National Curriculum: शिक्षा में समय की मांग है 'एक देश एक पाठ्यक्रम'
National Curriculum: हाल ही में 12 अगस्त को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (एनसीईआरटी) ने कक्षा तीसरी से बारहवीं तक की विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बनाई है। यह समिति राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020 के कार्यान्वयन के एक भाग के रूप में के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व वाली संचालन समिति द्वारा विकसित स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ-एसई) के साथ पाठ्यक्रम को संरेखित करने के लिए काम करेगी।
इस 'राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और शिक्षण सामग्री समिति' (एनएसटीसी) में विभिन्न क्षेत्रों के 19 विशेषज्ञों को सम्मिलित किया गया है। इन विशेषज्ञों में इंफोसिस फाउंडेशन की अध्यक्ष सुधा मूर्त्ति, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष एवं सदस्य - बिबेक देबरॉय एवं संजीव सान्याल, प्रसिद्ध संगीतकार एवं गायक शंकर महादेवन, भारतीय भाषा समिति के अध्यक्ष चमू कृष्ण शास्त्री, सीएसआईआर के पूर्व महानिदेशक डॉ शेखर मांडे, कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर पद्मश्री सुजाता रामादोराई, बेंगलुरू के प्रकाश पादुकोण बैडमिंटन अकादमी के निदेशक यू. विमल कुमार, आईआईटी गांधीनगर के अतिथि प्राध्यापक माइकल डैनिनो, हरियाणा लोक प्रशासन की पूर्व महानिदेशक एवं पूर्व मुख्य शिक्षा सचिव सुरीना राजन, चेन्नई के नीति-अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष डॉ एमडी श्रीनिवास, एनएसटीसी के कार्यक्रम कार्यालय प्रमुख गजानन लोंढे, एससीईआरटी सिक्किम के निदेशक राबिन क्षेत्री, एनसीईआरटी के प्रोफेसर दिनेश कुमार, प्रोफेसर प्रत्युषा कुमार मंडल, प्रोफेसर कीर्ति कपूर तथा प्रोफेसर रंजना अरोड़ा के नाम शामिल हैं। इस समिति की अध्यक्षता एनआईईपीए के कुलपति महेश चंद्र पंत तथा सह-अध्यक्षता प्रिंस्टन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मंजुल भार्गव को सौंपी गई है।

एनसीईआरटी की अधिसूचना में कहा गया है कि विभिन्न कक्षाओं के लिए तैयार की जाने वाली पाठ्यपुस्तकें राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 एवं नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (एनसीएफ-एसई) पर आधारित होंगीं। 'राष्ट्रीय पाठ्यक्रम एवं शिक्षण शिक्षण सामग्री समिति' (एनएसटीसी) एक स्वायत्त संस्था की तरह काम करेगी, जो आवश्यकता पड़ने पर सहायता एवं परामर्श आदि के लिए अन्य विषय विशेषज्ञों को आमंत्रित करने हेतु स्वतंत्र होगी। इस समिति में विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों को सदस्य के रूप में चुना गया है और इसके अध्यक्ष अब विभिन्न विषय विशेषज्ञों को शामिल कर भिन्न-भिन्न पाठ्यचर्या क्षेत्र समूहों (सीएजी) का गठन करेंगें।
भारतीय भाषा समिति के अध्यक्ष एवं इस समिति के सदस्य चमू कृष्ण शास्त्री के कथनानुसार गणित, विज्ञान, शारीरिक शिक्षा एवं सामाजिक विज्ञान समेत राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क में उल्लिखित 11 विषयक्षेत्रों (डोमेन) पर काम करने के लिए 11 सीएजी का गठन किया जाएगा। पाठ्यक्रम विकास एवं पाठ्यपुस्तकों की डिजाइनिंग आदि की प्रक्रिया में लगभग 1000 से अधिक विषय विशेषज्ञ सम्मिलित होंगें। समिति का लक्ष्य इस शैक्षणिक वर्ष के अंत से पहले पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने का है, ताकि नए सत्र के प्रारंभ होने से पूर्व ही नवीन पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों को सुलभ हो सके। यह समिति एनसीएफ में सुचारु परिवर्तन सुनिश्चित करने के लिए कक्षा 1 और 2 की मौजूदा पाठ्यपुस्तकों को भी उचित रूप से संशोधित करने पर काम करेगी।
उल्लेखनीय है कि पाठ्यक्रम परिवर्तन की दिशा में पूर्व में की गई हर पहल विवादों की भेंट चढ़ती रही है। संभवतः यही कारण है कि एनसीईआरटी द्वारा गठित इस समिति में विविध क्षेत्रों के पेशेवरों एवं प्रसिद्ध हस्तियों को जगह दी गई है। किसी एक व्यक्ति के लिए यह संभव भी नहीं कि वह सभी क्षेत्रों में पूर्ण, समृद्ध एवं निष्णात हो। उदाहरण के लिए, यह आवश्यक नहीं कि विज्ञान, गणित, प्रौद्योगिकी जैसे विषयों में सिद्धता रखने वाला व्यक्ति कला, नृत्य, संगीत, साहित्य, संस्कृति, मानविकी एवं शरीरिक शिक्षा जैसे विषयों में भी पारंगत हो।
