राहुल गांधी के सलाहकारों ने दूर कर दी मोदी की चिंता
Congress ki Guarantee: चुनाव प्रचार पूरे शबाब पर आ गया है, पहले चरण की वोटिंग के बाद यह धारणा बननी शुरू हो गई थी कि दक्षिण में भाजपा का मामला कुछ बन नहीं रहा और हिंदी बेल्ट में कमजोर पड़ रही है।
इस धारणा के दो कारण सामने आए हैं, पहला कारण यह कि 2014 और 2019 में भाजपा हिन्दुओं के वोटों को एकजुट करने में कामयाब हो गई थी, लेकिन इस बार राहुल गांधी के जाति आधारित जनगणना के एजेंडे ने हिन्दुओं में फिर से फूट डाल दी है।

पहले चरण की वोटिंग से यह संकेत निकला कि हिंदी बेल्ट में 2014 से पहले की तरह जाति आधारित वोटिंग हो रही है। कांग्रेस दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के दिमाग में यह डालने में कामयाब होती दिखाई दी कि वह जाति आधारित जनगणना करवा कर उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण देगी, जो अब तक नहीं हुआ है।
आम धारणा है कि देश में आधी से ज्यादा आबादी ओबीसी की है, दलित और आदिवासी उनके अलावा है। कांग्रेस जाति आधारित जनगणना करवा कर उसके आंकड़े सुप्रीमकोर्ट में रखने का वादा कर रही है, ताकि सुप्रीमकोर्ट में लगी 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को बढ़वाया जा सके।
दूसरा कारण वोट प्रतिशत का गिरना है, पिछले दो चुनावों में वोट प्रतिशत बढ़ रहा था, तो भाजपा की सीटें भी बढ़ रही थीं। हालांकि यह कोई पक्का आधार नहीं है कि वोट प्रतिशत गिरने से भाजपा की सीटें घटेंगी ही, लेकिन पिछले ट्रेंड को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी खुद आशंकित हो गए हैं।

हिन्दी बेल्ट में भाजपा का ग्राफ सिर्फ राजस्थान में गिरने के संकेत नहीं है, जहां पहले चरण की 12 सीटों में से चार-पांच सीटों पर खतरा है। बल्कि हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड और बिहार में भी कांग्रेस के कुछ सीटें जीतने के आकलन आ रहे हैं। जैसे उत्तराखंड की पौड़ी और हरिद्वार, हिमाचल प्रदेश की मंडी और शिमला, हरियाणा की रोहतक, सिरसा, हिसार और कुरुक्षेत्र सीटें टक्कर वाली मानी जा रही हैं।
राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल और उत्तराखंड में पिछली बार भाजपा सभी 44 सीटें जीती थीं। बिहार और महाराष्ट्र से भी भाजपा के लिए कोई उत्साहवर्धक रिपोर्ट नहीं आ रही। इन दोनों राज्यों की 88 सीटों में से 81 सीटें एनडीए जीता था। अब इन दोनों राज्यों में भी एनडीए की 10-12 सीटें घटने के आसार बन रहे हैं।
इसलिए 370 और 400 पार वाला सपना छोड़कर भाजपा 303 और 353 बचाने की लड़ाई लड़ रही है। लेकिन कांग्रेस जो गलती हमेशा करती रही है, उसने उसी को फिर दोहरा दिया है। उसने अपने चुनाव घोषणा पत्र में मोदी को ऐसे दो मुद्दे दे दिए, जो मोदी के लिए रामबाण साबित हो रहे हैं।
पहला मुद्दा है मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण देना, और दूसरा मुद्दा है अमीरों और मध्यम वर्ग की संपत्ति छीन कर गरीबों में बांटना। जिसे उन्होंने सम्पत्ति का पुनर्वितरण या वेल्थ रि-डिस्ट्रीब्यूशन कहा है। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में पार्टी की नई सामाजिक और आर्थिक नीतियों का खुलासा किया है। कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र की ये दोनों ही नीतियां, न प्रेक्टिकल हैं, न संविधान सम्मत हैं, न भारतीय परंपराओं के अनुकूल हैं।
कांग्रेस ने अपने मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने के चक्कर में भाजपा को फिर से दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को अपने पक्ष में एकजुट करने में मदद की है। कांग्रेस ने मुसलमानों को शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में आरक्षण का वायदा करके भाजपा को मुद्दा थमा दिया है कि वह सत्ता में आई तो दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के आरक्षण कोटे में से मुसलमानों को आरक्षण दे देगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी बात को हाईलाईट कर रहे हैं। वह कर्नाटक का हवाला देते हैं कि कांग्रेस ने वहां ओबीसी का हक मार कर मुसलमानों को आरक्षण दे भी दिया है।
कांग्रेस ने कर्नाटक में अपनी पिछली सरकार के समय भी मुसलमानों को चार प्रतिशत आरक्षण दिया था। जब भाजपा सत्ता में आई तो उसने मुसलमानों का आरक्षण बंद करके दलितों और ओबीसी को उनका हक वापस किया था, लेकिन दुबारा सत्ता में आते ही कांग्रेस ने मुसलमानों को शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में आरक्षण शुरू कर दिया है। अलबत्ता इस बार तो कांग्रेस पिछली बार से भी आगे निकल गई। उसने मुसलमानों की सभी जातियों को ओबीसी में शामिल कर दिया है।
