Electoral Bonds: कॉरपोरेट घरानों का धंधा, राजनीतिक दलों को चंदा
Electoral Bonds: पांच साल पहले जिस चुनावी बांड को चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता लाने और चुनावों में कालाधन के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए लाया गया था, देश की सबसे बड़ी अदालत ने उसे असंवैधानिक घोषित करते हुए उस पर रोक लगा दी है।
दरअसल चुनावी बांड के विरोधियों को उसे लेकर सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि बांड के जरिए राजनीतिक दलों को दान देने वाले लोगों के नाम का खुलासा नहीं हो रहा था। चुनावी बांड की अधिसूचना इसके लिए दानदाता को अपनी गोपनीयता की सहूलियत देती थी। चुनावी बांड देने वाले का नाम सूचना के अधिकार के दायरे से भी बाहर था।

ऐसे में आरोप लगता था कि चुनावी बांड के जरिए राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले दरअसल बांड के रूप में रिश्वत दे रहे हैं और अपने कारोबारी या औद्योगिक हितों के लिहाज से बदले में सत्ताधारी दल से पसंदीदा नीतियां बनवा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के रोक लगाने के बाद चुनावी बांड विरोधियों का यह कहना कि अब पता चल पाएगा कि बांड के जरिए दान देने वाले लोग सचमुच दान दे रहे थे या फिर अपने हितों की रक्षा की भी मांग कर रहे थे।
गांधीजी ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान आम लोगों से चंदा लेने की शुरूआत की। हालांकि उस दौर में भी बिड़ला और बजाज जैसे औद्योगिक घराने कांग्रेस के बड़े दानदाता थे। लेकिन आम लोगों से चंदा लेने के पीछे भावना यह थी कि लोग इसके जरिए आंदोलन से तो जुड़ेंगे ही, उनका नैतिक दबाव आंदोलन कर रही कांग्रेस पर भी रहेगा। इसलिए वह लोकविरोधी फैसले नहीं ले पाएगी।
आजादी के बाद के दिनों में चाहे समाजवादी धारा के दल हों या जनसंघ या फिर वामपंथी, सब क्राउड फंडिंग या आम लोगों के जरिए ही धन जुटाते थे। लेकिन जैसे-जैसे भारत में औद्योगीकरण बढ़ता गया, औद्योगिक घराने भी चुनावी चंदा देने में आगे रहने लगे। निश्चित तौर पर इसका सबसे ज्यादा फायदा सत्ताधारी दलों को ही हुआ। एक दौर तक देश और राज्यों की सत्ता के लिए अपरिहार्य बनी रही कांग्रेस को इसीलिए सबसे ज्यादा चुनावी चंदा मिलता रहा।
चुनावी बांड को लेकर जारी घमासान के बीच पता चला है कि इसके जरिए सबसे ज्यादा दान भारतीय जनता पार्टी को मिला है। भाजपा को सबसे ज्यादा धन मिलना आजादी के बाद से ही जारी परिपाटी का विस्तार कहा जा सकता है। 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' के मुताबिक विगत पांच वर्षों में चुनावी बांड के जरिए सबसे ज्यादा 6,566 करोड़ का दान भारतीय जनता पार्टी को मिला है।
दूसरे नंबर पर कांग्रेस है, जिसे 1,123 करोड़ रुपए का दान मिला। तीसरे नंबर तृणमूल कांग्रेस है, जिसे 1093 करोड़ रुपए की रकम मिली। 774 करोड़ रुपए के दान के साथ इस सूची में बीजू जनता दल तीसरे नंबर पर है। जबकि चौथे नंबर पर डीएमके है, जिसे 617 करोड़ रुपए मिले हैं। जाहिर है कि जिसके पास जितनी सत्ता है, उसी अनुपात में उसे चंदा मिला है।
इसमें दो राय नहीं है कि मौजूदा चुनावी परिदृश्य में राजनीति शाहखर्ची का पेशा हो गया है। अकूत धन के बिना चुनाव लड़ना और राजनीतिक दल चलाना आसान नहीं है। शायद इसीलिए अब चुनावी प्रचार अभियान के लिए मीडिया ने कारपोरेट बमबारी का विशेषण दिया है। जाहिर है कि यह खर्च कारोबारी और औद्योगिक घरानों से ही आ सकता है। आम जनता से मिलने वाले चंदे या दान से राजनीति करना आज के दौर में मुश्किल है। यही वजह है कि चुनावों में काला धन का इस्तेमाल बढ़ा है।
चुनाव आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद अब भी चुनावों में काले धन का भरपूर इस्तेमाल होता है। जाहिर है कि जो चुनावी चंदा देगा, वह अपने हित की बात तो करेगा ही। चुनावी बांड को खारिज किए जाने के बाद गैर भाजपा दलों ने भाजपा को कटघरे में खड़े करने की कोशिश जरूर की है। राहुल गांधी ने भी ट्वीट करके हमला बोला है लेकिन सवाल यह है कि क्या उनके हाथ पाकसाफ है?
