Deepak Joshi: “ज्योति” के चलते बुझ गया “दीपक”
पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र और भाजपा नेता दीपक जोशी ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि भाजपा का यह पुराना दीपक भाजपा में आने वाली नयी ज्योति के कारण बुझ गया है।

Deepak Joshi: राजनीति में जब तक व्यक्ति आपके साथ होता है तब तक उसकी बुराइयाँ भी पार्टी को अच्छी लगती हैं किंतु जैसे ही वह पार्टी को विदा कहकर अपना रास्ता चुनता है उसकी अच्छाइयां भी बुराई में बदल जाती हैं। यह राजनीति का अनोखा दस्तूर है और इसे वही समझ सकता है जिस पर बीती हो। मध्य प्रदेश में पूर्व भाजपाई मंत्री दीपक जोशी के साथ आजकल यही हो रहा है।
दरअसल, मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के शलाका पुरुष और 1951 में जनसंघ के संस्थापक सदस्य रहे राज्य के प्रथम गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री स्व. कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी ने भाजपा छोड़ कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है। दीपक जोशी ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि सिंधिया समर्थक विधायक मनोज चौधरी के मजबूत होने से क्षेत्र में उनकी राजनीति कमजोर पड़ रही थी जिसे उन्होंने उपेक्षा का नाम देकर स्वयं को पुनः विधानसभा टिकट का दावेदार बना लिया। चुनाव अब वे "कमल" के बदले "पंजे" के निशान पर लड़ते नजर आ सकते हैं। दम तो वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ बुधनी विधानसभा से लड़ने का भी दिखा रहे हैं क्योंकि भाजपा छोड़ते हुए उन्होंने जिस तल्खी से शिवराज सिंह सहित पार्टी नेतृत्व को घेरा है वह चौंकाता है।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद किसी बड़े भाजपाई नेता का यह पहला इस्तीफा है। यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जबकि अविभाजित मध्य प्रदेश के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ में वनवासियों के बड़े नेता नंदकुमार साय ने राज्य भाजपा को झटका देते हुए भूपेश बघेल का नेतृत्व स्वीकार कर लिया है। भाजपा नेतृत्व उनके इस्तीफे से उबरा भी नहीं था कि मध्य प्रदेश में भी उन्हें ऐसा झटका लगा जिसकी कल्पना उन्होंने नहीं की थी। स्व. कैलाश जोशी हों या नंदकुमार साय, दोनों का नरेंद्र मोदी के साथ लंबा साथ रहा है। ऐसे में साय और स्व. कैलाश जोशी के पुत्र का पार्टी छोड़ना कार्यकर्ताओं को अंदरूनी तौर पर हताश-निराश करेगा।
दीपक जोशी का राजनीतिक सफर
1983 में दीपक जोशी भारतीय जनता युवा मोर्चा की कार्यकारी समिति के सदस्य बने और 1984 में भोपाल के हमीदिया कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए। छात्र संघ अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यों को सराहा गया जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 1991 में बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल की कार्यकारी परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया। 2000 में भारतीय जनता पार्टी ने उनकी क्षमताओं का इनाम देते हुए उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया। 2003 में 12वीं विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें देवास जिले की बागली विधानसभा से टिकट दिया और वे जीतकर विधानसभा पहुँचे।
2008 में पार्टी ने उनका विधानसभा क्षेत्र बदला और उन्हें देवास जिले की हाटपीपल्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया जिसमें उन्होंने जीत हासिल की। 2013 में एक बार पुनः दीपक जोशी ने हाटपीपल्या से विधानसभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस के उम्मीदवार मनोज चौधरी को हराकर जीत हासिल की। इस बार वे शिवराज सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री बने किंतु 2018 के विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस नेता मनोज चौधरी से हार गए और आज वही मनोज चौधरी भाजपा में शामिल होकर उनकी राजनीति की धार को कुंद करने लगे।
दल भी बदला तो सिंधिया की स्टाइल में
