्यप्रदेश में तो दो गुटों के शक्ति प्रदर्शन में बम धमाके और फायरिंग भी होती रही है| पार्टी को मध्यमार्गी बनाए रखने वाले नेता तस्वीर से गायब हो गए थे| गुटबाजी व्यक्तिगत स्वार्थों पर आकर टिक गई थी|
कांग्रेस पार्टी के भीतर वैचारिक गुटबाजी तब शुरू हुई जब विवादित ढांचा टूटने के बाद मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष नरसिंह राव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था| नरसिम्हा राव और अर्जुन सिंह में एक दूसरे के खिलाफ कशमकश उस दिन से चल रही थी, जब राजीव गांधी की हत्या के बाद नरसिम्हा राव ने सोनिया गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने का विरोध किया था|
वह तो उस समय सोनिया गांधी ने ही राजनीति में आने से इनकार कर दिया था, इसलिए नरसिम्हा राव अध्यक्ष बन गए थे| लेकिन कुछ दिनों बाद ही वह अर्जुन सिंह के माध्यम से नरसिम्हा राव की गतिविधियों की रिपोर्ट लेने लगी थी| बाबरी ढांचा टूटने के बाद तो अर्जुन सिंह ने नरसिम्हा राव के खिलाफ सोनिया गांधी के कान भरने शुरू कर दिए थे|
पार्टी के भीतर यह माना जाने लगा था कि अर्जुन सिंह दस जनपथ यानी सोनिया गांधी के प्रतिनिधि हैं| अर्जुन सिंह ने पार्टी के भीतर नरसिम्हा राव के खिलाफ देश भर में अपना गुट बनाना शुरू कर दिया था, जिसमें उस समय के पर्यावरण मंत्री कमलनाथ, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और सांसद अजीत जोगी भी शामिल थे| उधर रक्षा मंत्री शरद पवार ने अलग मोर्चा खोल रखा था, लेकिन जब नरसिम्हा राव ने अर्जुन सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया तो पवार अर्जुन सिंह के खिलाफ नरसिम्हा राव के साथ हो गए थे|
इसके बाद अर्जुन सिंह पार्टी से निकले और उन्होंने नारायण दत्त तिवारी के साथ मिल कर तिवारी कांग्रेस बनाई| वह एक अलग कहानी है| लेकिन अर्जुन सिंह ने जिस तरह पार्टी के भीतर मुस्लिम परस्ती को बढ़ावा दिया, उसके खिलाफ वी.एन. गाडगिल के बाद पार्टी के भीतर हिन्दुओं की आवाज उठाने और पार्टी को मध्यमार्ग पर वापस लाने वाला कोई नहीं रहा|
सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी में गुटबाजी काफी हद तक खत्म हो गई थी| फिर भी यूपीए सरकार के समय भी बाटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अर्जुन सिंह के इशारे पर शिवराज पाटिल और पी. चिदंबरम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था| जिस कारण कांग्रेस को शर्मसार होना पड़ा था|
सोनिया गांधी के आशीर्वाद के कारण 2004 से 2009 तक मनमोहन सिंह सरकार में मानव संसाधन मंत्री रहते हुए अर्जुन सिंह ने शिक्षा का जमकर मुगलियाकरण किया| कांग्रेस की आज की दयनीय स्थिति का एक बड़ा कारण यह भी है| अगर अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह की मुस्लिम परस्त राजनीति के खिलाफ पार्टी के भीतर कमलनाथ, अशोक गहलोत, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा जैसे नेता उस समय आवाज उठाते तो कांग्रेस को कम्युनिस्ट पार्टी बनने से बचाया जा सकता था|
2014 में हार के बाद ए.के. एंटनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पार्टी की हार का सबसे बड़ा कारण यह है कि पार्टी की छवि मुस्लिमपरस्त पार्टी की बन गई है| सत्ता से हटने के बाद इन तीनों नेताओं ने पार्टी के भीतर समय समय पर मुस्लिमपरस्ती के खिलाफ आवाज उठाई है| आचार्य प्रमोद के इस आरोप की पुष्टि कांग्रेस छोड़ने वाले असम के विधायक विधायक कामाख्या देव पुरकायस्थ और राजस्थान के महेंद्र जीत सिंह मालवीय ने भी की है कि उन्हें राम लला की प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन मन्दिरों में जाने से रोका गया था|
कमलनाथ ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में भारत को हिन्दू राष्ट्र कह कर और हिन्दू राष्ट्र के पैरवीकार धीरेन्द्र शास्त्री को अपने निर्वाचन क्षेत्र में बुलाकर पार्टी के भीतर मध्यमार्ग अपनाने की आवाज उठाई थी| चुनाव नतीजों के बाद उन्हें पार्टी से किनारे करके उनकी लाईन को पूरी तरह नकार दिया गया| यह अलग राजनीतिक चर्चा का विषय है कि वह अपने बेटे नुकुल नाथ के राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं, इसलिए वह उसका भविष्य भाजपा में देखते हैं|
केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ए.के. एंटनी के बेटे अनिल एंटनी ने भी अपना राजनीतिक भविष्य भाजपा में सुरक्षित समझा है| लेकिन कमल नाथ अपने बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित नहीं है, जैसे ज्योतिरादित्य भाजपा में चले गए, अनिल एंटनी भाजपा में चले गए, वैसे ही नकुल नाथ भी भाजपा में जा सकते हैं| कमलनाथ को लेकर भाजपा के भीतर भी आम सहमति नहीं है, लेकिन ऐसी स्थिति नकुल नाथ के साथ नहीं है|
कमलनाथ अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य के कारण नहीं, पार्टी के भीतर किए गए अपमानजनक व्यवहार के कारण उत्तेजित हैं| उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ नहीं, अलबत्ता पार्टी हाईकमान पर हावी केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश और रणदीप सिंह सुरजेवाला के खिलाफ मोर्चा खोला है| पार्टी के फैसलों को ये तीनों ही नेता प्रभावित कर रहे हैं|
कमलनाथ का इरादा पार्टी के खिलाफ बगावत या बुढ़ापे में भाजपाई हो जाने का नहीं है| अगर कांग्रेस में उनका भविष्य नहीं है, तो भाजपा में तो बिलकुल नहीं है| भाजपा वैसे भी उनकी 1984 के सिख विरोधी दंगों में भूमिका को लेकर उन्हें लेने में हिचकिचाएगी| कमलनाथ पार्टी के भीतर एक प्रेशर ग्रुप बनाकर कांग्रेस को मध्यमार्ग पर वापस लौटने में अहम भूमिका निभाने की संभावना टटोल रहे हैं, उन्हें देश भर के कांग्रेसियों का समर्थन भी मिल रहा है। इसलिए बहुत मजबूरी में ही कमल नाथ भाजपा का रूख करेंगे|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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