NDA vs INDIA: 'इंडिया' के क्षेत्रीय क्षत्रप बनाम एनडीए के छुटभैया दल

NDA vs INDIA: लोकतंत्र में हर दौर में राजनीति और जनता का एक खेमा यथास्थिति का विरोधी होता है। कांग्रेस की अगुआई में बने नए गठबंधन इंडिया यानी इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव एलाएंस से उम्मीद लगाए बैठे लोग दरअसल लोकतंत्र के इसी खेमे के प्रतिनिधि हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह गठबंधन इतनी मजबूती से आगे बढ़ पाएगा कि वह भाजपा के हाथ से सत्ता छीन ले? गठबंधन में शामिल दलों में शुरू हुई खींचतान ही ऐसे सवालों का आधार बनी है।

साझा प्रेस कांफ्रेंस से गायब रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और इसे लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे लाख सफाई दें, लेकिन इसका संदेश यही गया है कि गठबंधन की शुरुआत ही ठीक नहीं हुई है। अभी इस विवाद पर पानी डालने की कोशिश हो ही रही थी कि राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी का भी बयान आ गया। उन्होंने कहा है कि गठबंधन की पूरी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुकाबले को लेकर कोई चर्चा ही नहीं हुई। वैसे जयंत के बारे में माना जा रहा था कि वे भारतीय जनता पार्टी के नजदीक जा रहे हैं। हालांकि बेंगलुरू की बैठक में उन्होंने हाजिरी लगाकर इन अटकलों को खारिज कर दिया। लेकिन बेंगलुरू से वापसी के बाद उन्होंने जो कहा है, उससे साफ है कि भले ही उन्होंने हाजिरी लगा दी। लेकिन गठबंधन में वे अभी आधे-अधूरे मन से ही हैं।

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इस बीच बंगाल से भी एक बयान आ गया है। तृणमूल की नेता शताब्दी राय ने कहा है कि प्रधानमंत्री की उम्मीदवार तो ममता बनर्जी ही होंगी। शताब्दी रॉय के बयान से साफ है कि ममता को राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर एतराज है। इस बीच सीपीएम नेता वृंदा करात ने पश्चिम बंगाल की हिंसा को लेकर तीखा बयान दे दिया है। यहां यह बताना गैर जरूरी है कि सीपीएम भी इंडिया का हिस्सा है।

बयानों के इन अंतर्विरोधों के अलावा इस गठबंधन में शामिल दलों और उनके अतीत के आधार पर उनकी भावी गतिविधियों पर भी निगाह डालनी चाहिए। स्वाधीनता आंदोलन की पार्टी रही कांग्रेस की आज बुरी गत है तो उसके लिए जिम्मेदार जो दल हैं, उनमें से कई इस गठबंधन में शामिल हैं। चाहे दिल्ली हो या पंजाब, कांग्रेस का खात्मा किसने किया, आम आदमी पार्टी ने। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करने के लिए जिम्मेदार भाजपा नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी है। लेकिन अब वह कांग्रेसनीत गठबंधन का हिस्सा है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जिस समाजवादी धड़े ने धूल चटाई, उसका प्रमख दल समाजवादी पार्टी भी इस गठबंधन में है। लालू और नीतीश की राजनीति ही कांग्रेस विरोध पर रही है। बिहार में कांग्रेस हाशिए पर है तो उसकी वजह ये ही दोनों हैं। लेकिन वे भी इस गठबंधन में हैं। झारखंड में कांग्रेस को समेटने वाला झारखंड मुक्ति मोर्चा की भी भूमिका कांग्रेस को निबटाने वाली ही रही है। पश्चिम बंगाल में ममता अगर कांग्रेस से अलग नहीं होतीं तो क्या कांग्रेस विधानसभा में अपना विधायक ढूंढ़ने को मजबूर होती। लेकिन वह भी इस गठबंधन में हैं। इसी तरह महाराष्ट्र में एक नहीं, दो-दो बार शरद पवार ने कांग्रेस को पटखनी दी, उससे अलग राह चुनी। लेकिन उनका भी दल इस गठबंधन में शामिल है।

तमिलनाडु में कामराज के बाद अगला कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं बन पाया। कामराज जैसे नेता के रहते तमिलनाडु से कांग्रेस को उखाड़ फेंकने वाला दल जनसंघ या अन्नाद्रमुक नहीं था, बल्कि द्रविड़ मुनेत्र कषगम् रहा। दिलचस्प यह है कि वह भी कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन में शामिल है।

राजनेताओं को लेकर उत्तर प्रदेश के विधायक ओमप्रकाश राजभर ने पिछले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के ठीक बाद कहा था कि वह सांप की तरह दो मुंहा होता है। वैसे तो पूरी राजनीति ही इस दोमुंहेपन का शिकार है। लेकिन इंडिया नाम वाले गठबंधन के दलों के अतीत को देखें तो राजभर का कथन इस गठबंधन पर कुछ ज्यादा ही गंभीरता से साबित होता है।

जहां इतने अंतर्विरोध हों, जहां एक-दूसरे से लड़ने और राजनीतिक अस्तित्व मिटाने का अतीत रहा हो, क्या वहां मजबूती से विकल्प बना जा सकता है? क्या आम मतदाता अतीत के इन धब्बों को नहीं देखेंगे और उसके आधार पर फैसले नहीं लेंगे। फौरी राजनीति के तकाजों को वोटर स्वीकार कर लेंगे, अगर यह भी सवाल उठ रहा है तो इसकी वजह गठबंधन के अंतर्विरोध ही हैं।

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधनों में एक बुनियादी अंतर है। भाजपा गठबंधन के दलों का इस्तेमाल उनके छोटे-छोटे आधार वोट बैंक के जरिए अपने मजबूत वोटबैंक को विस्तारित करने के लिए करना चाहती है, जबकि इंडिया में शामिल ज्यादातर दल अपने-अपने राजा है, अपने इलाके के क्षत्रप हैं। अपने इलाकों में उनका अपना आधार है और वोट बैंक भी है। लेकिन दूसरे इलाकों में उनकी पूछ और परख नहीं है।

भाजपा के मुकाबले कांग्रेस का मजबूत आधार अब नहीं रहा। ऐसे में उसकी अगुआई वाले दलों के अंतर्विरोध उसे फायदा कम, नुकसान ज्यादा पहुंचाएंगे। पता नहीं, इस तथ्य को गठबंधन में शामिल दल समझ रहे हैं या नहीं? लेकिन यह तय है कि गठबंधनों की आपसी खींचतान की वजह से अगला आम चुनाव कहीं ज्यादा दिलचस्प होने जा रहा है?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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