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लाइलाज होते नक्सलवाद का समय रहते इलाज जरूरी!

By दीपक कुमार त्यागी
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रायपुर। जिस समय देश व छत्तीसगढ़ राज्य के कर्ताधर्ता नीतिनिर्माता सरकार बनाने के लिए अन्य राज्यों की चुनावी रैलियों में बेहद व्यस्त थे, उस समय छत्तीसगढ़ में सुरक्षाबल के वीर जवानों पर बीजापुर में शनिवार को ऑपरेशन के बाद वापसी के दौरान तर्रेम थाना के सिगलेर से लगे जोन्नागुंड़ा के जंगल में नक्सलियों के बड़े झुंड ने जबरदस्त ढंग से हमला कर दिया था, जहां पर नक्सलियों और हमारे वीर सुरक्षाबलों के बीच करीब चार घंटे तक लगातार मुठभेड़ चली। पहले तो शनिवार को सिस्टम के द्वारा मात्र 5 जवानों के शहीद होने का दावा किया गया था, लेकिन रविवार की सुबह होते-होते स्थिति साफ होने पर नक्सलियों के खतरनाक मंसूबों का परिणाम सामने आने लगा। नक्सल ऑपरेशन के डीजी अशोक जुनेजा ने रविवार सुबह 22 जवानों के मारे जाने की पुष्टि करते हुए कहा कि बीजापुर में हुई मुठभेड़ में हमारे 22 जवान मारे गये और एक जवान अब भी लापता है। अब साफ होने लगा था नक्सलियों ने बहुत बड़े पैमाने पर घातक हमला किया था, मौके की स्थिति बेहद गंभीर थी। हालात की गंभीरता को भांपकर नियंत्रण करने के लिए सिस्टम के कर्ताधर्ताओं ने चुनावी रैलियों को बीच में छोड़कर दिल्ली व छत्तीसगढ़ वापस आना उचित समझा।

लाइलाज होते नक्सलवाद का समय रहते इलाज जरूरी!

अब एकबार फिर हर घटना की तरह देश व छत्तीसगढ़ में आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति तेज हो गयी है। मां भारती के वीर सपूतों के बलिदान के बाद नक्सलियों से निपटने के लिए सिस्टम के द्वारा सख्त कदम उठाने के लिए रणनीति बनाई जा रही है, लेकिन आमजनमानस के मन मे प्रश्न यह है कि सरकार के द्वारा क्या पूर्व में हुए बड़े हमलों के बाद की गयी औपचारिकता मात्र निभाई जायेगी या वास्तव में इसबार धरातल पर नक्सलवाद से निपटने के लिए कोई ठोस स्थाई रणनीति अपनाकर नक्सलवाद का देश से जल्द से जल्द सफाया किया जायेगा। वैसे आपको याद दिला दे कि इस तरह की घटना छत्तीसगढ़ में पहली बार घटित नहीं हुई है पूर्व में भी वहां पर नक्सलियों ने बड़े दुस्साहसिक हमलों को अंजाम दिया है। आज हम छत्तीसगढ़ के कुछ बड़े नक्सली हमलों पर एक सरसरी नजर डालते हैं :-

श्यामगिरी :- 9 अप्रैल 2019 को दंतेवाड़ा के लोकसभा चुनाव के दौरान मतदान से ठीक पहले नक्सलियों ने चुनाव प्रचार के लिए जा रहे भाजपा विधायक भीमा मंडावी की कार पर जबरदस्त हमला किया था, इस हमले में भीमा मंडावी के अलावा उनके चार सुरक्षाकर्मी भी मारे गये थे।

दुर्गपाल :- 24 अप्रैल 2017 को सुकमा जनपद के दुर्गपाल के पास नक्सलियों के द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 25 जवान उस समय मारे गये, जब वे सड़क निर्माण के कार्य की सुरक्षा में लगे हुए थे और खाना खा रहे थे।

दरभा :- 25 मई 2013 को बस्तर के दरभा घाटी में हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, कांग्रेस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 अन्य लोग मारे गए थे।

धोड़ाई :- 29 जून 2010 को नारायणपुर जिले के धोड़ाई में सीआरपीएफ के जवानों पर नक्सलियों ने जबरदस्त हमला किया था, इस हमले में फोर्स के 27 वीर जवान मारे गए थे।

दंतेवाड़ा :- 17 मई 2010 को एक यात्री बस में सवार हो कर दंतेवाड़ा से सुकमा जा रहे सुरक्षाबल के जवानों पर नक्सलियों ने बारूदी सुरंग लगा कर हमला किया था, जिसमें 12 विशेष पुलिस अधिकारी समेत 36 लोग मारे गए थे।

ताड़मेटला :- 6 अप्रैल 2010 को बस्तर के ताड़मेटला में सीआरपीएफ के जवान सर्चिंग आपरेशन के लिए निकले थे, जहां नक्सलियों ने बारुदी सुरंग लगा कर 76 जवानों को मार डाला था।

