नरेंद्र मोदी सरकार के सामने आएंगी ये पांच समस्याएं
Modi Government: नरेंद्र मोदी को जब सात जून को एनडीए संसदीय दल का नेता चुन लिया गया था, तो उन्होंने कहा था कि इससे पहले भी एनडीए सरकार थी, अब भी एनडीए सरकार बन रही है। पहले भी नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री थे, अब भी वही प्रधानमंत्री बन रहे हैं, फिर हम हारे कैसे और वे जीते कैसे।
ऐसा उन्होंने इसलिए कहा था क्योंकि कांग्रेस और इंडी एलायंस के घटक दल अपनी जीत का जश्न मना रहे थे, राहुल गांधी जब कांग्रेस कार्यालय में मीडिया के सामने आए तो मुस्कराते हुए उन्होंने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि आप सोच रहे होंगे कि यह कमाल हमने किया कैसे। खुशी का इससे बढिया इजहार कुछ और नहीं हो सकता था।

राहुल गांधी के लिए यह बहुत बड़ी बात थी कि पिछ्ला चुनाव हारने के बाद झेंप मिटाने के लिए उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था। कांग्रेस और इंडी एलायंस के बाकी घटक दलों को इस बात का अफ़सोस नहीं है कि संविधान, लोकतंत्र, आरक्षण जैसे नेरेटिव गढने के बावजूद वे मोदी को प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोक पाए, लेकिन उन्हें इस बात की खुशी है कि नरेंद्र मोदी अब बेलगाम प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे।
पहली बार उन्हें 9 सहयोगी दलों के 5 केबिनेट और 6 राज्यमंत्री बनाने पड़े हैं। तीस सदस्यीय केबिनेट में पहली बार पांच केबिनेट मंत्री एचडी कुमारस्वामी, जीतन राम मांझी, ललन सिंह, राम मोहन नायडू और चिराग पासवान गैर भाजपा दलों से हैं, इसके अलावा जयंत चौधरी स्वतंत्र प्रभार के मंत्री बनाए गए हैं। यही अंतर है पहले की एनडीए सरकार में और अब बनी एनडीए सरकार में, जो मोदी को समझ में तो आ रहा है, लेकिन वह भी झेंप मिटाने के लिए बोल नहीं रहे हैं।

चंद्रबाबू नायडू तो खैर 2018 में मोदी का साथ छोड़ गए थे, लेकिन पिछले पांच सालों में एक साल छोड़ कर नीतीश कुमार तो मोदी के साथ एनडीए सरकार में ही थे, उन्हें पूरा अनुभव है किस तरह 17 सांसद जीतने के बाद भी घटक दलों से बात कर रहे अमित शाह ने उन्हें एक केबिनेट और एक राज्यमंत्री पद देने से इनकार कर दिया था। कैसे नरेंद्र मोदी ने बिना उनकी सहमति लिए मनमाने ढंग से जेडीयू अध्यक्ष आरपी सिंह को अपने मन्त्रिमंडल में शामिल कर लिया था।
अब मोदी ऐसा नहीं कर सकते, अलबत्ता इस बार तो जेडीयू के 12 सांसद जीते हैं, लेकिन मोदी को एक केबिनेट मंत्री और एक राज्य मंत्री बनाना पड़ा। मोदी के घोर विरोधी रहे ललन सिंह को केबिनेट मंत्री और कर्पूरी ठाकुर के बेटे राम नाथ ठाकुर को राज्यमंत्री बनाया गया है। इसी तरह 16 लोकसभा सीटें जीतने वाले तेलुगु देशम के भी दो मंत्री बनाने पड़े, येरानायडू के बेटे राम मोहन नायडू कैबिनेट मंत्री और चन्द्र शेखर पम्मासानी राज्य मंत्री बनाए गए हैं।
नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस की ओर से मनाए जा रहे जीत के जश्न की यह कह कर खिल्ली उडाई थी कि जो पिछले तीन चुनावों में जीते अपने सांसद जोड़ कर भी हमारी इस बार की परफोर्मेंस के बराबर नहीं पहुंचे, वे खुद को जीता हुआ बता रहे हैं। कांग्रेस 2014 में 44, 2019 में 52 और 2024 में 99 सीटें जीती है, जो कुल मिला कर 195 बनती हैं, जबकि भाजपा इस बार भी 240 सीटें जीती है।
नतीजों को देखने का अपना अपना नजरिया होता है, 63 सीटें घटने के बाद मोदी को यह कहने का हक है कि फिर भी हम जीते हैं। लेकिन राहुल गांधी को खुशी इस बात की भी है कि दस साल बाद कम से कम कांग्रेस को लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष का दर्जा तो मिलेगा। स्वाभाविक है कि यह खुशी होनी भी चाहिए कि 2014 और 2019 को मिला कर कांग्रेस को उतनी सीटें नहीं मिलीं थीं, जितनी इस बार मिली हैं। इंडी एलायंस के लिए खुशी की बात यह है कि सिर्फ कांग्रेस नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा की सीटें बढी हैं और उद्धव ठाकरे भी 9 सीटें जीतने में कामयाब रहे।
