Opposition Alliance: विपक्षी गठबंधन और प्रमुख क्षेत्रीय दलों में दरार चौड़ी

चार बड़े क्षेत्रीय राजनैतिक दलों ने भाजपा विरोधी इंडिया गठबंधन (पूर्ववर्ती यूपीए) के इस आरोप की हवा निकाल दी है कि भाजपा या मोदी सरकार देश के लोकतंत्र के लिए खतरा है।

ये चार दल हैं वाईएसआर कांग्रेस, बीजू जनता दल, बहुजन समाज पार्टी और तेलुगु देशम पार्टी। ये चारों बड़ी पार्टियां हैं, दो पार्टियों की दो राज्यों में सरकार है, और बाकी दो दलों की अपने अपने राज्यों में सरकार रही है।

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वाईएसआर कांग्रेस की न सिर्फ आंध्र प्रदेश में सरकार है, बल्कि उसके लोकसभा में 22 सांसद हैं, और वह द्रमुक और टीएमसी के साथ ही लोकसभा में दूसरे नंबर की पार्टी है। बीजू जनता दल की न सिर्फ उड़ीसा में सरकार है, बल्कि लोकसभा में उसके 12 सांसद हैं। बहुजन समाज पार्टी की उत्तर प्रदेश में सरकार रही है, और लोकसभा में उसके दस सांसद हैं। चौथी पार्टी तेलुगु देशम की आंध्र प्रदेश में सरकार रही है और उसके लोकसभा में तीन सांसद हैं।

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इन चारों दलों ने मोदी सरकार का समर्थन करके कांग्रेस के इस आरोप को निर्मूल साबित कर दिया है कि भाजपा या मोदी सरकार से भारत के लोकतंत्र के लिए खतरा है। इन चारों दलों ने दिल्ली सेवा बिल का समर्थन करके कुछ दिनों से बनाई जा रही इस धारणा को भी खत्म कर दिया है कि यह कानून या इस कानून के माध्यम से मोदी सरकार देश के संघीय ढांचे को नष्ट कर रही है। अगर यह बिल किसी भी तरह संघीय ढांचे के लिए खतरा होता तो ये चारों क्षेत्रीय दल बिल का समर्थन नहीं करते।

केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बिल पर बहस का जवाब देते हुए सही कहा कि दिल्ली जब राज्य ही नहीं है, यह केंद्र शासित क्षेत्र है, तो यह बिल संघीय ढांचे पर खतरा कैसे हुआ। सुप्रीमकोर्ट इस क़ानून पर क्या रूख अख्तियार करता है, यह देखना होगा। वैसे सुप्रीमकोर्ट सुविधा के अनुसार अपने फैसले बदलता रहता है, जिस कारण सुप्रीमकोर्ट की शुचिता पर भी सवाल उठते रहे हैं, जैसे राहुल गांधी के कन्विक्शन पर स्टे देकर सुप्रीमकोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व क़ानून के संबंध में अपने 2013 के फैसले को ही निष्प्रभावी बना दिया है।

यूपीए से इंडिया बने गठबंधन का मूल आधार ही यह है कि भाजपा की सरकार लोकतंत्र को अधिनायकवाद में बदल रही है, और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वायत संस्थाओं पर नियन्त्रण कर रही है या उन्हें खत्म कर रही है। ब्रिटेन और अमेरिका की यात्राओं के दौरान राहुल गांधी के भाषणों का लब्बोलुवाब यही था कि न्यायपालिका तक सरकार के दबाव में है। जब उन्हें मानहानि के केस में अपराधी ठहराया गया और जनप्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8 (3) के तहत उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म हो गई, तो इसे भी उन्होंने लोकतंत्र के लिए खतरा बताया।

उन्होंने कहा कि क्योंकि उन्होंने लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोला था, उन पर सवाल उठाए थे, इसलिए उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म कर दी गई। उनका यह बयान ऑन रिकार्ड है। उनके इस बयान के आधार पर लोकसभा सचिवालय को सुप्रीमकोर्ट में केस दर्ज करना चाहिए था, क्योंकि लोकसभा स्पीकर ने उनकी सदस्यता किसी दुर्भावना या उनके लोकसभा में भाषण के कारण खत्म नहीं की थी। इसमें सत्ताधारी पार्टी, लोकसभा स्पीकर या लोकसभा सचिवालय की कोई भूमिका ही नहीं थी।

जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8 (3) के मुताबिक़ उनकी सदस्यता खुद ब खुद निरस्त हो गई थी, लोकसभा सचिवालय का काम संबंधित विभागों को सिर्फ सूचित करना था, और उसने वही किया, जिसे मीडिया और कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी की सदस्यता खत्म करने की तत्परता कह कर देश को गुमराह किया था। सिर्फ इतना नहीं कि देश को गुमराह किया गया, बल्कि विदेशों में भी गुमराह करने वाले बयान दिए गए और खबरें छपवाई गई। अब सुप्रीमकोर्ट ने उनकी कन्विक्शन पर स्टे लगा दिया है, जिससे राहुल गांधी के देश और विदेशों में दिए गए वे सारे बयान और भाषण भी गलत साबित हो गए हैं कि भारत में न्यायपालिका का भी गला घोट दिया है।

राहुल गांधी सुप्रीमकोर्ट से कन्विक्शन पर स्टे का जश्न मना रहे हैं, हालांकि वह बरी नहीं हुए हैं। लेकिन अगर वह जश्न मना रहे हैं, तो क्या राहुल गांधी अपने उन बयानों के लिए माफी मांगेगे, जिनके कारण देश और दुनिया में भारत की छवि खराब हुई थी कि भारत की स्वायत्त संस्थाएं दबाव में काम कर रही हैं। क्या वह माफी मांगेंगे कि उनकी सदस्यता सरकार या लोकसभा स्पीकर ने खत्म नहीं की थी, बल्कि उनके कन्विक्शन के कारण उनकी सदस्यता खत्म हुई थी।

फिलहाल विपक्षी गठबंधन के दोनों बड़े आधार खत्म हो गए हैं। सुप्रीमकोर्ट ने स्वायत्त संस्थाओं पर सरकार के नियन्त्रण के आरोप को खारिज कर दिया, और चार क्षेत्रीय दलों ने संघीय ढांचे पर हमले के आरोप को खारिज कर दिया। दिल्ली सेवा बिल को अरविन्द केजरीवाल ने 2024 का सेमीफाईनल कहा था। मोदी सरकार को लोकसभा और राज्यसभा में इतना समर्थन कभी नहीं था, जितना दिल्ली सेवा बिल के कारण मिल गया है।

इंडिया (यूपीए) गठबंधन 2024 का सेमीफाईनल हार गया है। दिल्ली सेवा बिल विपक्षी एकता का सूत्र बन गया था। अगर कांग्रेस दिल्ली सेवा बिल के विरोध का एलान न करती, तो विपक्षी गठबंधन का वह स्वरूप न होता, जैसा आज दिख रहा है। आम आदमी पार्टी इंडिया गठबंधन में नहीं होती।

हालांकि लोकसभा चुनावों में अभी समय है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आम आदमी पार्टी तब तक इंडिया गठबंधन में रहेगी भी या नहीं। लेकिन जिस तरह लोकसभा में इंडिया गठबंधन ने दिल्ली सेवा बिल पर वोटिंग के समय वाकआउट किया, ठीक उसी तरह राज्यसभा में होगा। राज्यसभा का गणित कोई इतना मुश्किल नहीं था कि उसे कोई सामान्य व्यक्ति समझ नहीं सकता था। अरविन्द केजरीवाल पिछले कई महीनों से बेकार की मेहनत कर रहे थे, बिल का जो हश्र लोकसभा में होना था, वही राज्यसभा में भी होना था।

राज्यसभा में भी विपक्ष उसी तरह वाकआउट करेगा, जैसा लोकसभा में किया गया। राज्यसभा का वाकआउट तो अलबत्ता पहले से तय था, क्योंकि 238 के प्रभावी सदन में एनडीए के 111 सांसद थे। विपक्षी गठबंधन का आंकड़ा तो भारत राष्ट्र समिति के सात सांसदों के समर्थन के बावजूद 105 से आगे ही नहीं बढ़ रहा था। जबकि अब चार दलों ने भी दिल्ली सेवा बिल को समर्थन देकर राज्यसभा में एनडीए का आंकडा 131 कर दिया है, जेडीएस और एसडीएफ के दो सांसद भी जोड़ लें, तो बिल के समर्थन में 133 और विरोध में सिर्फ 105 सांसद बचे हैं। लोकसभा और राज्यसभा में अलग अलग रणनीति से किरकिरी न हो, इसलिए विपक्षी गठबंधन ने लोकसभा से भी वाकआउट करने का फैसला किया।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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