Politicians and Sports: खेल संघों को राजनीतिज्ञों से मुक्त करने का समय

महिला पहलवान राक्षसी प्रवृति वाले नेताओं के खिलाफ अपनी जंग जरूर लड़ें,लेकिन खुद को किसी के राजनीतिक स्वार्थ का हथियार न बनने दें।

Time to free sports federations from politicians

कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह और पहलवानों के बीच महाजंग चल रही है। पहलवान बृजभूषण को कुश्ती संघ से खदेड़ना चाहते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक बैकिंग इतनी ज्यादा मजबूत है कि वे कुछ नहीं कर पा रहे। बृज भूषण शरण सिंह राजनीतिक योद्धा है, तो उनके सामने वे पहलवान हैं, जिन्होंने ओलंपिक और एशियन गेम्स में मेडल जीत कर देश का नाम रोशन किया है।

कुछ महिला पहलवान चार महीने से बृजभूषण शरण सिंह पर यौन शोषण का आरोप लगा रही हैं, लेकिन बृजभूषण शरण सिंह न सिर्फ उन्हें नकार रहे हैं, बल्कि चुनौती भी दे रहे हैं कि साबित करो। सरकारी अमला महिला पहलवानों के आरोपों को एक कान से सुन कर दूसरे कान से बाहर निकाल रहा है। इसका कारण यह है कि बृजभूषण शरण सिंह लोकसभा के सांसद हैं। प्रशासन किसी सांसद पर हाथ डालने से डरता है, खासकर तब, जब सांसद सत्ताधारी पार्टी का हो।

Time to free sports federations from politicians

पिछली बार कुछ पहलवान 18 जनवरी को धरने पर बैठे थे, तब बार बार कहा जा रहा था कि यौन शोषण के आरोप झूठे हैं, ये लड़कियां एफआईआर दर्ज क्यों नहीं करवाती। तब लडकियों ने कहा था कि वे लोकलाज से डरती हैं। ऊपर से आदेश हुआ तो खेलमंत्री अनुराग ठाकुर बीच में पड़े थे, लगातार तीन दिन बैठकें होती रहीं। अंतत: कुछ मांगे मान ली गई थीं और यौन शोषण के आरोपों की जांच के लिए दो कमेटियां बना दी गईं थी।

एक कमेटी मंत्रालय की थी और दूसरी ओलंपिक खेल एसोसिएशन की, जिसकी अध्यक्ष पी.टी. उषा हैं। इन दो कमेटियों का गठन होने के बाद धरना समाप्त हो गया था। इन कमेटियों ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, लेकिन खेल मंत्रालय रिपोर्ट दबा कर बैठा है। 12 लड़कियां कमेटी के सामने पेश हुई थीं, लेकिन जांच कमेटियों ने खबर उड़ा दी कि किसी ने भी यौन शोषण के आरोप नहीं लगाए। उड़ती उड़ती खबर आई कि कमेटियों ने बृजभूषण को क्लीन चिट दे दी है। पी.टी. उषा ने जिस तरह धरने के खिलाफ बयान दिया है, उससे भी उन खबरों की पुष्टि होती है कि रिपोर्ट में बृज भूषण शरण सिंह को क्लीन चिट दे दी गई है।

सरकार की इस लीपापोती शैली के खिलाफ आखिर लड़कियों को पुलिस स्टेशन जाना पड़ा। सात लड़कियों ने कनाट प्लेस पुलिस स्टेशन जाकर बाकायदा यौन शोषण की शिकायत दर्ज करवाई। इनमें एक लडकी तो 17 साल की थी। यह पोक्सो का गंभीर मामला था, लेकिन बृजभूषण शरण सिंह के भाजपा का सांसद होने के कारण एफआईआर दर्ज नहीं की गई। यह बात अखबारों में आ गई थी, लेकिन बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी आँखें बंद कर ली और कानों में रुई घुसा ली।

राजधानी दिल्ली में यह हाल है, तो अंदाज लगाईए कि देश के बाकी हिस्सों में क्या हाल होगा। देश के शासक तब भी नहीं जाग रहे जब पीड़ित लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, तो यह कैसा क़ानून का शासन है। मैं खुद उत्तराखंड बाल अधिकार संरक्षण आयोग का अध्यक्ष रहा हूँ। मैंने अखबारों में छपी खबरों के आधार पर नोटिस लेकर पुलिस और अन्य अधिकारियों को तलब करने का रिकार्ड बनाया था। केदारनाथ आपदा के बाद आयोग की एक स्पेशल रिपोर्ट में मृतक बच्चों और प्रभावित बच्चों की सूची छाप कर अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने का काम किया था। सरकार को आयोग की रिपोर्ट सदन में रखनी पड़ी थी, जिस पर विधानसभा में हंगामा हुआ था। ये आयोग सरकारी भोंपू बनने के लिए नहीं होते।

