MP Congress: दिग्विजय और कमलनाथ पर भारी कांग्रेस के जीतू पटवारी
MP Congress: मध्य प्रदेश में जिस प्रकार भाजपा ने पीढ़ी परिवर्तन कर भविष्य का खाका प्रस्तुत किया है उसी प्रकार प्रदेश कांग्रेस का पीढ़ी परिवर्तन भी भविष्य की राजनीति को दृष्टिगत रखकर ही हुआ है। तमाम बड़े दिग्गजों को किनारे कर अपेक्षाकृत युवा जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष, उमंग सिंगार को नेता प्रतिपक्ष और हेमंत कटारे को उपनेता प्रतिपक्ष बनाकर केंद्रीय नेतृत्व ने तय कर दिया है कि अब वह भाजपा की लाइन पर चलकर उससे टक्कर लेगी।
युवाओं को आगे कर यह संदेश देने का प्रयास हुआ है कि अब कांग्रेस भी पुराने और चुके हुए नेताओं को ढोने के मूड में नहीं है। युवाओं को आगे बढ़ाने का कांग्रेस का निर्णय प्रदेश में कांग्रेस की पहचान बन चुके दिग्विजय और कमलनाथ के लिए भी स्पष्ट संदेश है कि अब उनका युग समाप्ति होने को है और उन्हें युवाओं का नेतृत्व स्वीकार करना ही होगा। तीनों के बहाने ही सही, दिग्विजय-कमलनाथ से असंतुष्ट नेताओं की भी पूछ-परख होगी और हाशिए पर पड़े नेताओं के दिन फिरेंगे।

दिग्विजय-कमलनाथ युग हुआ समाप्त
मध्य प्रदेश की राजनीति में तीन दशक से अधिक समय तक दिग्विजय सिंह और कमलनाथ ने कांग्रेस के प्रदेश संगठन को अपने मुताबिक चलाया है। अपने परिवार और बड़ी संख्या में समर्थकों के चलते इन्हें केंद्रीय नेतृत्व से भी चुनौती कम ही मिली है। जो इनका समर्थक नहीं रहा, वह प्रदेश की राजनीति में टिक नहीं पाया। दिग्विजय सिंह ने प्रदेश की राजनीति तो कमलनाथ ने केंद्र की राजनीति की और दोनों ने आपसी सामंजस्य से प्रदेश संगठन को चलाया।
2018 में कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही दोनों के आपसी सामंजस्य में कमी आई। दोनों अपनी विरासत अपने पुत्रों को देकर सम्मानजनक विदाई चाहते थे और इसमें काफी हद तक सफल भी हो जाते किंतु ज्योतिरादित्य सिंधिया की बग़ावत ने इनके सपनों पर कुठाराघात कर दिया। न सरकार बची, न साख। सिंधिया की विदाई दिग्विजय सिंह के खाते में जोड़ी गई। रही-सही कसर इस विधानसभा चुनाव में "कुर्ताफाड़ राजनीति" ने पूरी कर दी।
कांग्रेस के नेता भी समझने लगे कि इन दोनों के रहते उन्हें हमेशा "दरबारी" बनकर रहना पड़ेगा। अभी पिता के संरक्षण में हैं तो भविष्य बेटे की कृपादृष्टि पर चलना पड़ेगा। कांग्रेस आलाकमान भी यह समझ चुका था कि दोनों नेताओं के रहते प्रदेश में कांग्रेस का भला नहीं होने वाला किंतु उसे अवसर नहीं मिल रहा था कि इन्हें कैसे किनारे किया जाए। चुनावी हार ने नेतृत्व की यह इच्छा तो कम से कम पूरी कर दी है। दिग्विजय सिंह के आधा दर्जन रिश्तेदार और तीन दर्जन से अधिक समर्थक चुनाव हारे, वहीं कमलनाथ के समर्थक भी बड़ी संख्या में हारे हैं।
कमलनाथ छिंदवाडा बचाने का श्रेय ले सकते हैं किंतु उनके लिए भी अब वहां कुछ बचा नहीं है। बेटे नकुलनाथ के राजनीतिक भविष्य की चिंता उन्हें करनी है। हालांकि प्रदेश में वर्तमान नियुक्तियां यह संकेत कर रही हैं कि प्रदेश से दिग्विजय-कमलनाथ युग की समाप्ति की स्क्रिप्ट लिख दी गई है। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार, कमलनाथ अपने खास समर्थक बाला बच्चन के लिए प्रदेश अध्यक्ष और स्वयं के लिए नेता प्रतिपक्ष का पद चाहते थे। वहीं दिग्विजय सिंह अपने बेटे जयवर्धन सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनाना चाहते थे। किंतु कांग्रेस आलाकमान ने कमलनाथ के धुर विरोधी जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष और दिग्विजय सिंह के धुर विरोधी उमंग सिंगार को नेता प्रतिपक्ष बनाकर यह संदेश दे दिया है कि अब वह प्रदेश में इन दोनों की छाया से मुक्त होना चाहता है।
कमलनाथ से प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की नाराजगी सामने भी आने लगी है क्योंकि संगठन में बदलाव के तुरंत बाद ही उनके मीडिया सलाहकार पीयूष बबेले की नेमप्लेट प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में तोड़कर फेंक दी गई है। वहीं कमलनाथ से केंद्रीय नेतृत्व की नाराजगी तो और बढ़ गई है क्योंकि प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने विधानसभा चुनाव का 100 करोड़ के खर्च का ब्यौरा कांग्रेस केंद्रीय कार्यालय को भेज दिया है। हालांकि चुनाव पूर्व सारा खर्च वहन करने का दंभ कमलनाथ ने भरा था।
पटवारी-उमंग-हेमंत से क्या हासिल करना चाहती है कांग्रेस?
