Uniform Civil Code: मोदी लेकर आ रहे भाजपा का सबसे बड़ा एजेंडा
विपक्ष ने जातीय आधार पर जनगणना की मांग को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है, ताकि भाजपा अगर समान नागरिक संहिता के नाम पर हिन्दुओं को एकजुट करना चाहती है, तो जातीय जनगणना के नाम पर उनमें फूट डाली जा सके।

मोदी सरकार ने पिछले लोकसभा चुनाव के बाद दो बड़े काम किए हैं, अब तीसरे की बारी है। दूसरी बार सरकार बनने के सिर्फ दो महीने बाद ही गृहमंत्री अमित शाह ने 5 और 6 अगस्त को उस अनुच्छेद 370 को एक झटके में खत्म कर दिया था, जिसके बारे में कहा जाता था कि यह कभी हो ही नहीं सकता। फिर उसी साल के आखिर में सिर्फ दो दिन के भीतर 10-11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन क़ानून पास करवा लिया गया था।
इस बीच 9 नवंबर 2019 को राम जन्मभूमि पर सुप्रीमकोर्ट का फैसला भी आ चुका था। तो सकपकाए विपक्ष और मुसलमान समुदाय का सारा गुस्सा नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ उतरा। जगह जगह लंबे लंबे धरने प्रदर्शन और जुलूस जलसे हुए। दिल्ली के शाहीन बाग़ में महीनों धरना चला। जिसे कई यूनिवर्सिटियों के अध्यापकों, वामपंथी छात्र संगठनों, फ़िल्मी हस्तियों, कवियों, साहित्यकारों ने समर्थन दिया। दिल्ली समेत कई जगहों पर हिंसा भी हुई।

हालांकि नागरिकता संशोधन क़ानून मुसलमानों के खिलाफ नहीं, बल्कि मुस्लिम देशों में सताए जा रहे हिन्दुओं, सिखों, जैनियों, बोद्धों और ईसाईयों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए था। लेकिन भारत के कम्युनिस्ट विचारधारा के अध्यापकों, छात्र संगठनों, फ़िल्मी हस्तियों, कवियों, साहित्यकारों ने मुसलमानों को भड़काया कि यह क़ानून उनके खिलाफ है, यहां तक कि मीडिया में भी झूठा प्रचार किया गया। खालिस्तानी भी साथ जुड़ गए।
मानवाधिकार संगठनों ने भी देश और दुनिया में ऐसी हवा बनाई कि जैसे यह क़ानून मुसलमानों के खिलाफ था। जबकि मोदी सरकार ने मुस्लिम देशों में सताए जा रहे गैर मुस्लिमों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए पहले से मौजूद कानून को थोड़ा लचीला किया था, ताकि वे भारत की नागरिकता ले सकें। मोदी सरकार के लिए यह लिटमस टेस्ट था कि वह मानवाधिकारों की सुरक्षा के अपने एजेंडे पर चलेगी या झुक जाएगी। लेकिन मोदी सरकार टस से मस नहीं हुई। हां इतना जरुर हुआ कि सरकार तीन साल चुप करके बैठ गई, अपने अगले एजेंडे को बर्फ में डाल दिया।
इस साल के शुरू में एक और एजेंडा लागू हो चुका है। यह काम था मुगलों की वाहवाही करने वाले झूठे इतिहास वाली पाठ्य पुस्तकों को कूड़ेदान में फेंकना और सही इतिहास की पाठ्य पुस्तकों को स्कूली शिक्षा में लागू करवाना, ताकि बच्चे अपना इतिहास सही से जान सकें। साम्प्रदायिक आधार पर इस बड़े ऐतिहासिक सुधार का विरोध तो हुआ, लेकिन सरकार ने सुधरी हुई पाठ्य पुस्तकें लागू कर दी हैं।
मोदी सरकार चार सालों में चार बड़े मुद्दों पर अपने एजेंडे को लागू कर चुकी है। अब इन सब एजेंडों से बड़े एजेंडे की बारी है, जो भारत को सही अर्थों में सेक्यूलर देश बनाएगा। यह एजेंडा है "एक देश - एक क़ानून" को लागू करने का, यानि कॉमन सिविल कोड बनाना। संविधान के अनुच्छेद 44 में लिखा है कि राज्य देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा।