इससे अच्छा उदाहरण तो महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने पेश किया, जिन्होंने शिकायत मिलते ही पुलिस को नोटिस जारी किया। पुलिस और बाल आयोग की अनदेखी के कारण धरने पर बैठी बच्चियों को सुप्रीमकोर्ट में दस्तक देनी पड़ी, तब जाकर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। क्या ऐसे हालात में इन माफियाओं से कोई मामूली आदमी टक्कर ले सकता है?
सुप्रीमकोर्ट को उस थाने के अधिकारी को तलब करके पूछना चाहिए कि उसने किस के कहने पर एफआईआर पहले दर्ज नहीं की थी। इस मामले में राजनीतिक संरक्षण देने वाले नेता भी बेनकाब होने चाहिए। यह राजनीतिक संरक्षण का ही नतीजा है कि सुप्रीमकोर्ट से फटकार के बाद भी पुलिस धरना स्थल पर खाने का सामान नहीं जाने दे रही। जिन खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया, उनके साथ ऐसा सलूक हमारी राजनीति का सबसे घिनौना चेहरा है।

बृजभूषण शरण सिंह कोई दूध के धुले नहीं हैं कि उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में इतना टाईम लगता। उनके खिलाफ 38 केस पहले से दर्ज हैं, जिनमें 302 का केस भी है, लेकिन अदालतों ने उन्हें संरक्षण दे रखा है। ये भारत की अदालते ही हैं, जो माफियाओं को संरक्षण देती हैं, तभी तो चालीस साल से अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, आनन्द मोहन, प्रभुनाथ सिंह, पप्पू यादव और बृजभूषण शरण सिंह हत्याओं के आरोपी होने के बावजूद विधानसभाओं और लोकसभा में पहुंच जाते हैं।

क्योंकि अदालतें उन्हें संरक्षण देती हैं, इसलिए राजनीतिक दल उन्हें टिकट देते हैं। अतीक अहमद सपा के सांसद थे, प्रभुनाथ सिंह राजद के सांसद थे, तो बृज भूषण शरण सिंह भाजपा के सांसद हैं। बृज भूषण सिंह पर 38 केस पहले से थे, वह उस उत्तर प्रदेश से सांसद हैं, जहां योगी आदित्यनाथ ने माफियाओं के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। लेकिन बृजभूषण शरण सिंह भाजपा को भी चुनौती देते घूम रहे हैं कि टिकट काट कर दिखाएं।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते एक बार सुझाव आया था कि जिस व्यक्ति के खिलाफ अदालतें दो मामलों में चार्जशीट का संज्ञान ले ले, उसे चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया जाए, लेकिन राजनीतिक दलों में सहमति नहीं बनी। उनकी हर मुकद्दमे को राजनीतिक चाल कहने की आदत बन गई है। कम से कम हत्या, बलात्कार और पोक्सो मामले में तो केस दर्ज होने पर ही चुनाव लड़ने से वंचित किया जाना चाहिए। चलों माना कि मोदी राजनीतिक सहमति के अभाव में इन माफियाओं के चुनाव लड़ने पर रोक नहीं लगवा सकते, तो कम से कम इन सब के खेल एसोसिएशनों के पदाधिकारी बनने पर रोक लगाने का क़ानून तो बनवा दें, वह तो उनके हाथ में है।

देश का दुर्भाग्य यह है कि राजनीति में भयंकर जातिवाद घुसा हुआ है, जो अब खेल एसोसिएशनो में भी धड़ल्ले से घुस गया है। बृजभूषण शरण पर लगे आरोपों को भी जातिगत नजरिए से देखा जा रहा है। क्योंकि धरने पर बैठे सारे खिलाड़ी जाट समुदाय से हैं, और बृज भूषण शरण सिंह ठाकुर हैं, इसलिए विपक्षी दलों के जाट नेताओं ने जंग में कूद कर इस अच्छाई और बुराई की जंग को जाट बनाम ठाकुर की लड़ाई बना दिया है।

जातिगत राजनीति होने का एक सबूत यह भी है कि हरियाणा के गैर जाट खिलाड़ी धरने पर नहीं बैठे। जबकि मोदी के खिलाफ जंग का बिगुल बजा चुके जाट नेता सत्यपाल मलिक ने धरने पर जा कर इस जंग को जाट बनाम ठाकुर बना दिया, क्योंकि जब वह एक इंटरव्यू में पिछली सरकार के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ बोले थे, तब भी वह जाट बनाम ठाकुर बना रहे थे।

प्रियंका गांधी और केजरीवाल ने धरने पर पहुंच कर बृज भूषण शरण के इस आरोप की पुष्टि की है कि इस धरने के पीछे विपक्ष का हाथ है। पिछली बार जब वृंदा कारत धरने पर पहुंची थी, पहलवानों ने एक तरह से उन्हें धक्के मार कर निकाल दिया था। लेकिन सत्यपाल मलिक, प्रियंका वाड्रा और केजरीवाल के साथ ऐसा नहीं किया गया। मोदी विरोधी मीडिया ने भी इसे मोदी विरोधी जंग बना दिया है, तभी एक बड़े न्यूज चेनल की एंकर जब घटना को कवर करने जंतर मंतर पहुंची तो विपक्षी दलों के घुसपैठियों ने गोदी मीडिया कह कर उसके खिलाफ नारे लगाए।

इससे शक पैदा होता है कि कहीं महिला पहलवानों का राजनीतिक इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है। यह शक इसलिए पैदा होता है क्योंकि नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ मुसलमानों का और कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का राजनीतिक इस्तेमाल हुआ था। महिला पहलवान राक्षसी प्रवृति वाले नेताओं के खिलाफ अपनी जंग जरूर लड़ें, लेकिन खुद को किसी के राजनीतिक स्वार्थ का हथियार न बनने दें।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+