SC Judgement on EC: गलती किसकी, संसद और सरकार की, या सुप्रीमकोर्ट की
संसद को चुनाव आयोग के बारे में पहले ही क़ानून बना लेना चाहिए था। जिसमें गोस्वामी समिति की सिफारिश से अलग चयन समिति भी बन सकती थी।

SC Judgement on EC: सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले के समर्थन और विपक्ष में कई दलीलें आ रही हैं, जिसमें कहा गया है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक ऐसी कमेटी करेगी, जिसमें प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता के अलावा चीफ जस्टिस भी एक सदस्य होंगे| सर्वसम्मति से फैसला करने वाली जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार भी शामिल थे|

विपक्ष इस फैसले से गदगद है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट में कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला मील का पत्थर है और लोकतंत्र की जीत है| संविधान पीठ के इस फैसले का स्वागत करते हुए ममता ने लिखा कि लोगों की इच्छा का सम्मान हुआ है| कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ भाजपा के प्रयासों को देखते हुए यह फैसला महत्वपूर्ण है| पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने कहा कि इस ऐतिहासिक फैसले से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को सरकार के प्रभाव से बचाने और चुनावी प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने में मदद मिलेगी|
विपक्ष बहुत खुश है, लेकिन आज का विपक्ष कई दशकों तक सत्ता में रह कर अपनी मनमर्जी से चुनाव आयुक्त नियुक्त करता रहा है| सुप्रीमकोर्ट के फैसले से यह भी सवाल खड़ा होता है कि अगर किसी की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता में मतभेद होंगे, तो चीफ जस्टिस को किसी का पक्ष लेना पड़ेगा, उस समय उसकी निष्पक्षता कहाँ जाएगी| इसलिए न्यायपालिका को कार्यपालिका के फैसलों में दखल देने से दूर रहना चाहिए|
फैसले के विपक्ष में आई दलीलों में सब से बड़ी बात यह कही जा रही है कि यह कार्यपालिका और विधायिका के कार्यक्षेत्र में दखल है| अदालतें चुनाव आयुक्तों के चयन में ईमानदारी पर सवाल उठा सकती हैं, वे कानून के अनुसार चुनाव आयोग की गतिविधियों पर सवाल उठा सकती हैं, वे सुधार के लिए सरकार को सिफारिशें भी कर सकती हैं, लेकिन चुनाव आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया तय करना सुप्रीमकोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है|
यह संविधान में तय शक्तियों के विभाजन का उल्लंघन है, जो बहुत ही खतरनाक है| यह बिलकुल वैसा ही है, जैसे हाईकोर्टों और सुप्रीमकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम बना रखा है| कोलेजियम प्रणाली पर तरह तरह के सवाल तो उठ ही रहे हैं, कोलेजियम के साथ सरकार का टकराव भी चल रहा है, क्योंकि जजों की नियुक्ति में सरकार और राष्ट्रपति की भूमिका नगण्य हो गई है। जबकि संविधान में जजों की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया था, जिसमें राष्ट्रपति सरकार की सलाह पर जजों को नियुक्त करते थे। इसके बाद इसमें सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस की सलाह को भी जोड़ा गया, और बाद में सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि चीफ जस्टिस की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होगी|
संसद ने जजों की नियुक्ति के लिए क़ानून बनाकर नई व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की, तो सुप्रीमकोर्ट ने संसद के क़ानून को भी रद्द कर दिया| कोलेजियम प्रणाली से न्यायपालिका में भाई भतीजावाद चल रहा है, जिससे न्यायपालिका में चाचाओं भतीजों की बाढ़ आ गई है, क्योंकि कोलेजियम के फैसले को कहीं चुनौती नहीं दी जा सकती|
