Qatar: आतंक का आका कतर बना रहा है भारत पर दबाव
इसी साल अप्रैल महीने की बात है। उस समय कांग्रेस के प्रवक्ता जयराम रमेश ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया था कि कतर में गिरफ्तार किये गये 8 भारतीय नागरिकों की रिहाई के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही है। जयराम रमेश ने कहा था कि ऐसा इसलिए क्योंकि अडानी इलेक्ट्रिसिटी, मुंबई में कतर का सावरेन वेल्थ फंड लगा हुआ है। इस पर जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि "हम कतर पर दबाव नहीं बना सकते। हमें नहीं लगता कि दो देशों के अच्छे संबंध का असर उनके यहां की कानूनी कार्रवाई को प्रभावित करने के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए। लेकिन हम परिस्थितियों पर नजर बनाये हुए हैं।"

आज लगभग 6 महीने बाद जब उन सभी 8 भारतीयों को फांसी की सजा सुना दी गयी है तब उसी विदेश मंत्रालय के वही प्रवक्ता कह रहे हैं कि "हम फांसी दिये जाने के फैसले से स्तब्ध हैं।" इसका अर्थ यह है कि एक ही मामले में आज से 6 महीने पहले भारत का विदेश मंत्रालय जो आकलन करके चल रहा था, निर्णय उसके विपरीत आ गया तो वह स्तब्ध रह गया। संभवत: विदेश मंत्रालय को उम्मीद थी कि अल दहरा कंपनी में काम करनेवाले भारत के आठ पूर्व नेवी कर्मचारियों/अधिकारियों को जासूसी के आरोप से मुक्त करके रिहा करवा लिया जाएगा। लेकिन कतर के कोर्ट ने उन्हें "जासूसी का दोषी" पाया और फांसी की सजा सुना दी।
असल में भारत के जिन 8 नागरिकों को फांसी की सजा सुनायी गयी है वो सभी वहां अल दहरा टेक्नॉलाजी नामक एक निजी कंपनी में काम करते थे। ये कंपनी भारत के एक पूर्व नौसैनिक कमांडर पूर्णेन्दू तिवारी ने बनायी थी। ये सभी लोग वहां कतर के लिए किसी स्माल स्टील्थ वारशिप के प्रोजेक्ट में तकनीकी मदद कर रहे थे। पिछले साल अगस्त 2022 में इन सबको गिरफ्तार कर लिया गया। इन पर आरोप लगा कि ये लोग इजरायल के लिए जासूसी करते हैं। इस गिरफ्तारी के बाद अल दहरा कंपनी बंद हो गयी। जो आठ लोग गिरफ्तार किये गये उनमें 7 नेवी के रिटायर्ड कमांडर या कैप्टन हैं जबकि एक पूर्व नौसैनिक है।
भारत के लिए यह कोई सामान्य घटना नहीं थी कि कतर में एक साथ आठ भारतीय पूर्व सैनिक गिरफ्तार कर लिये जाएं। काउन्सलर एक्सेस के जरिए भारत सरकार की ओर से कानूनी मदद भी दी गयी लेकिन आखिरकार कतर के कोर्ट में जासूसी का दोष सिद्ध हो गया। अब क्योंकि कतर में देशद्रोह और जासूसी के लिए मृत्युदंड की सजा का प्रावधान है इसलिए आरोप सिद्ध होने के बाद उन्हें फांसी की सजा सुना दी गयी।
आगे राजनयिक जगत में उन्हें बचाने के लिए जो कानूनी उपाय करने होंगे वह भारत सरकार की ओर से अवश्य किए जायेंगे लेकिन फिलहाल तो वो सभी कतर की जेलों में ही बंद रहेंगे। इस प्रकरण से इतना तो साफ हो गया है कि कतर को लेकर भारत सरकार का जो भी आकलन रहा हो वह निराधार साबित हुआ है। लेकिन यह कोई पहला मौका नहीं है जब आतंक का आका कहे जानेवाले कतर ने इस तरह से भारत के सामने मुश्किल पैदा की है।
अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब भाजपा प्रवक्ता नुपुर शर्मा पर नबी निंदा का आरोप लगाकर भारत के मुसलमानों ने खूब उपद्रव किया था। आनन फानन में बीजेपी ने भी उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया था। लेकिन उस मौके पर जब अरब का कोई देश भारत के आंतरिक मामले में बोलने से बच रहा था तब कतर ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। कतर ने भारत के राजदूत को बुलाकर पूरे मामले को आपत्तिजनक बताया था। तब कतर ने ही यह बात कही थी कि राजदूत ने उन्हें स्पष्ट किया था कि ये भारत सरकार की नीति नहीं बल्कि कुछ फ्रिंज एलिमेन्ट का काम है।