मदनवाड़ा :- 12 जुलाई 2009 को राजनांदगांव के मानपुर इलाके में नक्सलियों के हमले की सूचना पा कर, वहां पहुंचे पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे समेत 29 पुलिसकर्मियों पर नक्सलियों ने हमला बोलकर उनकी हत्या कर दी थी।

उरपलमेटा :- 9 जुलाई 2007 को एर्राबोर के उरपलमेटा में सीआरपीएफ और जिला पुलिस का बल नक्सलियों की तलाश कर के वापस बेस कैंप लौट रहा था, इस दल पर नक्सलियों ने हमला बोला दिया था, जिसमें 23 पुलिसकर्मी मारे गए थे।

रानीबोदली :- 15 मार्च 2007 को बीजापुर के रानीबोदली में पुलिस के एक कैंप पर आधी रात को नक्सलियों ने हमला किया और भारी गोलीबारी की थी, इसके बाद कैंप को बाहर से आग लगा दी थी, इस हमले में पुलिस के 55 जवान मारे गए थे।

और अब 3 अप्रैल 2021 को बीजापुर के नक्सली हमले में फिर माँ भारती के 22 वीर सपूत शहीद हो गये हैं।

लाइलाज होते नक्सलवाद का समय रहते इलाज जरूरी!

विचारणीय तथ्य यह हैं कि नक्सली बेखौफ होकर एक के बाद एक घटना को अंजाम देकर देश के अंदर बैठ कर केन्द्र व राज्य सरकार को बार-बार चुनौती दे रहे हैं, आखिर उनके पास सरकार से लड़ने के लिए हथियार व अन्य संसाधन लगातार कहां से आ रहे हैं। वैसे तो हमारे देश में नक्सलवाद एक बहुत बड़ी व बेहद गंभीर समस्या है, जिसके निदान के लिए सरकार को दीर्घकालीन रणनीति पर लगातार दिलोदिमाग से कार्य करना होगा। क्योंकि इस बेहद गंभीर समस्या के चलते प्रभावित क्षेत्रों में आयेदिन लोगों व सुरक्षाबलों को अपने जानमाल से हाथ धोना पड़ता है, देश के अंदर ही माँ भारती की रक्षा के लिए देश के अंदर छुपे हुए गद्दारों से निपटते हुए आयेदिन पैरामिलिट्री फोर्स के वीर जवानों को अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ता है। लेकिन बेहद चिंताजनक बात यह है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की बेहद विकट परिस्थिति होने के बाद भी ना जाने क्यों हमारे देश के नीतिनिर्माता आजतक नक्सलवाद की इस बेहद गंभीर समस्या का स्थाई समाधान करने में नाकाम रहे हैं, सूत्रों के अनुसार बल्कि कुछ राजनेता तो समय-समय पर अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए नक्सलियों को संरक्षण देकर अपनी राजनीति चमकाने का कार्य करते रहते हैं। वैसे हमारे देश में जिस दृढ़ संकल्प के साथ लगातार अलगाववादियों से निपटने की मुहिम सरकार के द्वारा चलाई जा रही है, वह बेहद काबिलेतारीफ है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि देश से नक्सलवाद के सफाये के लिए कभी दृढ़ संकल्प व दृढ़ इच्छाशक्ति ना जाने क्यों नजर नहीं आती है, यहां तक की कभी दिल से यह जानने की कोशिश भी नहीं की गई है कि आखिरकार नक्सलवाद है क्या और आखिर इसका किस परिस्थिति की वजह से हमारे देश में जन्म हुआ व कैसे हुआ। देश के नीतिनिर्माता को राजनीतिक नफा-नुकसान त्याग कर देशहित में जल्द से जल्द यह समझना होगा कि भारत में नक्सलवाद के पीछे की वास्तविकता आखिर क्या है और उसके निदान के लिए दूरगामी स्थाई रणनीति आखिर क्या होगी। इसके लिए हमको नक्सलवाद के हर पहलू को बहुत ही बारीकी से समझना होगा।

लाइलाज होते नक्सलवाद का समय रहते इलाज जरूरी!

आखिर कार नक्सलवाद क्या है - कुछ माओवादी विचारधारा के लोगों द्वारा गुरिल्ला छापामार युद्ध के ज़रिए राज्य को अस्थिर करने के उद्देश्य से बेहद हिंसक संसाधनों का प्रयोग करते हुए जबरदस्त ढंग से जानमाल को नुकसान पहुंचाकर सरकारी संसाधनों की लूटखसोट की जाती है, इसको ही आज के समय का नक्सलवाद कहा जाता है। हमारे देश भारत में ज्यादातर नक्सलवाद माओवादी विचारधाराओं पर आधारित है। इस विचारधारा के ज़रिए वह मौजूदा शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहते हैं और लगातार गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से चुनौती देकर "जनता की सरकार" बनाने का क्षेत्रवासियों को सपना दिखाकर उनको अपने पक्ष में करते हैं। लेकिन इन क्षेत्रों की हालात देखकर यह भी साफ हो जाता है कि यह लोग जनता के कितने बड़े हितैषी हैं। संक्षिप्त में अगर बात करें तो भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल के सशस्त्र हिंसक आंदोलन का नाम नक्सलवाद है। चारू मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग से बहुत ज्यादा प्रभावित थे और वह मानते थे कि भारत में मजदूरों और किसानों की खस्ताहाल व दुर्दशा के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। इसीलिए वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के ग्राम नक्सलबाड़ी से सत्ता के खिलाफ होने वाले संघर्ष की शुरूआत को नक्सलवाद आंदोलन कहा जाता है। शुरुआत में तो पुलिस ने इस आंदोलन को कुचलने की भरकस कोशिश की थी, लेकिन आज फिर दशकों बाद इस आंदोलन ने देश में झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे अनेक राज्य में अपना बहुत तेजी से एकबार फिर से जबरदस्त प्रभुत्व कायम कर लिया है। आज देश के लगभग 11 राज्यों के विभिन्न जनपदों में नक्सलवाद की जड़ें बेहद गहरी हो गयी हैं।