राहुल गांधी के करीबी जीतू पटवारी युवाओं में खासे लोकप्रिय हैं। अनुसूचित जाति के खाती समाज से आने वाले जीतू पटवारी ने सड़क से सदन तक संघर्ष कर अपनी राजनीतिक जमीन पुख्ता की है। भाजपा सरकार के विरुद्ध कांग्रेस के लगभग सभी जमीनी संघर्षों में पटवारी ने ही युवाओं का नेतृत्व किया है। हालांकि उनका बड़बोलापन उन पर भारी पड़ता रहा है किंतु राहुल गांधी से उनकी करीबी और सर्वमान्य युवा नेता की छवि ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद दिलाया है। अनुसूचित जाति वर्ग एक समय कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता था किंतु नरेंद्र मोदी की सोशल इंजीनियरिंग के चलते भाजपा को इस वर्ग का साथ मिला है जिसे कांग्रेस वापस पाना चाहती है।
जीतू पटवारी मालवा से आते हैं और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा भी इसी क्षेत्र से हैं तो अब प्रदेश की राजनीति का केंद्र बिंदु मालवा बन गया है। आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से यह क्षेत्र दोनों राजनीतिक दलों के लिए महत्त्वपूर्ण है अतः पटवारी को नेतृत्व देकर कांग्रेस इस क्षेत्र में अपनी खोई जमीन वापस पाना चाहती है।
वहीं अपनी बुआ पूर्व उपमुख्यमंत्री और पूर्व नेता प्रतिपक्ष स्व. जमुना देवी की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाले उमंग सिंगार की छवि जुझारू नेता की है और कांग्रेस में उन्हें बड़ा वनवासी नेता माना जाता है। 2001 में मप्र युवा कांग्रेस के अध्यक्ष पद से होते हुए उमंग सिंगार चौथी बार विधानसभा का चुनाव जीते हैं। निमाड़ क्षेत्र से आने वाले उमंग सिंगार न सिर्फ अपनी गंधवानी सीट को कांग्रेस की परंपरागत सीट में तब्दील कर चुके हैं वरन आसपास की कई सीटों पर उनके प्रभाव का सिक्का चलता है। वैसे भी मध्य प्रदेश की राजनीति में वनवासी वर्ग सबसे अहम माना जाता है और राज्य की 47 विधानसभा सीटें वनवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं जबकि लगभग 100 सीटों पर इस वर्ग का सीधा प्रभाव रहता है।
ऐसे में कांग्रेस ने उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बनाकर 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इस वर्ग को साधने की कोशिश की है। उमंग सिंगार जिस धार जिले से आते हैं वह भोजशाला के चलते हिंदुत्व की राजनीति का गढ़ होने के साथ ही एकमात्र जिला है जिसने प्रदेश को चौथा नेता प्रतिपक्ष दिया है। उमंग सिंगार के सामने जिले के साथ ही क्षेत्र की हिंदूवादी राजनीति के बीच कांग्रेस को मजबूती देने का दबाव होगा।
इसके अलावा ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के ब्राह्मण चेहरे हेमंत कटारे को उपनेता प्रतिपक्ष बनाकर कांग्रेस ने ब्राह्मणों को साधने का प्रयास किया है। यह क्षेत्र जाति की जकड़न में कैद है और यहां ब्राह्मण वर्ग राजनीतिक रूप से मुख्य भूमिका में है। फिर उत्तर प्रदेश से सटे होने के चलते वहां के ब्राह्मणों को भी "हाथ के साथ" का संकेत देने का प्रयास है क्योंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि को ब्राह्मण विरोधी बनाने का प्रयास लंबे समय से चल रहा है।
हालांकि एक समय रेप के मामले में फरार रहे पूर्व गृहमंत्री स्व. सत्यदेव कटारे के पुत्र हेमंत कटारे को अपनी छवि सुधारने के साथ क्षेत्र के ही बड़े ब्राह्मण नेताओं से चुनौती मिलेगी और यदि वे इस चुनौती से पार पाने में सफल होते हैं तो सिंधिया लॉबी को पछाड़ सकते हैं और कांग्रेस का नया ब्राह्मण चेहरा बन सकते हैं। तीनों नेताओं के समक्ष चुनौतियां भले ही बड़ी हों किंतु यदि तीनों ने इनसे पार पाकर कांग्रेस की बंजर हो चुकी जमीन को हरा-भरा कर दिया तो आने वाला समय इन्हीं नेताओं का रहने वाला है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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