अतः भिन्न-भिन्न रुचियों, विषयों एवं वर्तमान की बहुविध आवश्यकताओं की पूर्त्ति हेतु विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों को पाठ्यपुस्तकें तैयार करने वाली समिति में सम्मिलित करना सर्वथा उचित एवं नीतियुक्त कदम है। मसलन - समिति में शामिल किए गए शंकर महादेवन नृत्य-संगीत, सुधा मूर्त्ति नारी सशक्तिकरण, बिबेक देवरॉय एवं संजीव सान्याल स्वतंत्र एवं प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था की बारीकियों को बेहतर ढ़ंग से पाठ्यक्रम में समायोजित कर सकेंगें। वैसे ही अन्य सदस्य अपनी-अपनी विशेषज्ञता वाले विषयों की पाठ्यपुस्तकों की तैयारी में सार्थक योगदान दे सकेंगें।
कुल मिलाकर इस समिति का मुख्य उद्देश्य भविष्योन्मुखी पाठ्यक्रम एवं पाठ्यचर्या तैयार करना है, जो नए एवं विकसित भारत की संकल्पना को साकार करने में सहायक हो, युवाओं की आकांक्षाओं एवं स्वप्नों को पूरा करने वाला हो तथा वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो। भारत स्वतंत्रता का अमृतकाल मना रहा है। स्वाभाविक है कि स्वतंत्रता के पूर्व एवं पश्चात के अनेक प्रसंगों-संदर्भों, संघर्षों-उपलब्धियों, आदर्शों-प्रेरणाओं को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किए जाने की आज विशेष आवश्यकता है।
परंतु दुर्भाग्य से शिक्षा-जगत में दशकों से कुंडली मारे बैठे निहित स्वार्थी तत्त्वों, प्रगतिशीलता के नाम पर यथास्थितिवाद को प्रश्रय एवं प्रोत्साहन देने वाले चंद वैचारिक ख़ेमेबाजों ने परिवर्तन की हर चाप व पहल पर अनावश्यक शोर मचाया है। उम्मीद है, इस बार वे समाज एवं देश की भावनाओं का सम्मान करते हुए पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों में किए जा रहे परिवर्तन को स्वीकार करेंगें। उन्हें यह याद रखना होगा कि समय की गति को मोड़ा या अवरुद्ध नहीं किया जा सकता।
विद्यार्थियों का समग्र, संतुलित व सम्यक विकास, देश की युवा आबादी को रोजगार प्रदान करने तथा वर्तमान की अन्य आवश्यकताओं की पूर्त्ति हेतु पाठ्यक्रम में उचित एवं अपेक्षित परिवर्तन समय, समाज, राष्ट्र और विश्व-मानवता की माँग है। ध्यान देने वाली बात है कि 2006 के पश्चात पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। केवल कुछ पाठ जोड़े या घटाए गए हैं। ऐसा माना जाता है कि हर 10 से 15 वर्ष में पीढ़ी बदल जाती है। नई पीढ़ी की रुचि-प्रवृत्ति-आवश्यकता आदि पिछली पीढ़ी से बिलकुल भिन्न होती है। सूचना, ज्ञान एवं तकनीक के विस्फोट वाले आज के युग में तो परिवर्तन की गति और अधिक तीव्र है। ऐसे में पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों में परिवर्तन अध्ययन-अध्यापन को रोचक, व्यावहारिक, प्रासंगिक एवं जीवनोपयोगी बनाए रखने की दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है।
पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों में बदलाव के पश्चात ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए कि सभी बोर्डों के विद्यार्थी यही पुस्तकें पढ़ें, ताकि भिन्न-भिन्न बोर्डों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा में व्याप्त अंतर एवं भेदभाव को दूर किया जा सके। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मूल भावना संपूर्ण देश में एक शिक्षा, एक पाठ्यक्रम एवं एक परीक्षा-प्रणाली विकसित करने की है। यदि एक राष्ट्र - एक कर, एक राष्ट्र - एक राशन कार्ड, एक राष्ट्र - एक ग्रिड, एक राष्ट्र - एक परीक्षा संभव है तो एक राष्ट्र - एक पाठ्यक्रम क्यों नहीं?
पढ़ने-पढ़ाने का माध्यम व भाषा भले ही अलग हों, राज्य स्थानीय सरोकारों को महत्त्व देने के लिए साहित्य एवं सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों में भले थोड़ा-बहुत परिवर्तन कर लें, परंतु सभी विद्यार्थियों के लिए समान शिक्षा एवं समान अवसर उपलब्ध कराने की दृष्टि से एक देश, एक पाठ्यक्रम निश्चित लागू किया जाना चाहिए। इससे जहाँ अलग-अलग बोर्डों में पढ़ाए जाने वाले भिन्न-भिन्न पाठ्यक्रमों के कारण विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान विद्यार्थियों के समक्ष उपस्थित होने वाली कठिनाइयाँ एवं चुनौतियाँ कम होंगीं वहीं विद्यार्थियों पर से बस्तों का बोझ भी कम होगा।
प्रायः देखने में यह आता है कि निजी विद्यालय प्रकाशकों के साथ सांठगांठ कर मनमानी तरीके से महँगी पुस्तकें खरीदने के लिए बच्चों एवं अभिभावकों पर दबाव बनाते हैं। एक देश, एक पाठ्यक्रम - ऐसी प्रवृत्तियों पर भी अंकुश लगाने में सहायक होगा। तात्कालिक लाभ एवं निहित राजनीतिक स्वार्थों की पूर्त्ति हेतु कई बार देश व समाज को जाति, भाषा, प्रांत, मज़हब एवं भिन्न-भिन्न अस्मिताओं के नाम पर बाँटने का कुचक्र चला जाता है। 'एक देश - एक पाठ्यक्रम' इस प्रकार की विभाजनकारी सोच एवं अलगाववादी प्रवृत्तियों पर लगाम लगाएगा तथा राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की भावना को बल प्रदान करेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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