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में सुप्रीमकोर्ट का फैसला जया ठाकुर नाम की एक महिला की याचिका पर आया है| याचिका में कहा गया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी कोलेजियम प्रणाली जैसी होनी चाहिए| एक अन्य याचिकाकर्ता भाजपा के ही एक नेता और सुप्रीमकोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय भी थे| अश्विनी उपाध्याय ने 2017 में एक जनहित याचिका दायर कर चुनाव आयुक्त को और अधिक मजबूत और स्वतंत्र बनाने के लिए ठोस कदम की मांग की थी| उनकी याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त समेत अन्य आयुक्तों की नियुक्ति को भी पारदर्शी बनाने की बात कही गई थी|
सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद कोलेजियम प्रणाली के आलोचकों का कहना है कि सुप्रीमकोर्ट अब अपनी हदें पार कर रहा है| न्यायपालिका का काम यह सुनिश्चित करना है कि संविधान और संसद से बने कानूनों का पालन किया जाए, सुप्रीमकोर्ट को संविधान में बदलाव करने का कोई अधिकार नहीं है|
सुप्रीमकोर्ट के फैसले की आलोचना अपनी जगह तार्किक है, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि वह जिस तीन सदस्यीय पैनल की व्यवस्था कर रहा है, वह तब तक जारी रहेगी, जब तक संसद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रणाली तय नहीं करती| सवाल यह खड़ा होता है कि पिछले 75 साल में संसद ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई प्रणाली विकसित क्यों नहीं की|
ऐसा नहीं है कि इस पर कभी विचार नहीं किया गया| बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं। 1990 में जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे, तब चुनाव सुधारों के लिए असम के सांसद दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी थी| कमेटी में कांग्रेस के एच.के.एल. भगत, भाजपा के लाल कृष्ण आडवानी, माकपा के सोमनाथ चटर्जी, नेशनल कांफ्रेंस के गुलाम रसूल मट्टू, जनता दल के चिमन भाई मेहता, सीपीआई के इन्द्रजीत, पूर्व राज्यपाल एल.पी.सिंह, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.एल. शकधर और तीन पूर्व सांसद भी थे, जिनमें से एक कांग्रेस से, एक जनता दल से और एक कम्युनिस्ट पार्टी से ताल्लुक रखते थे| इस कमेटी ने अपनी दो तरह की सिफारिशें की थीं, पहली तरह की 11 सिफारिशों में चुनाव सुधारों और आयोग को तीन सदस्यीय बनाने जैसी निम्न लिखित सिफारिशें थीं|
1. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को रिटायरमेंट के बाद किसी भी सरकारी या संवैधानिक नियुक्ति के अयोग्य माना जाए, जिसमें राज्यपाल का पद भी हो| (हालांकि बाद में कांग्रेस सरकार ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को सांसद और मंत्री भी बनाया था|)
2. किसी को भी दो से ज्यादा निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी जाए|
3. सभी चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल किया जाए|
4. वोटिंग बूथों पर क़ब्ज़ा करने से रोकने और वोटरों को डराने धमकाने जैसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त क़ानून बनाया जाए|
5. वोटिंग वाले दिन मोटर गाड़ियाँ चलाना, हथियार लेकर चलना, शराब का वितरण चुनावी अपराध घोषित होना चाहिए|
6. वोटरों को बहुउद्देश्यीय पहचान पत्र दिए जाए ताकि फर्जी वोटिंग पर रोक लग सके|
7. चुनाव आयोग में दो नए चुनाव आयुक्त बनाकर आयोग को बहुसदस्यीय बनाया जाए|
8. सभी चुनावी मुद्दों की जाँच के लिए संसद की एक स्थायी समिति का गठन किया जाए|
9. निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत राशि बढ़ायी जानी चाहिए और एक चौथाई वोट हासिल नहीं करने वाले उम्मीदवारों की जमानत राशि जब्त की जानी चाहिए|
