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द्रौपदी मुर्मु का धर्म हिन्दू है तो इसमें संघ-भाजपा का एजेंडा क्या है?

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द्रौपदी मुर्मू को भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी दलों द्वारा भारत के राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित करने के साथ ही मीडिया के कथित एक "समुदाय विशेष" में उनके चयन पर राजनीतिक टीका-टिप्पणी होनी शुरू हो गयी है। उन्हें लगता है कि द्रौपदी मुर्मू का चयन संघ-भाजपा ने अपनी हिन्दुत्व विचारधारा को वनवासियों पर थोपने के लिए किया है। क्या सचमुच ऐसा है?

presidential election draupadi murmu religion is Hindu then agenda of Sangh-BJP

दरअसल, जिस दिन द्रोपदी मुर्मु के नाम की घोषणा हुई, उस दिन उनके गृहनगर के एक शिव मंदिर में पूजा व सेवा करते हुए उनका एक वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो गया। मात्र इसी एक कारण से इस कथित 'बुद्धिजीवी' वर्ग को लगने लगा कि संघ व भाजपा ने जानबूझकर एक "वनवासी हिन्दू" को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया है ताकि वह वनवासियों में अपना हिन्दुत्ववादी एजेंडा ले जा सके। जिस वर्ग को ऐसी आशंका है वो मानते हैं कि वनवासी लोग हिन्दू धर्म का हिस्सा नहीं हैं और वे लोग ईसाई धर्म अपना रहे हैं जोकि संघ-भाजपा के हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे में सटीक नहीं बैठता है। अतः सबसे पहले इस बात का तथ्यों के साथ विश्लेषण करना होगा कि वनवासी लोगों का धर्म क्या है?

बात है, 8 अक्टूबर 1925 की, जब महात्मा गाँधी चाईबासा के दौरे पर थे और उन्होंने वनवासियों के बीच कुछ समय बिताया। महात्मा गाँधी के सम्पूर्ण वांग्मय के खंड संख्या 28 के पृष्ठ संख्या 306-307 पर उनकी इस यात्रा का पूरा उल्लेख मिलता है। वे अपनी अनुभवों को साझा करते हुए कहते हैं, "ईसाई धर्म-प्रचारक तो कई पीढ़ियों से इनकी (वनवासी) अच्छी सेवा करते आ रहे हैं, लेकिन मेरी नम्र सम्मति में, उनके काम में एक खामी यह है कि अंत में वे इन भोले-भाले लोगों से ईसाई बनने की अपेक्षा करते हैं।"

वनवासियों का ईसाईयत में धर्मान्तरण हो रहा था, यह महात्मा गाँधी के शब्दों से स्पष्ट है। अब आते है दूसरे तथ्य पर कि वनवासी हिन्दू हैं या नहीं? कुछ महीनों पहले झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि "आदिवासी न कभी हिन्दू थे और न कभी होंगे।" एक राज्य के मुख्यमंत्री के इस बयान को बार-बार बोलकर इस तरह स्थापित किया जा रहा है कि एकमात्र सच्चाई अगर कुछ है तो यही है।

मगर उनके इस कथन की जांच-पड़ताल भी करनी चाहिए। इसलिए 1901 की जनगणना के खंड 1 के पृष्ठ 380 पर ध्यान देगा होगा, जहाँ ब्रिटिश सरकार की इस सन्दर्भ में एक अति-महत्वपूर्ण टिप्पणी मिलती है। इसमें लिखा है, "सिंहभूम के उपायुक्त ने बताया है कि 'हो' जनजाति के लोग खुद को हिन्दू मानते हैं और हिन्दुओं के देवी-देवताओं में विश्वास रखते हैं।"

