Tripura Election: त्रिपुरा के त्रिकोणीय संघर्ष में आसान नहीं भाजपा के लिए सत्ता में वापसी
त्रिपुरा में 16 फरवरी को और मेघालय व नागालैंड में 27 फरवरी को विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। इसमें भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती त्रिपुरा को लेकर है जहां उनकी सरकार है।

Tripura Election: पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के इस माह होने वाले विधानसभा चुनाव के 90 दिनों के भीतर दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक में भाजपा को अपनी सरकार बचाने की चुनौती होगी, वहीं भाजपा को नवंबर में राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में सत्ता के लिए लड़ना होगा और मध्य प्रदेश को बचाने की चुनौती होगी। ऐसे में 2 मार्च को पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के नतीजे अगर भाजपा के पक्ष में आए, तो आगे के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा में उत्साह होगा।
त्रिपुरा विधानसभा चुनाव को देखें तो भाजपा त्रिपुरा में फिर से अपनी सरकार बनाने को लेकर आश्वस्त है। इसका कारण भी है। त्रिपुरा एकमात्र ऐसा पूर्वोत्तर का राज्य है जहां 2018 में भाजपा ने 60 सदस्यीय विधानसभा में 36 सीटें जीतकर अपने बलबूते बहुमत हासिल करते हुए दो दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहे वाम मोर्चा को हराया था। भाजपा को यहां आदिवासी पार्टी इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आइपीएफटी) के साथ गठबंधन ने आदिवासियों के लिए सुरक्षित 20 सीटों में से 18 जीतने में मदद की। भाजपा ने 10 और स्थापित आइपीएफटी ने 8 सीटें जीतीं।
अब, पांच साल बाद भाजपा सत्ता विरोधी लहर, उभरते विपक्षी गठबंधन और एक नई लेकिन जनजातीय ताकत के उदय जैसी कई चुनौतियों से रू-ब-रू है। विपक्षी दलों ने वादे पूरे करने में नाकाम रहने और बढ़ती राजनीतिक हिंसा को लेकर सरकार को घेरा तो भाजपा ने इसका जवाब ऐन चुनाव से 10 महीने पहले मुख्यमंत्री को बदलकर दिया। बिप्लब देब की जगह माणिक साहा सीएम बने। भाजपा को भरोसा है कि माणिक साहा के नेतृत्व और मोदी की लोकप्रियता के दम पर भाजपा लगातार दूसरी बार त्रिपुरा में सत्ता पर काबिज होगी।
लेकिन त्रिपुरा में भाजपा को सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों के विद्रोह से मिल रही है। विधायक सुदीप राय बर्मन और आशीष कुमार साहा ने भाजपा को छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है। कई और विधायक टिकट कटने से नाराज चल रहे हैं और पार्टी की उम्मीदों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। भाजपा और उसके सहयोगी दल के आठ से ज्यादा विधायकों और नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है।
दूसरी तरफ, दशकों तक इस क्षेत्र में सत्तासीन रही कांग्रेस अपना अस्तित्व बचाने के लिए लड़ रही है। त्रिपुरा और नगालैंड विधानसभाओं में इनका सूपड़ा साफ है, वहीं पिछली बार मेघालय में सबसे बड़ा दल बनकर उभरी कांग्रेस के सभी विधायक अन्य दलों में शामिल हो चुके हैं। हाल यह है कि अब भाजपा को पूर्वोत्तर में अपने विस्तार की योजना में थोड़ी-बहुत चुनौती क्षेत्रीय दलों से ही मिल रही है, कांग्रेस से नहीं।
