मुसीबत में PK, प्रशांत किशोर को भी अब किसी ‘PK’ की दरकार

नई दिल्ली। प्रशांत किशोर यानी पीके में चौंकाने वाला गुण उनकी खासियत है। नीति-रणनीति, स्लोगन-पोस्टर, समीकरण, उद्धरण, एक्शन-रीएक्शन, बात-मुलाकात, ट्वीट-रीट्वीट हर एक कदम से वे चौंकाते हैं। जिनके लिए पीके काम करते हैं वे लोग उनके गुण गाते हैं, जिनके ख़िलाफ़ होते हैं वे पछताते हैं कि काश, उन्होंने ही पीके को हायर कर लिया होता! मगर, यह खासियत तो राजनीतिज्ञों को उनकी राजनीति में मददगार की भूमिका वाली है। जब खुद पीके राजनीतिज्ञ बन बैठे तो अब लगने लगा है कि उन्हें भी किसी पीके की ज़रूरत है। पिछले एक महीने से प्रशांत किशोर यानी पीके खुद अपने लिए ही नहीं, पार्टी के लिए भी सरदर्द बन गये हैं।

प्रशांत किशोर ने 3 मार्च को एक ट्वीट किया था। शहीद पिन्टू के पिता की बाइट उस ट्वीट में अटैच थी जिसमें मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की बेरुखी से जुड़े सवाल के जवाब थे। जम्मू-कश्मीर के हिन्दवाड़ा में शहीद पिन्टू का शव पटना एयरपोर्ट पर पहुंचा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत एनडीए के तमाम नेता पटना में रैली कर रहे थे। उनमें से कोई भी शहीद पिन्टू को श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचा था। इसी से दुखी दिख रहे थे शहीद पिन्टू के पिता। प्रशांत किशोर ने इस दुख को हल्का करने की कोशिश करते हुए पार्टी और सरकार की ओर से अपने ट्वीट में माफी मांग ली।

पीके ने तोड़ी परम्परा

पीके ने परम्परा तोड़ी थी। इससे पहले भी 14 फरवरी 2018 को शहीदों के शव पटना आए थे और फिर उनके गृह ज़िलों में गये थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार झांकने तक नहीं गये थे। खूब राजनीतिक विवाद हुआ था। मगर, ऐसा लगा मानो नीतीश और उनकी पार्टी ने कुछ देखा या सुना ही नहीं। इसी परम्परा पर प्रशांत किशोर ने चोट की थी। परम्परा टूटी, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी परम्परा तोड़नी पड़ी। बगैर कुछ बोले नीतीश कुमार शहीद पिन्टू के घर पहुंच गये। उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस कदम को राजनीतिक रूप से क्षतिपूर्ति के रूप में देखा गया।

पीके फिर नहीं सम्भल पाए। उन्होंने नीतीश कुमार के बेगूसराय जाकर श्रद्धांजलि देने वाली तस्वीरों के साथ 7 मार्च को एक और ट्वीट कर दिया। लिखा- ...एंड द फॉलोअप। शब्द तो महज तीन थे। मगर, नतीजे पिछले ट्वीट के भी तीन गुणे से ज्यादा निकले। नीतीश के दौरे की ऐसी तैसी हो गयी। मतलब ये निकला मानो पीके की प्रेरणा से ही नीतीश शहीद को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। न वे माफी मांगते, न नीतीश को बेगूसराय जाना पड़ता। इसे एक गलती का ‘फॉलोअप' समझा गया।

‘फॉलोअप’ पीके की गलती का या नीतीश-मोदी की गलती का?