11 मार्च, 2020 में जब कांग्रेस नेतृत्व से उपेक्षा और कमलनाथ-दिग्विजय सिंह के षड्यंत्र से दुःखी होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की मौजूदगी में कमल दल का दामन थामा था तो वे भाजपा कार्यालय में अपने पिता स्व. माधवराव सिंधिया की फोटो साथ लेकर गए थे। उसके बाद मध्य प्रदेश भाजपा ने स्व. माधवराव सिंधिया की जयंती व पुण्यतिथि के कार्यक्रम भव्य पैमाने पर मनाने शुरू कर दिये मानों ज्योतिरादित्य के साथ ही पार्टी ने कांग्रेसी रहे स्व. माधवराव को भी अपना लिया हो।
ठीक उन्हीं की तर्ज पर जब दीपक जोशी ने हाथ का साथ लिया तो वे भी अपने जनसंघी पिता स्व. कैलाश जोशी का फोटो साथ लेकर गए जहां उपस्थित कांग्रेसियों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उनका भी कांग्रेसीकरण कर दिया। जबकि स्व. कैलाश जोशी का पूरा राजनीतिक जीवन धुर कांग्रेस विरोधी था।
दिग्विजय सिंह ने लिखी पटकथा
दीपक जोशी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर लंबे समय से सशंकित थे क्योंकि सिंधिया समर्थक विधायक मनोज चौधरी के रहते इस बार उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी का टिकट शायद ही मिलता। इसके अलावा शिवराज सरकार सहित पार्टी संगठन में जिस तरह से सिंधिया अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं उससे भी दीपक जोशी के मुक़ाबले मनोज चौधरी का पलड़ा हर तरफ से मजबूत हुआ है।
दीपक जोशी की इसी आशंका को दिग्विजय सिंह ने पहचाना और खुलेआम उन पर डोरे डाले। यहां तक कि पहली बार उन्होंने ही दीपक जोशी को काबिल पिता का बेटा बताते हुए उन्हें भाजपा में उपेक्षित बता दिया था। इसके बाद से यह कयास लगने लगे थे कि दीपक जोशी जल्दी ही कांग्रेस का रूख कर सकते हैं। दीपक जोशी ने अपने साथ दतिया जिले से पूर्व विधायक राधेलाल बघेल सहित कई पुराने कार्यकर्ताओं को भी कांग्रेस की सदस्यता दिला दी।
दीपक का जाना असंतुष्ट खेमे को ताकत देगा
दीपक जोशी भले ही पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कैलाश जोशी के पुत्र हों किन्तु उन्होंने राजनीति में अपनी मेहनत और समर्पण से अलग मुकाम बनाया था। ज्योतिरादित्य सिंधिया जब भाजपा में आए थे तो अपने साथ 19 विधायकों सहित कांग्रेस के सैकड़ों नेताओं को भी साथ लाए थे। कमलनाथ सरकार के गिरने के बाद जब उन 19 विधायकों द्वारा छोड़ी गई विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए तो उन सभी 19 पूर्व कांग्रेसी विधायकों को ही भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़वाया गया।
19 नेताओं में से 13 पुनः विधायक बने जिनमें महेंद्र सिंह सिसोदिया, प्रद्युम्न सिंह तोमर, डॉ. प्रभुराम चौधरी, गोविंद सिंह राजपूत, तुलसी सिलावट, सुरेश धाकड़, ओपीएस भदौरिया, राजवर्धन सिंह दत्तीगांव, कमलेश जाटव, हरदीप सिंह डंग, रक्षा संतराम सिरौनिया, जजपाल सिंह जज्जी और बृजेंद्र सिंह यादव जैसे बड़े पूर्व कांग्रेसी नेता थे। इन 13 विधायकों में से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को 9 विधायकों को मंत्री पद से नवाजना पड़ा था। जो 6 सिंधिया समर्थक नेता उपचुनाव हारे उनमें इमरती देवी, जसवंत जाटव, गिर्राज दंडोतिया, मुन्नालाल गोयल, रघुराज सिंह कंसाना और रणवीर जाटव जैसे बड़े चेहरे थे। हालांकि हार के बाद भी इन्हें निगम-मंडलों में नियुक्त कर इनका राजनीतिक पुनर्वास किया गया किन्तु यहीं से भाजपा में क्षोभ उत्पन्न हुआ। सिंधिया समर्थक जिन नेताओं ने भाजपा के नेताओं को हराया उनमें पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा, बजरंग दल के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया, पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह, डॉ. राजेश सोनकर, पूर्व मंत्री दीपक जोशी जैसे बड़े नाम थे।
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यूं तो भाजपा में टिकट का फैसला हाईकमान करता है किन्तु यदि इन सभी वर्तमान सिंधिया समर्थक विधायकों (खासकर मंत्रियों) को पुनः टिकट मिलता है तो भाजपा के कई धाकड़ नेताओं की राजनीति समाप्त हो जाएगी और उन्हें सिंधिया को ही अपना नेता मानना पड़ेगा जो फिलहाल संभव नहीं दिखता। दीपक जोशी की बगावत ने कई असंतुष्ट भाजपा नेताओं के लिए विकल्प खोल दिया है कि वे भी चुनावी मौसम में अपनी नियति का फैसला कर लें। भाजपा के लिए पुराने भाजपाईयों की बगावत न सिर्फ उसके लिए हानि का सौदा है बल्कि संगठन में बिखराव का भी संकेत है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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