त्रिपुरा में 2018 में माकपा 16 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि कांग्रेस खाली हाथ रही। माकपा को 42 फीसद वोट मिले थे तो भाजपा को 44 प्रतिशत। वोट शेयर के हिसाब से देखे तो माकपा ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी। इस बार माकपा और कांग्रेस नया गठबंधन बनाकर भाजपा के सामने चुनौती पेश कर रही है। नये गठबंधन के तहत माकपा 46 सीटों पर और कांग्रेस 13 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वामपंथियों और कांग्रेस का खेल ख़राब करने के लिए तृणमूल कांग्रेस भी मैदान में है, जिसकी नजर वामपंथियों और कांग्रेस के वोटबैंक पर है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता टिपरा मोथा है। शाही वंशज प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा के नेतृत्व में यह पार्टी काफी हद तक खुद को मूल जनजातियों की अगुआ के तौर पर स्थापित करने में सफल रही है, जिनकी त्रिपुरा की आबादी में करीब 30 फीसदी हिस्सेदारी है। भाजपा ने मोथा से गठबंधन की कोशिश की, लेकिन वह विफल रही क्योंकि देबबर्मा ने दो टूक कह दिया कि उनकी पार्टी ग्रेटर टिपरालैंड गठन के लिखित आश्वासन के बिना किसी से हाथ नहीं मिलाएगी। उनकी मांग है कि टीटीएएडीसी के तहत आने वाले क्षेत्र और 36 गांवों को मिलाकर अलग राज्य बनाया जाए।
त्रिपुरा की राजनीति के जानकारों का कहना है कि त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में नवगठित राजनीतिक दल 'टिपरा मोथा' के किंगमेकर' के रूप में उभरने की पूरी संभावना है और इस चुनाव में उसका मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल इंडिजेनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ इंडिया और कांग्रेस तथा वाम गठबंधन के साथ होगा। टिपरा मोथा ने त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद के लिए 2021 में हुए चुनावों में शानदार प्रदर्शन कर निकाय की 30 में से 18 सीट हासिल की थी।
टिपरा मोथा ने त्रिपुरा विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का फैसला किया है और उसे 20 जनजातीय बहुल सीट पर जीत की उम्मीद है। कुल 60 सदस्यीय विधानसभा चुनाव वाले पूर्वोत्तर राज्य में यह सीटें बहुत अहम होगी।
सत्तारूढ़ भाजपा ने 55 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है और अपने सहयोगी आईपीएफटी के लिए मात्र पांच सीटें छोड़ी है। हालांकि भाजपा और आईपीएफटी गोमती जिले की अम्पीनगर विधानसभा सीट पर दोस्ताना चुनाव लड़ेगे। भाजपा आईपीएफटी गठबंधन ने 2018 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे के 25 साल के लंबे शासन को उखाड़ फेंका था। भाजपा ने 10 एसटी अनुसूचित जनजाति आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों सहित 36 सीट पर जीत हासिल की थी जबकि भाजपा के सहयोगी को आठ सीट पर जीत हासिल हुई थी।
2018 में भाजपा का सहयोगी रहे और इस 2023 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रहे आईपीएफटी की मैदानी स्थिति अच्छी नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आईपीएफटी ने टिपरालैण्ड राज्य की अपनी मूल मांग को पूरा करने में विफल रहने के कारण आमजन का भरोसा खोया है।
भाजपा का आकलन है कि त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति में भाजपा के पास टिपरा मोथा और कांग्रेस वाम मोर्चा गठबंधन के मुकाबले में बढ़त होगी, क्योकि भाजपा विरोधी वोट उनके बीच विभाजित हो जांएगे।
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बहरहाल, त्रिपुरा विधानसभा के लिए मतदान 16 फरवरी को होगा और मतगणना दो मार्च को की जाएगी। माकपा अकेले 43 सीटों पर चुनाव लड़ रही है जबकि वाम मोर्चा के अन्य घटक दल फॅारवर्ड ब्लॉक, आरएसपी और भाकपा एक एक सीट पर लड़ रहे है। वाममोर्चा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ रही कांग्रेस ने 13 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। टिपरा मोथा ने 42 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 28 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। पार्टियों के उम्मीदवारों के अतिरिक्त 58 निर्दलीय भी मैदान में है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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