10. वोटर लिस्ट तैयार करने वाले सरकारी कर्मचारियों की ओर से सरकारी ड्यूटी का उल्लघंन करने पर दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए|
11. आयोग के पर्यवेक्षकों को क़ानूनी हैसियत प्रदान की जाए और उन्हें कुछ हालातों में मतगणना रोकने का अधिकार दिया जाए|
इन ग्यारह सिफारिशों के अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों को मनोनीत करने की प्रणाली विकसित करने की सिफारिश भी की गई थी| यह सिफारिश इस तरह थी|
1. मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति को चीफ जस्टिस और लोकसभा में विपक्ष के नेता की सलाह से करनी चाहिए, अगर विपक्ष का नेता मौजूद नहीं हो, तो लोकसभा में सब से बड़े दल के नेता से सलाह ली जानी चाहिए|
2. सलाह को कानूनी दर्जा दिया जाना चाहिए| (यानी इस संबंध में क़ानून बनाया जाए)
3. अन्य दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चीफ जस्टिस और विपक्ष के नेता के अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त से भी सलाह ली जाए|
गोस्वामी कमेटी की कुछ सिफारिशें लागू भी हो चुकी हैं, जैसे क़ानून में संशोधन कर के आयोग को बहुसदस्यीय बना दिया गया| इस समय तीन सदस्यीय चुनाव आयोग काम कर रहा है| ईवीएम से चुनाव, वोटर आईडी कार्ड, वोटिंग वाले दिन हथियार लेकर चलना, शराब की बिक्री और वितरण चुनावी अपराध घोषित करना आदि भी लागू हो चुके हैं| लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को दिनेश गोस्वामी कमेटी की सिफारिश के अनुरूप पारदर्शी नहीं बनाया गया| सुप्रीमकोर्ट का फैसला गोस्वामी कमेटी की सिफारिश के अनुरूप ही है, गोस्वामी कमेटी की सिफारिश में चयन समिति में प्रधानमंत्री को रखने की सिफारिश नहीं की गई थी, लेकिन संविधान पीठ ने चयन समिति में प्रधानमंत्री को भी रखा है|
वैसे जरूरी नहीं कि सरकार सुप्रीमकोर्ट के फैसले से सहमत हो, संभवत पूर्व की सरकारें गोस्वामी समिति की इस सिफारिश से सहमत नहीं थीं कि चयन प्रक्रिया में चीफ जस्टिस का कोई दखल हो| इसीलिए नरसिंह राव, देवेगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी, मनमोहन सिंह और मोदी सरकारों ने पहले वाली प्रक्रिया को ही जारी रखा, लेकिन सरकार के पास चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने का पर्याप्त समय था|
कम से कम 2017 में जब सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल हुई थी, उसके बाद भी सरकार के पास पांच साल थे, जब वह चयन प्रक्रिया का कानून बना सकती थी| खासकर तब जब सुप्रीमकोर्ट ने पहले भी एक बार रिटायर्ड जज को मुख्य चुनाव आयुक्त और मुख्य सूचना आयुक्त बनाने की सिफारिश की थी| सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि कोलिजियम को सही ढंग से चुनौती नहीं दिए जाने के कारण न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा कर कार्यपालिका और विधायिका में अपना दखल बढ़ाने की हर संभव कोशिश कर रही है| उसे तो बहाना चाहिए था और याचिकाओं ने सुप्रीमकोर्ट को मौक़ा दे दिया|
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इसलिए संसद को चुनाव आयोग के बारे में पहले ही क़ानून बना लेना चाहिए था| जिसमें गोस्वामी समिति की सिफारिश से अलग चयन समिति भी बन सकती थी, जैसे चयन समिति में प्रधानमंत्री के साथ राज्यसभा के नेता, दोनों सदनों में विपक्ष के नेताओं और लोकसभा स्पीकर को भी शामिल किया जा सकता है| यह काम सरकार अब भी कर सकती है| लेकिन अगर सुप्रीमकोर्ट के फैसले को ही लागू रखा गया, तो कल को सुप्रीमकोर्ट के जज अन्य प्राधिकरणों की नियुक्तियों में भी दखल देने लगेंगे|
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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