सवाल यह भी है कि क्या वे अगर भाजपा की तरह प्रभावी होते और सत्ता में उनकी हनक होती तो क्या वे आम लोगों के चंदे के आधार पर ही अपनी राजनीति करते? निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। बेशक चुनाव बांड को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है, लेकिन यह भी सच है कि जिस तरह की राजनीति आज के दौर में हो रही है, जिस तरह से अर्थ तंत्र का बोलबाला बढ़ा है, चुनावी बांड ना सही किसी और रूप में धन तो राजनीति की दुनिया में आएगा ही।
क्या होता है चुनावी बांड?
सबसे पहले जानते हैं कि आखिर क्या होता है चुनावी बांड? चुनावी बांड साल में चार बार यानी जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में जारी किए जाते हैं। इसे जारी करने का अधिकार देश के सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को ही है। स्टेट बैंक अपनी चुनी हुई 29 शाखाओं के जरिए इसे जारी करता है जिनमें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, गांधीनगर, पटना, रांची, भोपाल, जयपुर और बेंगलुरू स्थित शाखाओं में ही जाकर इसे खरीदा जा सकता है। चुनावी बांड ऑनलाइन भी खरीदा जा सकता है।
चुनावी बांड को खरीदने का अधिकार लोक प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29 ए के तहत रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों को ही है। चुनावी बांड खरीदने के लिए राजनीतिक दलों के लिए एक और शर्त है। वह शर्त है कि उन्हें पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव के दौरान कम से कम एक फीसद वोट हासिल किए हों।
यह बांड खास तरह से काम करता है। चुनावी बांड जिन महीनों में जारी होता है, उसके जारी होने के दस दिनों के भीतर कोई कॉरपोरेट, व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह इसे खरीद सकता है। इन बांड की वैधता पंद्रह दिनों की होती है। ये बांड एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ मूल्य के होते हैं। बांड को नगद नहीं खरीदा जा सकता। इसके लिए खरीदने वाले को अपना केवाईसी भी कराना होता है।
कालेधन के खिलाफ आया था चुनावी बांड
अक्सर चुनावों की फंडिंग में अवैध धन के इस्तेमाल का आरोप लगता रहा है। इसे ही सफेद बनाने के लिए साल 2017 में मोदी सरकार ने चुनावी बांड जारी करने का फैसला किया था। लेकिन इस योजना को 14 सितंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट में चुनाव सुधारों की दिशा में काम करने वाले संगठन 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (एडीआर) ने चुनौती दी थी।
एडीआर की इस याचिका पर तीन अक्टूबर 2017 को देश की सबसे बड़ी अदालत ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। इसी दिन जया ठाकुर और सीपीआई एम ने भी इस याचिका में खुद को शामिल करने की अर्जी लगाई। इस बीच 2 जनवरी 2018 को केंद्र सरकार ने इस योजना को अधिसूचित करके लागू कर दिया। शुरू में बांड की बिक्री के लिए 70 दिनों की मियाद रखी गई थी, जिसे 7 नवंबर 2022 को बढ़ाकर 85 दिन कर दिया गया।
इस बीच 16 अक्टूबर 2023 को मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने इस याचिका को पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सुनवाई के लिए भेजा। इसके पंद्रह दिन बाद पीठ ने याचिका पर सुनवाई की। लगातार तीन दिनों की सुनवाई के बाद दो नवंबर 2023 को पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और 15 फरवरी 2014 को अपना फैसला सुनाया। फैसले में चुनावी बांड को सर्वोच्च अदालत ने असंवैधानिक घोषित करते हुए उस पर रोक लगा दी है। चुनाव आयोग ने भी इस योजना की खामियों को गिनवाते हुए कहा है कि इस योजना के जरिए राजनीति और धन के बीच सांठगांठ को बढ़ावा मिलता है।
देखने की बात यह है कि आर्थिक उदारीकरण के दौर में जिस तरह जीवन के हर क्षेत्र पर पैसे का बोलबाला बढ़ा है, उसकी वजह से पैसे के राजनीतिक इस्तेमाल और राजनीति पर पैसे का प्रभाव जरूरी बुराई बन चुका है। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों को देखिए। वहां ताकतवर उम्मीदवार वही माना जाता है, जिसे सबसे ज्यादा चंदा मिलता है। चंदा वहां आम वोटर और समर्थक भी देते हैं, लेकिन चंदे का बड़ा हिस्सा कारपोरेट घराने ही देते हैं। जिसे ज्यादा पैसा मिलता है, उसे ही चुनावी दौड़ में आगे माना जाता है।
इसके उलट इस प्रक्रिया को इस तरह भी समझ सकते हैं कि जो जीत रहा होता है, उसे ही सबसे ज्यादा दान मिलता है। भारत ने अमेरिका-ब्रिटेन का पूंजीवादी उदारीकरण अपना लिया तो वहां के राजनीतिक दलों को मिलने वाली दान संस्कृति भारत में प्रभाव क्यों नहीं जमाती? चुनावी बांड पर सर्वोच्च न्यायालय भले ही रोक लगा दे, गैर भाजपा दल भाजपा की चाहे जितनी भी आलोचना कर लें, लेकिन यह तय है कि चुनावी रण के खर्च के लिए धन जुटाने की कोई और राह जरूर खोज ली जाएगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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