विपक्ष की खुशी जायज है क्योंकि दस साल बाद पहली बार मोदी अंदरुनी और बाहरी दबावों को झेलते हुए सरकार चलाएंगे। बाहर से विपक्ष इतना मजबूत होगा कि सरकार को संसद में हर बिल पर विरोध का सामना करना पड़ सकता है, और सरकार के भीतर से घटक दलों के इतने दबाव होंगे कि मोदी भाजपा के एजेंडे को लागू नहीं कर पाएंगे। ऐसे पांच मुद्दों की शिनाख्त अभी की जा सकती है, जिन पर सरकार के भीतर मोदी दबावों में होंगे।
सबसे पहला मुद्दा है नौकरियों और शिक्ष्ण संस्थाओं में प्रवेश के लिए मुस्लिम कोटा, जिसे धार्मिक आधार पर दिया गया आरक्षण बता कर मोदी ने चुनावों में विरोध किया था, आंध्र प्रदेश में चार प्रतिशत मुस्लिम कोटा लागू है, जिसे चंद्रबाबू नायडू ने ही अपनी पिछली सरकार के समय लागू किया था, और इस चुनाव में उन्होंने वायदा किया है कि मुस्लिम आरक्षण लागू रहेगा। वह ऐसा कोई क़ानून नहीं बनाने देंगे, जिससे मुस्लिम आरक्षण कोटे में कोई बाधा आए। इस मुद्दे पर नीतीश कुमार भी उनके साथ होंगे।
दूसरा मुद्दा है समान नागरिक संहिता। भाजपा के तीन मुख्य मुद्दों में से एक यही मुद्दा बचा था, जिसे मोदी ने अब तक लागू नहीं किया था, यह मुद्दा उन्होंने अपनी तीसरी टर्म के लिए छोड़ रखा था, क्योंकि यह मुद्दा भी मुस्लिमों और ईसाईयों से जुडा है, इसलिए एनडीए सरकार में इसे लागू करना करना असंभव होगा। इसी तरह एनआरसी का भी मुस्लिम समुदाय विरोध कर रहा है, तो चन्द्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार चाहेंगे कि एनआरसी को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए। चुनावों में अमित शाह ने एक नहीं अनेक बार कहा था कि एनआरसी देश भर में लागू किया जाएगा और जल्द ही लागू किया जाएगा।
बाकी दो विषय हैं अग्निवीर और डिलिमिटेशन। जेडीयू के महासचिव और नीतीश कुमार के अत्यंत करीबी केसी त्यागी ने अग्निवीर योजना पर पुनर्विचार करने की मांग रख दी है, इसका मतलब है कि चुनाव नतीजों पर उसके असर को देखते हुए जैसे पिछली बार मोदी सरकार ने तीनों कृषि क़ानून वापस लिए थे, उसी तरह अग्निवीर योजना या तो वापस लेनी पड़ेगी या उसमें इतना बदलाव किया जाएगा कि वह स्वीकार्य हो सके।
सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है डिलिमिटेशन, 1973 में अगले पचास सालों के लिए लोकसभा की सीटें सील कर दी गईं थी, यानि यह तय हो गया था कि देश की आबादी भले ही कितनी भी बढ़े अगले 50 साल तक लोकसभा की सीटें नहीं बढ़ेंगी। पिछले 50 सालों में देश की आबादी दुगनी से ज्यादा हो चुकी है। अब अगला लोकसभा चुनाव डिलिमिटेशन के बाद होगा। पिछली मोदी सरकार ने नया संसद भवन बना कर और महिला वन्दन बिल पास करवा कर लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत बढी हुई सीटें आरक्षित कर दी थीं। इसका मतलब यह हुआ कि लोकसभा की 33 प्रतिशत सीटें बढ़ेंगी, जिन पर महिलाएं ही चुनी जाएँगी।
डिलिमिटेशन आबादी के हिसाब से होगा, जिसका दक्षिण भारतीय राज्य विरोध कर रहे हैं, क्योंकि पिछले 50 साल में दक्षिण भारतीय राज्यों ने परिवार नियोजन को बेहतर ढंग से लागू किया है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों ने परिवार नियोजन को कड़ाई से लागू नहीं किया। नतीजतन डिलिमिटेशन में दक्षिण भारत की सीटें यथावत रह सकती हैं, जबकि उत्तर भारत की सीटें बढ़ जाएंगी। दक्षिण भारतीय राज्य इस तरह का डिलिमिटेशन चाहते हैं कि लोकसभा में दक्षिण भारतीय सीटों का मौजूदा अनुपात बना रहे। इस मुद्दे पर अगर मोदी सरकार सर्वमान्य हल नहीं निकाल पाई तो चन्द्र बाबू नायडू तेलंगाना, तमिलनाडू, कर्नाटक और केरल के मुख्यमंत्रियों के साथ खड़े होंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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