MP Cabinet: शिवराज के बाद उनके करीबियों पर भी चला दिल्ली दरबार का डंडा
अप्रत्याशित रूप से शिवराज सिंह चौहान के स्थान पर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाने के बाद केंद्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप मध्य प्रदेश में इस कदर बढ़ गया है कि अब उसकी छाप मंत्रिमंडल गठन में भी दिखाई दी है।
इससे पहले महाराष्ट्र में पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस को एकनाथ शिंदे सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाकर केंद्रीय नेतृत्व ने यह संदेश समस्त राज्य भाजपा इकाइयों को दे दिया था कि अब कोई छत्रप महत्त्वपूर्ण नहीं है।

मध्य प्रदेश में सत्ता हस्तांतरण के पश्चात मंत्रिमंडल गठन में शिवराज सिंह के समर्थकों की विदाई इसी संदेश को पुख्ता करती है। ख़ासकर गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह का मंत्री न बन पाना कइयों को खल रहा है और दबी जुबान से ही सही, प्रदेश के भाजपा नेता इस पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं। गोपाल भार्गव (9 बार के विधायक), बिसाहूलाल सिंह (7 बार के विधायक), मीना सिंह (6 बार की विधायक) ओमप्रकाश सकलेचा, भूपेंद्र सिंह, प्रभुराम चौधरी (सभी 5 बार के विधायक), बृजेन्द्र प्रताप सिंह, हरदीप सिंह, ब्रजेंद्र यादव (सभी 4 बार के विधायक) उषा ठाकुर (3 बार की विधायक) जैसे वरिष्ठों की अनदेखी कर अपेक्षाकृत युवा विधायकों को मंत्री बनाकर यह संदेश तो दिया जा सकता है कि उन्हें भविष्य की राजनीति के लिहाज से तैयार किया जाना है किंतु इस प्रश्न का उत्तर अनुत्तरित है कि वरिष्ठों की अनदेखी और नए सत्ता केंद्रों की तैनाती किस प्रकार की राजनीति को जन्म देगी?
मंत्री बनने से वंचित इन सभी वरिष्ठों का यदि समय से राजनीतिक पुनर्वास नहीं हुआ तो ये "केंद्रीय नेतृत्व विहीन" से "समर्थक विहीन" भी हो जाएंगे। हालांकि अभी प्रदेश में 28 मंत्रियों ने शपथ ली है और 7 मंत्री अभी भी बनाए जा सकते हैं। संभवतः भाजपा केंद्रीय नेतृत्व भी वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं कि वरिष्ठों की अनदेखी से कहां-क्या स्थिति बनती है। इन सभी वरिष्ठों में उषा ठाकुर की स्थिति मजबूत नजर आती है क्योंकि उनके साथ किसी प्रकार के विवाद का जुड़ाव नहीं है। वे मात्र कैलाश विजयवर्गीय और तुलसीराम सिलावट के मंत्री बनने से रेस से दूर हुई हैं क्योंकि यदि उन्हें भी मंत्री बनाया जाता तो इंदौर शहर की राजनीति में गुटबाजी बढ़ना तय था। कथित तौर पर अब तक ताई-भाई की राजनीतिक अदावत देखने वाले शहर में दीदी-भाई का बंटवारा होने का अंदेशा था।
सागर के गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह दोनों ही शिवराज सिंह के समर्थक माने जाते हैं और दोनों का मंत्रिमंडल में न होना शिवराज के करीबियों पर दिल्ली दरबार का डंडा चलना ही है। गोपाल भार्गव ने तो बाकायदा चुनाव प्रचार के दौरान इस बार के चुनाव को अपना अंतिम चुनाव बता दिया था। परिणाम के बाद जब भाजपा नेतृत्व ने उन्हें दिल्ली बुलाया तो वे मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार भी माने गए किंतु अब मंत्री भी नहीं बन पाए। दोनों के न होने से बुंदेलखंड में अब सिंधिया समर्थक गोविंद सिंह राजपूत अपनी राजनीतिक चौधराहट दिखायेंगे। हरदीप सिंह और प्रभुराम चौधरी अच्छे परफॉर्मर साबित नहीं हुए, वहीं मीना सिंह का वनवासी समाज में विरोध और पूर्व में मंत्री रहते हिंसक झड़प ने उनका पत्ता काट दिया। बिसाहूलाल सिंह को महिला विरोधी टिप्पणियां भारी पड़ीं तो ब्रजेंद्र यादव ठेकेदारी में मारे गए।
