Shiv Sena Case Judgement: जब विश्वासमत अवैध था तो उस पर बनी सरकार कैसे वैध हो गयी?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से महाराष्ट्र में शिंदे सरकार तो बच गयी लेकिन कुछ सवाल भी बचे रह गये हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब गवर्नर द्वारा बुलाया गया विश्वासमत अवैध था तो उस विश्वासमत पर बनी सरकार कैसे वैध हो गयी?

Shiv Sena supreme court judgement how did the government formed become valid

पिछले साल 20 जून को शिवसेना में हुई बगावत और उसके बाद महाराष्ट्र में बनी शिंदे सरकार को लेकर जिन लोगों ने किसी बड़े राजनीतिक उलटफेर की उम्मीद लगा रखी थी, उन्हें गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जरूर थोड़ी निराशा हुई होगी।
गुरुवार को संवैधानिक पीठ के फैसले में देश की सर्वाेच्च न्यायालय ने भले ही उद्धव ठाकरे की सरकार को बहाल नहीं किया हो और 16 विधायकों की अयोग्यता का मामला स्पीकर के पाले में डाल दिया हो, लेकिन संवैधानिक सिद्धांतों को मजबूती देने के लिहाज से यह बेहद महत्वपूर्ण फैसला माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने इस मामले में 11 महीने बाद फैसला दिया है। इस पीठ में जस्टिस एमआर शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल थे। पीठ ने पिछली उद्धव ठाकरे सरकार की बहाली का आदेश भले ही न दिया हो, लेकिन यह स्पष्ट करने में कोई कमी नहीं छोड़ी कि विधानसभा में बहुमत परीक्षण कराने का तत्कालीन राज्यपाल का फैसला असंवैधानिक और पूर्णत: गलत था। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि 'न तो संविधान और न ही कानून राज्यपाल को यह शक्ति देता है कि वह विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच या किसी खास दल के अंदर उभरे विवादों को निपटाने में कोई भूमिका निभाए।'

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपाल ने जितने भी इनपुट, सूचनाओं और संकेतो पर भरोसा किया, उनमें से कोई भी यह नहीं बताता कि असंतुष्ट विधायक सरकार से समर्थन वापस लेने की मंशा रखते थे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने विश्वास मत का सामना करने से पहले ही खुद इस्तीफा नहीं दिया होता और विश्वास मत का सामना किया होता तो हम उद्धव ठाकरे की सरकार को बहाल कर सकते थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना किए बिना ही इस्तीफा दे दिया था इस कारण यथास्थिति यानी जून 2022 वाली स्थिति बहाल नहीं की जा सकती। इसलिए राज्यपाल की ओर से सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी के समर्थन से शिंदे को शपथ दिलाने का फैसला उचित था। ऐसे में एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह रही कि सर्वाेच्च न्यायालय ने अपने फैसले में शिंदे गुट समर्थित विधायक भरत गोगावले को शिवसेना का व्हिप नियुक्त करने के फैसले को भी गैरकानूनी और गलत बताया। इस मामले में कोर्ट का यह स्पष्टीकरण आगे भी पीठासीन अधिकारियों का मार्गदर्शन करेगा कि व्हिप की नियुक्ति विधायक दल के नहीं, पार्टी के अधिकार क्षेत्र की बात है।

अब सवाल यह उठता है कि चीफ व्हिप कौन होगा? क्या सुनील प्रभु जो उद्धव गुट के चीफ व्हिप हैं उनकी मानी जाएगी जाएगी या फिर शिंदे गुट नए सिरे से किसी अन्य विधायक को चीफ व्हिप नियुक्त करेगा। इसका फैसला विधानसभा अध्यक्ष को जुलाई में होने वाले विधानसभा सत्र से पहले या सत्र के दौरान करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि व्हिप की नियुक्ति केवल राजनीतिक दल का अधिकार है। जिस समय भरत गोगावले को शिंदे ने चीफ व्हिप नियुक्त किया था, तब उन्हें राजनीतिक दल के रूप में मान्यता नहीं मिली थी, लेकिन अब चुनाव आयोग उन्हें 'शिवसेना' राजनीतिक दल के रूप में मान्यता और चुनाव चिह्न भी आवंटित कर चुका है।

अपने दायरे का पूरा सम्मान करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विधायकों की पात्रता का फैसला स्पीकर पर छोड़ दिया। लेकिन सवाल यह उठता है कि विधानसभा अध्यक्ष कितने वक्त में विधायकों की पात्रता का फैसला करेंगे? क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 'उचित समय' की कोई सीमा निर्धारित नहीं की है। यानी विधानसभा अध्यक्ष अपनी सुविधा के अनुसार जितना चाहे उतना समय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। विधायकों को पात्र या अपात्र करने की प्रक्रिया लंबी भी चल सकती है, क्योंकि पहले इस मामले में दोनों पक्षों को नोटिस जारी होंगे। फिर दोनों पक्षों के साक्ष्य सुने जाएंगे। उसके बाद अध्यक्ष इस पर कानूनी सलाह लेंगे। उसके बाद कानून के अनुसार उस पर फैसला देंगे। ऐसे में निकट भविष्य में इस पर फैसला होने के कोई आसान नजर नहीं आते।

जाहिर है, इसके बाद मौजूदा शिंदे सरकार के अस्तित्व पर छाया संकट फिलहाल टल गया है। एक लिहाज से यह महाविकास आघाड़ी में शामिल कांग्रेस और शिवसेना के लिए झटका है तो वहीं इसी गठबंधन में शामिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के लिए राहत की खबर है।
असल में राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख नेता अजीत पवार इस आपदा में अपने लिए अवसर ढूढ़ रहे थे और महाराष्ट्र सरकार के प्रतिकूल फैसला आने पर अपने लिए मुख्यमंत्री पद की कुर्सी देख रहे थे। इसके लिए वह लगातार शरद पवार पर पिछले कुछ समय से दबाव भी बना रहे थे और यही शरद पवार और भतीजे अजीत पवार में मतभेद का कारण बन रहा था। जिस कथित संकट के कारण एनसीपी में फूट की आशंका जताई जा रही थी, वह संकट नहीं रहा तो अब सरकार बचाए रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की जरूरत भी भाजपा को नहीं रही।

इस पूरे प्रकरण में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि भले कोर्ट ने अपने फैसले में यह बात कही नहीं हो, लेकिन जब गवर्नर का फ्लोर टेस्ट कराने का फैसला अवैध साबित हो गया तो उसकी वजह से बनी सरकार की वैधता कैसे बरकरार मानी जा सकती है? उद्धव ठाकरे ने नैतिक आधार पर मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांग कर यही संकेत दिया है कि वह इस आधार पर मौजूदा सरकार को घेरते रहेंगे। अभी उन्हें स्पीकर के फैसले का इंतजार है जिसके बाद वो फिर से सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

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    फिलहाल शिंदे सरकार को भले ही राहत मिल गई हो लेकिन आने वाले चुनाव में मतदाता शिंदे सरकार को राहत देते है या नहीें यह देखना बाकी है। जनता की अदालत में फैसला किसके पक्ष में आता है इसका पता कुछ ही माह में होने वाले बीएमसी और अन्य नगरीय निकाय चुनाव में चल जाएगा। महाविकास अघाडी गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखने की भी होगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने के बाद विपक्ष के कुछ विधायक टूट कर शिंदे सरकार को समर्थन दे सकते है। अपने विधायकों को बचाना और आगामी चुनाव में अपने ज्यादा से ज्यादा विधायकों को जिताने की दोहरी चुनौती महाविकास अघाड़ी के सामने होगी।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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