तथ्यों के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग भी मैदान में कूद गया है। उसने कुछ आंकड़े जारी किए हैं कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मेडिकल कालेजों के पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स में 150 मुस्लिमों को ओबीसी कोटे से एडमिशन दिलाया है। मुसलमानों की कुछ जातियां तो पहले से ओबीसी में आरक्षण पा रही हैं, पिछड़ा वर्ग आयोग ने खुलासा किया है कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने चुपके से सारी मुस्लिम जातियों को ही ओबीसी में शामिल कर लिया है।
नतीजा यह निकला कि मेडिकल कालेजों में ओबीसी कोटे की सारी सीटें मुसलमानों ने हथिया ली। मोदी और अमित शाह को बैठे ठाले मुद्दा मिल गया, वे अब इसी बात कर जोर दे रहे हैं कि कांग्रेस सारे देश में हिन्दू ओबीसी का हक मार कर मुसलमानों को देना चाहती है। भाजपा को इस नए मुद्दे से कितना लाभ होगा, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन कांग्रेस ने उसे दलित, आदिवासी, ओबीसी हिन्दुओं को भड़काने का एक मुद्दा तो थमा ही दिया है।
कांग्रेस की नई आर्थिक नीति में सम्पत्ति का मूल्यांकन करके उसे देश के सभी नागरिकों में बांटने का कम्युनिस्ट सिद्धांत सोवियत संघ और चीन में पिट चुका है। लेकिन राहुल गांधी उसी पिटे हुए सिद्धांत का प्रचार करके कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने बड़ी मुश्किल से नेहरू और इंदिरा गांधी की समाजवाद और कोटा परमिट वाली सोवियत अर्थव्यवस्था से देश को मुक्त किया था।
आर्थिक उदारीकरण का युग आया, तो देश में निवेश के दरवाजे खुले, जिससे समृद्धि के दरवाजे खुले। अब राहुल गांधी उस कम्युनिस्ट व्यवस्था से भी खतरनाक नक्सली विचारधारा की वकालत कर रहे हैं, जिसमें लोगों की जीवन भर की कमाई सम्पत्ति उनसे छीन कर बाकी सब में बांटने की बाते कर रहे हैं। नक्सलवाद इसी सिद्धांत पर काम कर रहा है।
राहुल गांधी ने खुद 7 अप्रेल को अपने भाषण में कहा कि कांग्रेस हमेशा बड़ा सोचती है, इसलिए जैसे उसने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जैसे राजाओं, महाराजाओं के प्रिवीपर्स बंद किए, वैसे ही लोगों की संपत्ति का बंटवारा करके क्रांतिकारी बदलाव लाएगी। यही बात कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भी लिख दी, लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने उसे मनमोहन सिंह के 2006 के बयान के साथ जोड़ कर हिन्दुओं से उनकी संपत्ति छीन कर मुसलमानों में बांटने की बात कही, तो कांग्रेस बचाव मुद्रा में आ गई।
वह सफाई दे रही है कि उसने ऐसा नहीं कहा, लेकिन राहुल गांधी के प्रमुख सलाहाकार और ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने यह कह कर कांग्रेस को संकट में डाल दिया कि किसी भी व्यक्ति के मरणोपरांत उसकी आधी संपत्ति पर सरकार का हक होना चाहिए, बाकी आधी सम्पत्ति पर उनके वारिसों का।
क्या इसे देश में कोई स्वीकार करेगा कि उसकी जीवन भर की मेहनत से बनाई गई संपत्ति पर उसके बच्चों का हक न रहे। कोई भी व्यक्ति देश में उद्योग धंधे क्यों लगाएगा। कोई भी भारत में निवेश क्यों करेगा। सब उद्योगपति विदेशों में शिफ्ट हो जाएंगे, देश की सारी अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी। अब कांग्रेस को सैम पित्रोदा के बयान को उनकी निजी राय बताना पड रहा है। यह वही सैम पित्रोदा हैं, जिन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए दंगों पर कहा था कि जो हुआ, तो हुआ। कांग्रेस भले ही उनके बयान का खंडन करे, लेकिन राहुल गांधी का भाषण, कांग्रेस का घोषणा पत्र और सैम पित्रोदा की थ्योरी बताती है कि कांग्रेस की नई सामाजिक और आर्थिक नीति क्या है।
सच्चाई यह है कि कांग्रेस की जमीनी जड़ें उखड़ चुकी हैं, किसी जमाने में कांग्रेस के अधिवेशनों और ग्रुप मीटिंगों में विचार विमर्श करके नीति तैयार होती थी। जिस जाति आधारित जनगणना का नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी ने विरोध किया, उसे राहुल गांधी बड़ा मुद्दा बना रहे है, कोई सैम पित्रोदा कांग्रेस की आर्थिक नीति बना कर दे रहा है। जिस पर पार्टी में किसी मंच पर चर्चा नहीं होती।
राहुल गांधी और कांग्रेस ने सम्पत्ति के रि-डिस्ट्रीब्यूशन की जो थ्योरी रखी है, वह न तो व्यवहारिक है, न भारत का संविधान उसकी इजाजत देता है, न भारतीय परिवेश में संभव है। असंभव और आत्मघाती बातें करके राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को उस संकट से निकलने का रास्ता दे दिया, जो पहले चरण के मतदान के बाद दिखाई दे रहा था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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