Savarkar Movie: क्या भगत सिंह सावरकर के खिलाफ थे?
Savarkar Movie: अक्सर सावरकर की दया याचिकाओं की तुलना भगत सिंह के किसी पत्र से करके भगत सिंह को बड़ा दिखाया जाता है। जबकि कोई इस बात पर ध्यान नहीं देता कि आज जिस तरह से भगत सिंह के बहाने सावरकर को गालियां दिलाई जा रही हैं क्या भगत सिंह भी उसी तरह सावरकर के खिलाफ थे?
रिश्तों की इस बहस में तड़का लगा दिया है भगत सिंह के जन्मदिन से एक दिन पहले रिलीज हुई रणदीप हुड्डा की मूवी 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' ने। यह मूवी शुरू ही भगत सिंह के उस बयान से होती है, जिसमें भगत सिंह से कोई पूछता है कि जीवन की शुरूआत कैसे हुई थी तो वो जवाब देते हैं कि सावरकर की किताब '1857 स्वातंत्र्य समर' से।

इंटरवल के बाद मूवी में एक सीन है जिसमें भगत सिंह रत्नागिरी में सावरकर से मिलने आते हैं। सावरकर के आगे वो बच्चे ही थे, सो सावरकर उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं देते। लेकिन जब भगत सिंह मदन लाल धींगरा की तारीफ करते हैं तो सावरकर उन्हें गले लगा लेते हैं।
भगत सिंह दरअसल उनसे उनकी पुस्तक के एक संस्करण को छापने की अनुमति लेने गए थे ताकि उसे क्रांतिकारियों में बांटा जा सके। हालांकि इस तथ्य पर सावरकर विरोधी तूफान खड़ा कर देने वाले हैं। उन्होंने जो सोशल मीडिया में सावरकर के आगे भगत सिंह को कृत्रिम दुश्मन बनाकर खड़ा किया हुआ है, उस एजेंडे को इस मूवी का ये सीन कतई अच्छा नहीं लगता।
सावरकर की इस किताब के प्रति भगत सिंह के लगाव की कहानी उनके एक करीबी सहयोगी राजाराम शास्त्री ने विस्तार से 'अमर शहीदों के संस्मरण' में लिखी है। वो लिखते हैं, "वीर सावरकर द्वारा लिखित '1857 का स्वातंत्रय समर' पुस्तक ने भगत सिंह को बहुत अधिक प्रभावित किया था। पता नहीं कहां से भगत सिंह को ये पुस्तक प्राप्त हो गई थी। वह एक दिन इसे मेरे पास ले आए। जिससे ली है, उसे देनी होगी, इसलिए वो मेरे बहुत कहने पर भी देने को तैयार नहीं हो रहे थे। जब मैंने इसे जल्द से जल्द पढ़कर उसे अवश्य लौटा देने का वायदा किया तो तब उन्होंने वो पुस्तक मुझे बस 36 घंटे के लिए पढ़ने के लिए दी।"
जैसे तैसे जल्दी पढ़कर राजाराम शास्त्री ने ये किताब जब भगत सिंह को वापस कर दी तो एक दिन भगत सिंह उनसे बोले, "यदि तुम कुछ परिश्रम करने के लिए तैयार हो जाओ और थोड़ी मदद करने के लिए तैयार हो जाओ तो इस पुस्तक को गुप्त रुप से प्रकाशित करने का उपाय सोचा जाए''।
राजाराम शास्त्री लिखते हैं कि वो फौरन राजी हो गए थे। वो आगे लिखते हैं, "इस पुस्तक को दो खंडों में प्रकाशित किया गया, प्रत्येक खंड की कीमत आठ आना रखी गई, फिर गुप्त रुप से इसे बेचने का प्रबंध किया गया। मुझे याद है इस पुस्तक को सबसे पहले मैंने राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के हाथ बेचा था। इसके प्रकाशन से टंडन जी बहुत प्रसन्न हुए थे।"
वीर सावरकर की एक और किताब थी, जिससे कई उद्धरण भगत सिंह ने अपनी जेल नोटबुक में लिए हैं, उस किताब का नाम था 'हिंदू पदपादशाही'। अब जो उद्धरण इस किताब से भगत सिंह ने लिए हैं, उनको पढ़िए-
1. बलिदान तभी पूज्यनीय है, जब सफलता के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, लेकिन तार्किक रूप से इसकी अनिवार्यता सिद्ध होती हो। जो बलिदान अंत में सफलता की ओर अग्रसर नहीं करता, वो आत्महत्या है और मराठा युद्धनीति में इसकी कोई जगह नहीं थी।
2. अप्रतिरोधी शहादत जो करने में विफल रहती है, न्याय परायण या प्रतिरोधी शक्ति उसे कर डालती है तथा अत्याचारों को और अधिक हानि करने योग्य नहीं रहने देती।
3. धर्मान्तरित होने की बजाय मार डाले जाओ... (उस समय हिंदुओं के बीच यही पुकार प्रचलित थी) लेकिन रामदास उठ खड़े हुए और कहा, "नहीं नहीं, ऐसे नहीं, धर्मान्तरित होने से बेहतर है कि मार डाले जाओ, काफी है लेकिन इससे भी अच्छा ये प्रयास करना है कि न तो मारे ही जाओ और न ही धर्मान्तरित हो बल्कि स्वंय हिंसक शक्तियों को मार डालो। यदि मृत्यु अनिवार्य हो.. मारे जाओ, लेकिन जीत हासिल करने के लिए मारते हुए मरो, धर्म के लिए जीत हासिल करो।"
