BSP: पुरु के हाथी क्यों बन गये बसपा के साथी?

BSP: इस समय बहुजन समाज पार्टी की दशा राजा पुरु वाली हो गयी है। जैसे सिकंदर से युद्ध में पुरु के हाथी ने अपनी ही सेना को रौंद दिया था, कुछ उसी तरह बसपा के सांसद और नेता अपनी पार्टी को रौंदते हुए दूसरे दलों में चले जा रहे हैं।

बसपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों में ऊहापोह और निराशा के मिले-जुले भाव है। निराशा इस बात की है कि पार्टी लगातार सिमटती जा रही है। फिर पार्टी के भीतर भतीजे आनंद का नाम आगे कर परिवारवाद को हवा भी दे दी गयी है।

Bahujan Samaj Party

इसी उहापोह में एक-एक कर पुराने कार्यकर्ता और नेता साथ छोड़ते जा रहे हैं। अंबेडकर नगर से बसपा सांसद रितेश पांडे पार्टी से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं। पाला बदलने से पहले पार्टी सुप्रीमो को लिखे पत्र में अंबेडकर नगर के बसपा सांसद ने कार्यकर्ताओं की अनदेखी का आरोप लगाया है। गाजीपुर से बसपा सांसद अफजाल अंसारी समाजवादी पार्टी की शरण में चले गए हैं। लोकसभा चुनाव के लिए गाज़ीपुर सीट से समाजवादी पार्टी उनकी उम्मीदवारी की घोषणा भी कर चुकी है।

भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी के साथ लोकसभा में तू-तू मैं-मैं करने वाले अमरोहा के बसपा सांसद कुंवर दानिश अली कांग्रेस से गलबहियां कर चुके हैं। इसी तरह जौनपुर के बसपा सांसद श्याम सिंह यादव राहुल गांधी की न्याय यात्रा में शामिल होकर अपनी अगली मंजिल लगभग तय कर चुके हैं। बसपा से पूर्व विधायक गुड्डू जमाली गाजे बाजे के साथ सपा में चले गये हैं। बिजनौर से बसपा सांसद मलूक नागर हालांकि अभी बसपा की भाषा बोल रहे हैं लेकिन उनका एक पांव जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोक दल में भी है। बताते हैं कि दूसरा पांव उठाने के लिए मलूक नागर माकूल अवसर की तलाश कर रहे हैं।

खबर है कि कई अन्य बसपा सांसदों की निष्ठा बदल चुकी है और वे जल्द ही किसी न किसी गठबंधन का रास्ता पकड़ सकते हैं। लालगंज सीट से बसपा सांसद संगीता आजाद, श्रावस्ती के सांसद राम शिरोमणि और नगीना से पार्टी के सांसद गिरीश चंद्र पर भारतीय जनता पार्टी की नजर है। जानकार लोगों का कहना है कि उनके दल-बदल की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। बस, आधिकारिक तौर पर घोषणा की औपचारिकता ही बाकी है।

हालांकि रितेश पांडे के अलावा अभी और किसी के जाने की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों की मानें तो बहुजन समाज पार्टी के वर्तमान लगभग सभी सांसदों की दूसरे दलों के साथ हाथ मिलाने की डील पक्की हो चुकी है।

चुनावी राजनीति के लिहाज से बहुजन समाज पार्टी का प्रदर्शन हाल के दिनों में काफी निराशाजनक रहा है। वर्ष 2022 में हुए प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पार्टी मात्र एक सीट पर सिमट गई है। बलिया जिले के रसड़ा विधानसभा क्षेत्र से ठेकेदार उमाशंकर सिंह प्रदेश की विधानसभा में बसपा के एकमात्र प्रतिनिधि हैं।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने सपा और राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था। गठबंधन को करीब 40% वोट मिले थे, जिसमें बसपा को लगभग 20% सपा को 19% और रालोद को 1.69 प्रतिशत वोट मिले थे।

बसपा के बारे में देखा गया है कि जब कभी वह चुनाव में उतरती है तो बहुत पहले अपने उम्मीदवार घोषित कर देती है लेकिन इस बार उसने अभी तक पार्टी के प्रभारी भी नहीं बनाए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तर प्रदेश में बसपा का ठीक-ठाक वोट बैंक है। दलितों में पार्टी की अच्छी खासी पैठ है। वर्ष 2019 में सपा और राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन करके बसपा 10 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी, लेकिन परिणाम आने के तत्काल बाद गठबंधन तोड़कर अलग हो गई।

आज पार्टी के शुभचिंतकों में सबसे बड़ी चिंता यही है कि जब सभी राजनीतिक दल दूसरे दलों के साथ बातचीत कर अपना अपना कुनबा बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं और उत्तरोत्तर सफल भी हो रहे हैं, तो ऐसे में बसपा नेतृत्व खुद को अलग-थलग कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मार रहा है?

वैसे भी अगर देखा जाए तो बहुजन समाज पार्टी जब भी सत्ता में पहुंची है तो उसने किसी न किसी दल का सहारा जरूर लिया है। अपवाद स्वरूप 2007 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दिया जाए तो बहुजन समाज पार्टी हमेशा किसी न किसी दल की बैसाखी के सहारे ही खड़ी हो सकी है। 2007 में भी बसपा को जो जीत मिली थी उसमें भी प्रकारांतर से अन्य वर्गों का सहयोग लिया गया था और मिला भी था। हमेशा 'बहुजन हिताय' की बात करने वाली बसपा 2007 का चुनाव 'सर्वजन हिताय' के नारे पर चुनाव लड़ी थी। "हाथी नहीं गणेश है" का नारा भी लगा था। बसपा का एक ठोस समर्थक वर्ग है, अपने समर्थक वर्ग के साथ जब वह कभी किसी अन्य वर्ग का साथ करती है तो इसका फायदा उसे पहुंचता रहा है।

वर्तमान समय में बहुजन समाज पार्टी एकला चलो का गीत गा रही है। हालांकि बसपा नेता मायावती अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई बार अपने फैसलों से समर्थकों को ही नहीं विरोधियों को भी चौंकाती रही है। लेकिन मौजूदा समय में सत्तारूढ़ गठबंधन दल जिस तरह अबकी बार, चार सौ पार का बार-बार उद्घोष कर रहा है, उससे भी अन्य लोगों के लिए स्पेस सीमित ही होता जा रहा है।

बसपा के दलित वोटबैंक पर भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सबकी नजर है। मायावती की राजनीतिक निष्क्रियता ने उनके समर्थक वोटरों को भी दिशाहीन कर दिया है। जहां तक मुस्लिम वोटबैंक की बात है तो कांग्रेस सपा गठबंधन के बाद इस बात की उम्मीद कम है कि यूपी में मुस्लिम नेता या मतदाता हाथी की सवारी करेंगे। ऐसे में बसपा के लिए परिस्थितियां स्थिर या जड़वत हो गयी हैं।

बहरहाल, बसपा की मौजूदा तटस्थतावाद की नीति के निहितार्थ चाहे जो भी हो लेकिन आम धारणा तो यही बन रही है कि कि जिस तरह हर मौके पर कांग्रेस की पिछलग्गू दिखने वाली वामपंथी पार्टियां देश के प्रतिनिधि मूलक संसदीय जनतंत्र से नदारद हैं, बहुजन समाज पार्टी भी धीरे-धीरे उसी गति को प्राप्त हो रही है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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