दुनिया के 125 से ज्यादा देशों में कॉमन सिविल कोड लागू है, यहाँ तक कि भारत के गोवा राज्य में भी कॉमन सिविल कोड लागू है। भारत की सुप्रीमकोर्ट कम से कम एक दर्जन बार सरकारों को यह याद दिला चुकी है कि उसे समान नागरिक संहिता बनानी है। लेकिन जब जब सुप्रीमकोर्ट का फैसला आया, तब तब तथाकथित सेक्यूलर दलों और मुसलमानों ने विरोध शुरू कर दिया। यहां तक कि धर्म को अफीम मानने वाले कम्युनिस्ट भी धर्म आधारित कानूनों की वकालत करने लगते हैं।
भारतीय जनता पार्टी शुरू से ही समान नागरिक संहिता का समर्थन और मांग करती रही है। 370 की तरह यह भी उसके कोर एजेंडे में शामिल रहा है। उत्तराखंड और गुजरात विधान सभा चुनावों से पहले भाजपा ने समान नागरिक संहिता लागू करने का वायदा किया था। उत्तराखंड ने जन सुनवाई के बाद अपना प्रारूप तैयार भी कर लिया है। हजारों लोगों ने ड्राफ्ट बनाने में भूमिका निभाई।
राष्ट्रीय स्वय सेवक संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार लंबे समय तक जम्मू कश्मीर में रहे हैं, उन्होंने सुझाव दिया था कि जम्मू कश्मीर को तीन हिस्सों में बाँट कर कश्मीर समस्या का हल निकाला जा सकता है, उनके फार्मूले पर मंथन हुआ और नफा नुकसान का आकलन करने के बाद जम्मू कश्मीर को दो हिस्सों में बांटा गया। क्योंकि अगर जम्मू को अलग और कश्मीर को अलग राज्य बना दिया जाता, तो कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद कश्मीर शुद्ध रूप से मुस्लिम राज्य हो जाता।
अब वही अरुण कुमार समान नागरिक संहिता पर गंभीर काम कर रहे हैं। दुनिया भर के संविधानों को भी खंगाला जा रहा है, ताकि सब की अच्छी बातें समान नागरिक संहिता बनाते समय शामिल की जा सकें। अरुण कुमार भाजपा और संघ में तालमेल का काम भी देखते हैं। पिछले दिनों भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, संघ के सहसरकार्यवाह अरुण कुमार और संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर में इस मुद्दे पर मंथन हुआ है। बैठक में उत्तराखंड के प्रारूप को भी देखा गया।
संगठन स्तर पर इस प्रारंभिक विचार विमर्श के बाद 17 अप्रेल को सरकारी स्तर पर एक उच्च स्तरीय बैठक हुई है, जिसमें गृहमंत्री अमित शाह, विधि मंत्री किरन रिजीजू, अटार्नी जनरल तुषार मेहता के अलावा दोनों मंत्रालयों के दर्जन भर अधिकारी भी मौजूद थे। बैठक में एक आयोग बना कर प्रारूप तैयार करने और फिर उस पर जनता की राय लेने का फार्मूला तय हुआ है, जैसा कि उत्तराखंड में किया गया था।
संविधान निर्माताओं की दो बातें ध्यान में आती है। पहली है, अनुच्छेद 370 और दूसरी, समान नागरिक संहिता। इन दोनों के बारे में संविधान निर्माताओं ने लिखा था कि 1952 में लागू व्यवस्था अस्थाई है, यानि 370 को जल्द से जल्द हटाया जाएगा, और धार्मिक आधार पर चल रही परम्पराओं और कानूनों को भी जल्द से जल्द खत्म करके समान नागरिक संहिता बनाई जाएगी। नेहरू सरकार ने दोनों ही मामलों में देश के साथ बेईमानी की।
संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करने की प्रतिबद्धता के बावजूद उन्होंने बहुमत का नाजायज फायदा उठा कर 1956 में हिन्दुओं के लिए तो हिन्दू कोड बिल पास करवा दिया, जिसमें कई क़ानून बनाए गए, जो सिर्फ हिन्दुओं और हिन्दुओं के विभिन्न सम्प्रदायों पर लागू होते हैं। लेकिन मुसलमानों, ईसाईयों और पारसियों को उनकी परंपराओं के अनुसार चलने के लिए खुला छोड़ दिया गया।
नतीजा यह निकला कि हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध तो प्रगतिशील कानूनों में बंध गए। जैसे वे अपनी 18 साल से कम उम्र की बेटियों की शादी नहीं कर सकते, लेकिन मुसलमानों, ईसाईयों, पारसियों पर यह क़ानून लागू नहीं होता। मुसलमानों पर उनके अपने मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड का क़ानून चलता है, जिसके अनुसार वे 9 साल की बच्ची की शादी भी कर सकते हैं, उन पर बाल विवाह निरोधक क़ानून भी लागू नहीं होता।
हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध बिना पहले तलाक के दूसरी शादी नहीं कर सकते, लेकिन मुसलमान चार शादियां कर सकते हैं। तलाक के मामले में मुस्लिम महिलाओं की जो दुर्गति थी, उसे सुप्रीमकोर्ट के आदेश से मोदी सरकार ने क़ानून बना कर थोड़ा ठीक किया है, अब मुस्लिम पति एक ही सांस में तलाक तलाक तलाक कह कर अपनी पत्नी को घर से नहीं निकाल सकते। लेकिन अभी भी मुस्लिम औरतों की दुर्गति करने वाले हलाला जैसे मुस्लिम क़ानून लागू हैं।
इसी तरह देश में बच्चा गोद लेने का क़ानून बना हुआ है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड मुसलमानों को बच्चा गोद लेने का अधिकार नहीं देता। इसे भी सुप्रीमकोर्ट ने 2014 में थोड़ा ठीक किया है। जब सुप्रीमकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि जब तक अनुच्छेद 44 के अनुसार कॉमन सिविल कोड नहीं बनता, तब तक देश के क़ानून सब पर लागू होंगे। इस तरह तलाक और बच्चा गोद लेने के कानून सुप्रीमकोर्ट के हस्तक्षेप से मुसलमानों पर लागू हुए।
इसी तरह जमीन के बंटवारे का मामला है। आप को एक उदाहरण दे कर समझाता हूं कि वहां कैसे मौलवी तय करते हैं कि परिवार में जमीन का बंटवारा कैसे होगा। उत्तर प्रदेश की जमीला खातून के पति का देहांत हो गया था, उसके पति ने खुद जमीन खरीदी थी, उसकी चार बेटियां थीं, लेकिन उसका देवर उस जमीन में से हिस्सा मांग रहा था। जमीला खातून मामले को मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के पास ले गई, जिसने फैसला दिया कि इस्लाम में पुश्तैनी जमीन का कोई सिद्धांत नहीं, सब कुछ व्यक्तिगत होता है।
बोर्ड ने फैसला दिया कि जमीन के 24 हिस्से किए जाएं, जिसमें से तीन हिस्से वह खुद रखे, चार हिस्से देवर को दें, और बाकी के 17 हिस्से अपनी चार बेटियों में बराबर बांट दे, हर बेटी को सवा चार हिस्सा मिलेगा। यानि खुद खरीदी गई जमीन में से उस की पत्नी को तो तीन हिस्से मिले, लेकिन भाई को चार हिस्से मिले, जिसका न कुछ लेना, न देना।
कॉमन सिविल कोड पर हंगामा तो बहुत होगा, अब तक का सब से बड़ा हंगामा होगा। शायद यह नागरिकता संशोधन क़ानून और कृषि कानूनों के विरोध से भी बड़ा हंगामा होगा। क्योंकि सुन्नी मुसलमानों का सबसे बड़ा देवबंद मदरसा पहले ही कॉमन सिविल कोड के खिलाफ प्रस्ताव पास कर चुका है, लेकिन पश्चिम देशों से जैसी सपोर्ट उन्हें नागरिकता संशोधन क़ानून बनने पर मिली थी, वैसी कॉमन सिविल कोड पर नहीं मिलेगी, क्योंकि 125 से ज्यादा देशों में कॉमन सिविल कोड पहले से लागू है। हां मुस्लिम देशों से उन्हें सपोर्ट जरुर मिलेगा।
विपक्ष को भी पता है कि 2024 में हिन्दू वोट बैंक का समर्थन हासिल करने के लिए भाजपा का यह मास्टर स्ट्रोक होगा। इसकी काट के लिए विपक्ष ने अपना एजेंडा पहले ही चल दिया है। विपक्ष ने जातीय आधार पर जनगणना की मांग को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है, ताकि भाजपा अगर समान नागरिक संहिता के नाम पर हिन्दुओं को एकजुट करना चाहती है, तो जातीय गणना के नाम पर उनमें फूट डाली जा सके। जातीय जनगणना का विरोध करती आ रही कांग्रेस ने भी प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिख कर जाति आधारित जनगणना करवाने की मांग की है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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