4. हमारे युग की सबसे निराशाजनक बात ये है कि हमें बिना साहसिक क्षमता और अवसरों के उन वीरतापूर्ण गीतों को गाना पड़ रहा है, जिन्हें हम जीवन में कभी वास्तविक नहीं बना सके।
इतना ही नहीं भगत सिंह ने सावरकर की पुस्तक के दूसरे भाग की शुरूआत में दी गई थॉमस मूर की कविता 'गो वेयर ग्लोरी वेट्स दी' से कुछ छंद लिए हैं। सावरकर ने इस कविता में कुछ त्रुटियां कर दी थीं, वही त्रुटियां भगत सिंह ने भी अपनी नोट बुक में कर दीं, क्योंकि उनका श्रोत सावरकर थे।
आप इतिहास खंगालेंगे तो ना आपको भगत सिंह का कोई बयान सावरकर के विरोध में नजर आएगा और ना ही सावरकर का कोई बयान भगत सिंह के विरोध में नजर आएगा। दिलचस्प बात ये है कि सावरकर और भगत सिंह दोनों ही सिनेमा प्रेमी थे।
बहुत कम लोगों को पता है कि सावरकर ने सिनेमा से जुड़े जो नए मराठी, हिंदी शब्द दिए, उनमें से कई आज भी चल रहे हैं। जब सावरकर पेंढारकर के हंस पिक्चर्स स्टूडियो गए तो इंगलिश में बोर्ड्स देख कर बड़े निराश हुए। तब उन्होंने जो नाम मराठी में सुझाए, वो आज हिंदी जगत में भी लोकप्रिय हो गए हैं- जैसे डायरेक्टर के लिए दिग्दर्शक, थिएटर के लिए कलाग्रह, सिनेमा हॉल के लिए चित्रगृह या चित्रपट गृह, मूवी के लिए चित्रपट, फोटोग्राफी के लिए छायाचित्रण, कॉस्ट्यूम के लिए वेशभूषा आदि।
बाद में उन्होंने एक डायरेक्ट्री ऐसे नए शब्दों की बनाई थी, जैसे सेलरी के लिए वेतन, नम्बर के लिए क्रमांक, लेजिस्लेचर के लिए विधि मंडल, पोस्ट के लिए डाक, रजिस्ट्रेशन के लिए पंजीकरण, टेलीवीजन के लिए दूरदर्शन, टेली प्रिंटर के लिए दूरमुद्रक आदि। कई बार लता मंगेशकर ने सावरकर से अपने पारिवारिक रिश्तों और फिल्मों में आने की अपनी प्रेरणा के तौर पर उनका जिक्र किया है। सावरकर ने लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर की थिएटर कम्पनी के लिए एक नाटक भी लिखा था- 'संन्यास खड़ग'।
भगत सिंह भी फिल्म देखने का कोई मौका चूकते नहीं थे। एक बार उनके फिल्म देखने के शौक के चलते क्रांतिकारियों के इतिहास में एक बड़ा फैसला हुआ था। ये वाकया 1927-28 का है। 'अंकल टॉम्स केबिन' नाम की एक अंग्रेजी फिल्म भारत के भी सिनेमाघरों में लगी थी। मूक फिल्मों का दौर था ये। इस फिल्म के डायरेक्टर थे हैरी ए पोलार्ड। इस फिल्म में अमेरिकी हब्शी गुलामों पर होने वाले अत्याचारों को दिखाया गया था। फिल्म के पोस्टर को देखकर भगत सिंह का मन फिल्म देखने का करने लगा। उनके साथ विजय सिन्हा और भगवान दास माहौर थे। पास में था कुल डेढ़ रुपया, यानी दो वक्त का तीनों के खाने लायक पैसा।
भगत सिंह अड़ गए कि चंद्रशेखर आजाद को मैं समझा लूंगा और डेढ़ रुपए की तीन टिकट ले आए। बाद में रात को उन्हें भूखा तो सोना पड़ा ही, भगत सिंह को चंद्रशेखर आजाद को यह समझाना पड़ा कि फिल्म विदेशियों के अत्याचारों पर बनी थी इसलिए वो देखने गये। उस दिन आजाद ने एक बड़ा फैसला लिया कि अब से हर क्रांतिकारी के पास जो बैग होगा, उसमें पांच रुपए का नोट सिला जाएगा, वो तभी निकाला जाएगा, जब और कोई रास्ता शेष नहीं बचेगा।
बहरहाल, सावरकर पर बनी इस मूवी में भी भगत सिंह का भी वैसे ही और उतना ही इस्तेमाल किया गया है, जितना सावरकर विरोधी दया याचिकाओं के मामले में उन्हें डरपोक दिखाने के लिए भगत सिंह का इस्तेमाल करते हैं। इस मूवी में सावरकर का कद भगत सिंह के मुकाबले काफी बड़ा दिखता है, बल्कि उस कविता 'हा भगत सिंह हा' का जिक्र तक नहीं हुआ, जो सावरकर ने भगत सिंह के लिए लिखी थी। जाहिर है भगत सिंह और सावरकर के निजी रिश्तों को बिना एजेंडे वाला व्यक्ति ही कभी पूरी तरह सामने ला सकता है। इस मूवी ने तो नाउम्मीद ही किया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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