लाइलाज होते नक्सलवाद का समय रहते इलाज जरूरी!

सरकार को समझना होगा नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र का दर्द

केन्द्र व राज्य सरकार नक्सलवाद से प्रभावित सभी जनपदों से इसका सफाया तो करना चाहती है, इसके लिए उन्होंने समय-समय पर भरपूर धन आवंटन इस क्षेत्र के लिए लगातार किया है, क्योंकि रोजमर्रा की जरूरत व विकास दौड़ में नक्सल प्रभावित यह सभी जनपद बेहद पिछड़े हुए है, जिसके चलते पिछड़ने के कारण यह नक्सलवाद प्रभावित जनपद देश में अलग-थलग से रहने लगे हैं। सूत्रों के अनुसार इन जनपदों में नक्सली, अधिकारियों, नेताओं व ठेकेदारों के गठजोड़ों की कृपा से भ्रष्टाचार अपने चरम पर है और उसके द्वारा नक्सलवाद के नाम पर केंद्र व राज्य सरकारों के द्वारा आवंटित धन की जमकर बंदरबांट की जा रही है, नक्सल प्रभावित क्षेत्र में विकट परिस्थिति व भ्रष्टाचार के चलते विकास कार्य बहुत दूर की कौड़ी बन गये हैं। जबकि आमतौर पर नक्सल प्रभावित जनपद को केंद्र और राज्य सरकार के द्वारा इतना धन आवंटित किया जाता है कि अगर उस धन को ईमानदारी से सही ढंग से खर्च किया जाए तो नक्सल प्रभावित राज्य व जनपद की तस्वीर बहुत कम समय में तेजी से विकसित क्षेत्र होकर बदल सकती है, मगर धरातल पर ऐसा नहीं हो पाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की अधिकांश आबादी मूलभूत सुविधाओं के बिना रहती है, यहां तक की बिजली, स्वच्छ पेयजल और शौचालय भी दूर की बात है। नक्सल प्रभावी क्षेत्र में अगर कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है तो उसके बेहतर उपचार के लिए पास में कोई अच्छा हॉस्पिटल तक नहीं हैं, क्षेत्र में जरा-जरा सी बीमारियों के उपचार के लिए लोगों को मरीज के साथ मीलों धक्के खाने पड़ते हैं। स्कूल, मुख्य सड़कों व ग्रामीण संपर्क मार्गों का क्षेत्र में भारी अभाव है, रोजगार के नाममात्र के साधन हैं। इन क्षेत्रों खनन करने जैसी सरकारी नीतियों के विरोध में नक्सलियों में काफी आक्रोश रहता है, वो आमजनमानस को भी उसके खिलाफ उकसाते रहते हैं।

CRPF के DG ने नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन करने के दिए संकेत

अफसोस की बात यह है कि आसानी से शिक्षा के लिए स्कूल तक खुलने नहीं दिये जाते हैं, तो फिर इस क्षेत्र के विकास के लिए आवंटित धन आखिर कहां चला जाता है, वैसे तो यह सिस्टम में जग-जाहिर सी बात है कि केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए आवंटित धन की नेताओं-अफसरों-ठेकेदारों के बीच में बंदरबांट हो जाती है, लेकिन बंदरबांट की बात मात्र यहीं खत्म नहीं होती है, इस धन में से तय हिस्सा नक्सलियों के शीर्ष नेतृत्व के पास भी पुहंच जाता है और फिर यही धन हमारे वीर जवानों के खिलाफ लड़ने के लिए संसाधन इकट्ठा करने में खर्च किया जाता हैं। सरकार को दृढ़ संकल्प व दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ अब लाइलाज होता नक्सलवाद से निपटने के लिए कारगर रणनीति बनानी होगी, नक्सलियों के सफाये के लिए उनके पैसा उपलब्ध करवाने वाले सभी गठजोड़ को जल्द से जल्द समाप्त करना होगा, नक्सल प्रभावित क्षेत्रवासियों के वास्तविक मर्म को समझकर उसके निदान के लिए धरातल पर ठोस काम करना होगा, जिससे की क्षेत्र के लोग नक्सलवाद को छोड़कर आमधारा में शामिल हो सकें और देश के विकास को गति प्रदान कर सकें।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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English summary
Naxalism being incurable, treatment is necessary in time!
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