पीके ये नहीं समझ पाए कि यह उनकी ही गलती का फॉलोअप था। वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गलती का फॉलोअप बता रहे थे। इस उदाहरण में साफ तौर पर समझा जा सकता है कि राजनीति में कितने कच्चे खिलाड़ी दिख रहे हैं प्रशांत किशोर यानी पीके। और, कितना जरूरी है कि पीके के लिए कि उन्हें भी एक पीके मिले।

पीके के माफी वाले ट्वीट और फिर फॉलोअप वाले ट्वीट ने एक और ज़रूरत पैदा कर दी है। यह ज़रूरत है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ऐसा ही फॉलोअप दें। पीके आज जरूर जेडीयू में हैं। मगर, कभी नरेंद्र मोदी के किंगमेकर होने का भी उनका दावा रहा है। फिर, जो माफी उन्होंने मांगी वह उस इवेंट के लिए था जिसमें नीतीश-मोदी दोनों शरीक थे। जब नीतीश फॉलोअप कर चुके हैं तो मोदी के लिए ऐसा करना अपिरहार्य हो गया लगता है। कम से कम राजनीतिक ज़रूरत तो बन ही गयी है। इसके ज़िम्मेदार भी पीके ही हैं।

पीके नहीं समझ पाए कि एनडीए को नहीं चाहिए सुखाड़ की ख़बर

पीके ने 3 मार्च को ही एक और ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने आंकड़े रखे थे कि किस तरह देश का एक तिहाई हिस्सा सूखे की चपेट में है। पीके फिर भूल गये कि जो आंकड़े एनडीए के नेता कम से कम चुनाव भर ऐसी ख़बरों के सुखाड़ में ही जीना चाहते हैं। पर सुखाड़ी की ख़बर बरसाकर पीके ने अपने ही नेताओं के मुंह में उंगली डालने और उनसे आवाज़ निकलवाने की कोशिश कर डाली। राजनीतिक विरोधियों ने इस ट्वीट का भी खूब इस्तेमाल किया। वहीं, जेडीयू समेत एनडीए के नेता माथा पकड़े बैठे हैं।

पीके ने 28 फरवरी को भी एक ट्वीट किया था जो अक्षरश: सच है। मगर, उस ट्वीट को पॉलिटिकली करेक्ट यानी ‘राजनीतिक रूप से सही' नहीं माना गया। पीके ने कहा कि युद्ध का विरोध कायरता नहीं है। महात्मा गांधी कायर नहीं थे। सोशल मीडिया पर जो युद्धोन्माद फैलाया जा रहा है वह मूर्खतापूर्ण है। प्रशांत किशोर भूल गये कि ‘घर में घुसकर मारेंगे' कहने की ज़रूरत जब एनडीए के नेतृत्वकारी नेता को है तो सोशलमीडिया उनके ही मकसद की पैरोकार बनी दिख रही है। यह युद्धोन्माद एनडीए के लिए कितना जरूरी है। ‘शांति के हिमायती' के तौर पर पीके जिस जमात के हाथों ट्रोल हुए, उस जमात और एनडीए के लिए सोशल मीडिया में सक्रिय जमात में कोई फर्क नहीं था।

जब वक्त उल्टा पड़ता है तो ज़ुबान भी साथ नहीं देती। अब जेडीयू में ही जो पीके के विरोधी हैं, जिन्हें बिन मांगे पीके का नेतृत्व थोपा हुआ महसूस हुआ, वे पीके के उस बयान का भी ढोल पीट रहे हैं जिसमें उन्होंने युवाओं को विधायक-सांसद बनाने का दावा किया था। कहते हैं कि पीके ने कथित रूप से कहा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री बनाए हैं तो युवाओँ को भी सांसद-विधायक बना सकते हैं। लोकतंत्र की यह विशेषता होती है कि हर पार्टी में भी पक्ष-विपक्ष हो जाया करता है। पीके को उनके विरोधी विपक्ष की तरह घेरे हुए हैं। राजनीति की दुनिया में आने के बाद पीके को भी नेता बन जाना होता है। यह बात जब समझ में आ जाएगी, तब पीके महसूस करेंगे कि उन्हें भी किसी पीके की ज़रूरत है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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