गो हत्या पर रासुका: चुनाव से पहले 'पवित्र' होना चाहती है कमलनाथ सरकार?

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार को क्या हो गया है! वह योगी आदित्यनाथ सरकार से स्पर्धा करती दिख रही है। गाय के मामले में ये दोनों सरकारें एक-सा रुख अपना रही हैं, बल्कि कहें कि एक-दूसरे को मात देने की कोशिश कर रही हैं। खण्डवा में तीन युवकों पर रासुका लगा दिया गया है। जानते हैं क्यों? क्योंकि कथित रूप से उन तीनों युवकों ने गाय की हत्या की!

क्या है रासुका?

क्या है रासुका?

रासुका यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून। 1980 में बना यह वह कानून है जो केंद्र और राज्य सरकारों को ये अधिकार देता है कि वह इस आधार पर किसी को भी जेल में बंद कर दे सकती है कि उससे देश को ख़तरा है या फिर उसकी वजह से कानून-व्यवस्था का पालन होना मुश्किल हो गया है। यह कानून इतना सख्त है कि आरोपी व्यक्ति को तीन महीने तक ज़मानत नहीं मिलती। सरकार चाहे तो इस तीन महीने की अवधि आगे भी बार-बार बढ़ा सकती है।

खंडवा के खरखली गांव के पास घटी इस घटना में गिरफ्तार तीनों अभियुक्त नदीम, शकील और आज़म पुलिस की गिरफ्त में हैं। पुलिस का दावा है कि सूचना के अनुसार घटनास्थल पर जब पुलिस पहुंची, तो गाय काटे जाने की बात सही निकली। लेकिन, तब ये तीनों अभियुक्त भाग निकलने में कामयाब रहे जिन्हें बाद में गिरफ्तार कर लिया गया।

गो-हत्या पर रासुका, इंस्पेक्टर की हत्या पर सामान्य केस?

गो-हत्या पर रासुका, इंस्पेक्टर की हत्या पर सामान्य केस?

प्रश्न ये नहीं है कि ये तीनों अभियुक्त दोषी हैं या नहीं हैं। यह तो अदालत में सिद्ध होगा। प्रश्न ये है कि इनके ख़िलाफ़ रासुका लगाया जाना क्या सही है? क्या 1980 में जब कांग्रेस सरकार ने रासुका बनाया था, तब इसका मकसद ऐसे ही मामलों से निबटना था? अब तक बीजेपी सरकार पर ऐसे आरोप लगते रहे थे कि वह इस कानून का दुरुपयोग कर रही है। पिछले दिनों बुलन्दशहर की चर्चित घटना में भी रासुका का इस्तेमाल योगी आदित्यनाथ ने किया था। उसी घटना में एक इंस्पेक्टर की हत्या कर दी गयी। लेकिन हत्या के आरोपी बजरंग दल के कार्यकर्ता पर रासुका नहीं लगा!

यूपी में कांग्रेस समेत दूसरे दल सत्ताधारी बीजेपी के ख़िलाफ़ सवाल उठा रहे हैं कि गाय के हत्यारों के खिलाफ रासुका और इंस्पेक्टर के हत्यारे के ख़िलाफ़ सामान्य अपराध का केस- यह कैसी दंड संहिता है? मगर, खुद मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार भी उसी रास्ते पर चलती दिख रही है। सवाल उठता है कि आखिर क्यों? क्यों कांग्रेस उसी हिन्दुत्व की राह का अनुसरण कर रही है जिस राह पर बीजेपी चल रही है?

अपनी छवि धो रहे हैं कमलनाथ?

अपनी छवि धो रहे हैं कमलनाथ?

आपको याद होगा मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान कमलनाथ का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वे अल्पसंख्यक लोगों की मीटिंग में यह कहते सुने गये थे कि बीजेपी को हराना है तो आप सबको यानी अल्पसंख्यकों को 90 फीसदी मतदान सुनिश्चित करना होगा। 90 फीसदी मतदान सुनिश्चित कराने की बात कभी भी साम्प्रदायिक नहीं हो सकती, लेकिन इसका संदर्भ ऐसा था कि कमलनाथ को तुष्टीकरण करने वाले नेता के तौर पर पेश किया गया। अब मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ इसी छवि को धोने में जुट गये लगते हैं।

सॉफ्ट हिन्दुत्व की राह पर कांग्रेस पहले से चली आ रही है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के घोषणापत्र में गायों की सुरक्षा और संवर्धन को लेकर कई घोषणाएं की गयी थीं। राहुल गांधी ने तो मंदिर-मंदिर घूमने को चुनावी अभियान का हिस्सा ही बना लिया था। जनेऊ और गोत्र जैसे मामलों में भी राहुल का रुख परम्परा से हटकर और चौंकाने वाला था। मगर, ऐसी बातों से किसी का नुकसान नहीं होना था। पर, रासुका के दुरुपयोग से एक नागरिक के तौर पर उसके अधिकारों का उल्लंघन होता है।

दुरुपयोग का दूसरा नाम हो चुका है रासुका

दुरुपयोग का दूसरा नाम हो चुका है रासुका

रासुका का हमेशा ही दुरुपयोग किया जाता रहा है। या कहें कि जब-जब रासुका का इस्तेमाल हुआ है, सरकार की नीयत पर उंगली उठी है। 2017 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण' पर भी रासुका के तहत केस दर्ज किया गया था। शिवराज सरकार में 2009 से लेकर 2016 के बीच 22 लोगों के ख़िलाफ़ रासुका लगाया गया।

ताज्जुब की बात ये है कि जब अपने ऊपर बात आती है तो हर दल रासुका लगाए जाने को गलत ठहराता है। मायावती की सरकार में जब वरुण गांधी पर भड़काऊ भाषण देने पर रासुका लगाया गया था, तब बीजेपी ने इसका डटकर विरोध किया था। खुद कांग्रेस शिवराज सरकार और योगी आदित्यनाथ सरकार की कार्रवाई का विरोध करती रही है। मगर, सत्ता में आने के बाद कमलनाथ सरकार का रुख भी वही है, जो शिवराज सरकार का था।

दलित-पिछड़े-मुस्लिमों पर रासुका का अधिक इस्तेमाल

दलित-पिछड़े-मुस्लिमों पर रासुका का अधिक इस्तेमाल

देखा ये गया है कि रासुका का इस्तेमाल दलित, पिछड़े और मुस्लिम पर अधिक हुआ है। नक्सलियों के ख़िलाफ़ भी इसका जमकर इस्तेमाल हुआ है। मगर, अब गोहत्या के आरोप में रासुका लगाने की परम्परा विकसित हो रही है जो और भी ख़तरनाक है। क्या यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप नहीं लगाए जा सकें?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से जवाब मांगा है कि बीजेपी के विरोध में लड़ाई की बात करते-करते कांग्रेस अब जो कुछ कर रही है, राहुल को इसका जवाब देना चाहिए। वाकई यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि गो हत्या रोकने के लिए क्या रासुका का उपयोग सही है? यह कैसा सॉफ्ट हिन्दुत्व है कि जो आम नागरिकों के मौलिक अधिकार का अपहरण कर लेने को आमादा है? बीजेपी से लड़ने के चक्कर में कहीं खुद बीजेपी तो नहीं बन रही है कांग्रेस!

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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