ब्रिटिश सरकार की इस टिप्पणी को और अधिक आसानी से समझने के लिए एक ब्रिटिश एंथ्रोपोलॉजिस्ट, वेररिएर एल्विन द्वारा 31वीं इंडियन साइंस कांग्रेस, जनवरी 1944 में दिए भाषण को भी जरुर पढना चाहिए। उनके भाषण की प्रतियाँ पुस्तक के रूप में आज भी उपलब्ध है। अपने अध्यक्षीय भाषण में वे भारतीय एंथ्रोपोलॉजी विज्ञान की हकीकत सामने लाने की जरुरत महसूस करते हुए कहते हैं, "जनगणना के दौरान कुछ विद्वानों और राजनेताओं द्वारा ट्राइबल जनजातियों को हिंदू समुदाय से विभाजित करने के प्रयास किये गए। इससे यह पता चलता है कि विज्ञान का इस्तेमाल राजनीतिक और सांप्रदायिक उद्देश्यों के लिए भी हो सकता है। जनगणना के शुरुआती वर्षों में सरकार ने जीवात्मवाद (animism) को हिन्दुओं से अलग करने की कोशिश की। बाद में इसे ट्राइबल धर्म के अनुयायी (Followers of Tribal Religions) नाम से संबोधित किया जाने लगा। कागजों पर लोगों से पूछा गया कि वे हिन्दू भगवानों की पूजा करते है या ट्राइबल भगवानों की। इन सबका कोई मतलब नहीं है। भारतीय उप-महाद्वीप में आदिवासियों का धर्म जाहिर तौर पर हिन्दुओं की ही एक शाखा है। हिन्दूइज़्म के कई घटक है, जिसे धर्मशास्त्री जीवात्मवाद (animism) भी कह सकते है। धर्म के कॉलम में आदिवासियों (aboriginals) को हिन्दू ही लिखना चाहिए. इसके अलावा कोई और वर्गीकरण बद से भी बदतर रहेगा।"

उपरोक्त तीनों तथ्य अथवा कथन तब के है जब न तो जनसंघ था और न ही भाजपा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितम्बर 1925 को नागपुर में हुई। महात्मा गाँधी ने ईसाईयों के धर्मान्तरण पर नाराजगी 8 अक्टूबर 1925 को बिहार में व्यक्त की। चाईबासा से नागपुर की दूरी लगभग 900 किलोमीटर है। इतनी जल्दी महात्मा गाँधी को तो यह आभास भी नहीं हुआ होगा कि नागपुर में ऐसी एक संस्था का उदय हो चुका है जो बाद में वनवासियों के कल्याण के लिए काम करेगी। ऐसे ही ब्रिटिश सरकार 1901 में स्वीकार कर रही है कि वनवासियों का धर्म हिन्दू ही है। उस कालखंड में संघ की कोई कल्पना ही नहीं थी। रही बात 1944 में ब्रिटिश एंथ्रोपोलॉजिस्ट के दावों की तो वे खुद एक ईसाई है और उनका संघ से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष संबंध ही नहीं था। उन्होंने तो विज्ञान एवं शोध के आधार जो वास्तविकता है उसे ही उस दौर के सबसे प्रतिष्ठित मंच के माध्यम से सबके सामने रखा।

अगर सच्चाई यह है कि वनवासी लोगों का धर्म हिन्दू है तो इसमें संघ-भाजपा का एजेंडा जैसा क्या है? जो सच है वह तो सच ही रहेगा। एजेंडा तो यह है कि वनवासियों का धर्मान्तरण करवाया जा रहा है और ब्रिटिश सरकार ने जनगणना के माध्यम से हिन्दू धर्म को विभाजित किया। इसी एजेंडे का इस्तेमाल यह कथित 'बुद्धिजीवी' वर्ग आज भी कर रहा है।
अतः द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति पद के लिए अपने नाम की घोषणा होते ही मंदिर में सेवाकार्य किया, वह भारत के इतिहास, परंपरा और संस्कृति के अनुरूप है। चूँकि वे भारत के वनवासी समाज से आती हैं तो स्वाभाविक है कि द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने के बाद, उनके वनवासी समाज के मुख्यधारा में प्रतिनिधित्व को ऐतिहासिक स्थान मिलना तय है। इसलिए भारत के राष्ट्रपति पद पर उनकी दावेदारी को सरलता, और सहजता से स्वीकार करना चाहिए।

यह भी पढ़ें: द्रौपदी मुर्मु: जन्मदिन पर मिला जीवन का सबसे बड़ा उपहार

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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