संभवत: कतर का ही दबाव था कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने आनन फानन में नुपुर शर्मा और नवीन जिन्दल को पार्टी से बाहर निकाल दिया था। इस बात के लिए आज तक भाजपा की आलोचना होती है कि जब इन लोगों ने कुछ ऐसा कहा ही नहीं जो इस्लामिक हदीसों में पहले से मौजूद नहीं है तो फिर इन्हें पार्टी से क्यों निकाल दिया गया? लेकिन कतर का मोदी सरकार पर प्रभाव ऐसा था कि पार्टी कार्यकर्ताओं की भावना से अधिक कतर की धमकी का ध्यान रखा गया, यह जानते हुए भी कि कतर घोषित तौर पर आतंक का आका है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक उसे आतंकवाद को फंड करनेवाला कह चुके हैं।
आज से 6 साल पहले उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने साफ कहा था कि "दुर्भाग्य से कतर बहुत ऊंचे स्तर पर आतंकवाद को पैसे देता है। इसीलिए अरब के कई देश मेरे पास आये और कतर के इस व्यवहार के बारे में शिकायत की। इस बारे में हमारा कहना है कि कतर को आतंकी विचारधारा को प्रमोट करने के लिए पूंजी नहीं देनी चाहिए। हम सभी देशों से कहना चाहते हैं कि दूसरे के खिलाफ नफरत फैलानेवाले और दूसरों की हत्या करनेवाली शिक्षा और फंड दोनों को बंद करना होगा।" हालांकि एक सच यह भी है कि खाड़ी देशों में अमेरिका का सबसे बड़ा मिलिट्री बेस आज भी कतर में ही है।
डोनाल्ड ट्रंप ने कतर के बारे में यह बात केवल अरब देशों की शिकायत पर बोली हो, ऐसा भी नहीं है। अफगानिस्तान में अगर अमेरिका असफल हुआ तो उसके पीछे कहीं न कहीं कतर की भूमिका और पैसा भी था जो तालिबान के साथ खड़ा था। कतर की राजधानी दोहा तालिबानियों के दूसरे घर जैसा था जहां बैठकर वो अफगानिस्तान पर फिर से कब्जा करने और वहां की लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकने की योजनाएं बनाते थे। वहीं पर वो दुनिया के दूसरे देशों के साथ अपनी गुप्त वार्ताएं करते थे। आखिरकार एक सीमित युद्ध के बाद अगस्त 2021 में तालिबान ने दोबारा से अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया और अमेरिका को वहां से जाने के लिए सेफ एक्जिट दे दिया।
कतर पर आरोप है कि तालिबान ही नहीं वह अल कायदा, अल नुसरा, आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों को भी हर प्रकार की मदद करता रहा है। एक बार 2014 में सीएनएन ने जब इस बारे में वहां के अमीर शेख तमीम अल थानी से सवाल किया तो उनका जवाब था कि इन संगठनों को वो आतंकी संगठन ही नहीं मानते। वर्तमान समय में जिस हमास ने इजरायल पर हमला किया उस हमास के शीर्ष कमांडर भी कतर में ही बैठे बताये जाते हैं। हमास का लीडर इस्माइल हानिया इस समय कतर में ही रह रहा है।
कतर के बारे में कहा जाता है वह 360 डिग्री की कूटनीति करता है इसलिए एक ही समय में जहां अमेरिका का मिलिट्री बेस भी रखता है तो ईरान से भी संबंध बनाये रखता है और तालिबान व हमास को भी मदद करता है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह भी कतर से उसी तरह की नीति अपनाये जैसे अमेरिका की है। मात्र 28.5 लाख की आबादी वाले कतर में सिर्फ 40 प्रतिशत ही कतरी मूल के अरब हैं। बाकी के 60 प्रतिशत बाहरी हैं जिसमें 21 प्रतिशत लोग भारतीय मूल के हैं। वहां की कुल जनसंख्या में 15 प्रतिशत हिन्दू हैं फिर भी कतर अपनी कट्टर इस्लामिक नीति के तहत सरकारी वेबसाइट पर हिन्दुओं के बारे में लिखते हुए नापाक मूर्तिपूजक भी बताता है। यानी इस युग में भी वह अपनी कट्टर इस्लामिक विचारधारा को नहीं छोड़ना चाहता भले ही उसका बड़ा पूंजी निवेश भारत में हुआ हो।
भारत का विदेश मंत्रालय भले ही अच्छे संबंधों का हवाला देता रहा हो लेकिन कतर को जहां लगा कि यहां हमें भारत को सबक सिखाना है वह सिखा देता है। फिर चाहे वह नुपुर शर्मा प्रकरण हो, फीफा वर्ल्डकप के दौरान जाकिर नाईक को बुलाने का मामला हो या फिर अब 8 भारतीय नागरिकों को जासूस बताकर फांसी की सजा सुनाने का मामला हो। वह वही करता है जो वह करना चाहता है। इसके लिए आपसी संबंधों की रत्तीभर भी परवाह नहीं करता। कतर के मामले में भारत को भी पूंजीनिवेश की चिंता किये बगैर ठीक वही नीति अपनानी चाहिए, तब शायद आतंक के आका को अपनी औकात समझ में आये।












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