शिवराज सिंह के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी मंत्रिमंडल गठन से झटका लगा है। पिछली बार शिवराज सरकार में ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक 9 मंत्री थे जो अब घटकर 3 रह गए हैं। 3 पूर्व मंत्री चुनाव हारे, 1 को टिकट ही नहीं मिला और 2 मंत्री नहीं बनाए गए। ऐसा कहा जा रहा है कि जिन वरिष्ठ नेताओं को मंत्रिमंडल में स्थान मिला है उनसे सरकार में बैलेंस नजर आएगा क्योंकि शिवराज सिंह चौहान ने अपनी पारी में किसी अन्य के चेहरे को उभरने नहीं दिया। जो उभरे वे या तो बाहर हुए अथवा उनके समर्थक बने।
नए मंत्रिमंडल से अफसरशाही भी किसी एक को चेहरा नहीं मानेगी। इन वरिष्ठों में कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल, राव उदय प्रताप सिंह, राकेश सिंह सम्मिलित हैं। मंत्रिमंडल गठन के बाद अब विभागों का बंटवारा होना है और इसमें भी दिल्ली दरबार की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। सबसे अधिक नजर सरकार में नंबर 2 रहने वाले गृहमंत्री पद पर होगी जो केंद्रीय नेतृत्व की पसंद का रहने वाला है।
क्षेत्रवार संतुलन साधने का दावा
मालवा से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा की शपथ के बाद यह माना जा रहा था कि मालवा-निमाड़ के कई बड़े दिग्गज खाली हाथ रहने वाले हैं और हुआ भी यही। पूर्व मंत्रियों उषा ठाकुर, अर्चना चिटनीस, हरदीप सिंह को अवसर न देकर नए चेहरों पर दांव लगाया गया है। हालांकि 7 मंत्रियों के साथ क्षेत्र को बड़ा प्रतिनिधित्व मिला है। राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और सिंधिया कोटे से तुलसीराम सिलावट का दावा सबसे मजबूत था और दोनों मंत्री बने हैं।
ऐसी खबरें थीं कि कैलाश विजयवर्गीय स्वयं मंत्री बनने के बजाए अपने खास समर्थक और पांचों राज्यों की सर्वाधिक बड़ी जीत के रिकॉर्ड के साथ विधायक बने रमेश मेंदोला को मंत्री बनवाना चाहते थे किंतु भाजपा नेतृत्व ने उनकी वरिष्ठता और संगठन कौशल को देखते हुए उन्हें ही चुना। राजघराने के कुंवर विजय शाह को वनवासी समाज में पैठ के चलते भाजपा अनदेखी नहीं कर सकती थी और तमाम विवादों के बावजूद उनका मंत्री बनना तय था। निर्मला भूरिया को मंत्री बनाकर धार, झाबुआ, अलीराजपुर में पार्टी ने दिलीप सिंह भूरिया की विरासत को आगे बढ़ाने का मन बनाया है।
बघेलखंड से पिछली बार भी चार मंत्री थे, इस बार भी चार मंत्री हैं। दूसरे उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला के साथ दिलीप जायसवाल, राधा सिंह और प्रतिमा बागरी को मंत्री बनाया गया है। 35 वर्ष की प्रतिमा बागरी नई कैबिनेट का सबसे युवा चेहरा हैं। भोपाल-नर्मदापुरम को 6 मंत्रियों के साथ उचित प्रतिनिधित्व दिया गया है। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. बाबूलाल गौर की पुत्रवधु कृष्णा गौर को मंत्री बनाकर भोपाल में शिवराज समर्थक कई विधायकों के अरमान ठंडे कर दिए गए हैं। इससे भाजपा नेतृत्व ने यह संदेश भी दे दिया है कि नेता विशेष का समर्थक होना पार्टी के प्रति समर्पण की गारंटी नहीं होता। हालांकि शिवराज समर्थक विश्वास सारंग को युवाओं में लोकप्रियता का इनाम जरूर मिला है।
मंत्रिमंडल में सर्वाधिक लाभ महाकोशल को हुआ है। पिछली बार मात्र एक राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) वाले क्षेत्र को इस बार चार मंत्री पद मिले हैं जिनमें प्रह्लाद सिंह पटेल भी शामिल हैं। वे भी संभवतः मंत्री पद नहीं चाहते थे किंतु भाजपा नेतृत्व का आदेश उन्हें भी मानना पड़ा। ग्वालियर-चंबल से नारायण सिंह कुशवाहा, प्रद्युम्न सिंह तोमर, राकेश शुक्ला और एदल सिंह मंत्री बनाए गए हैं। नरेंद्र सिंह तोमर के विधानसभा अध्यक्ष बनने के बाद अब भाजपा में सिंधिया समर्थक प्रद्युम्न सिंह तोमर चंबल में भाजपा की धुरी बन गए हैं।
मंत्रिमंडल गठन से पूर्व राजनीतिक हलकों में ऐसी आशंका जताई जा रही थी कि लोकसभा चुनाव को देखते हुए इसमें प्रतिनिधित्व तय होगा किंतु समीक्षा से यह तथ्य सामने आ रहा है कि लोकसभा चुनाव में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही प्रमुख चेहरा होंगे भले ही मुख्यमंत्री-मंत्री कोई भी हो।
13 ओबीसी, 7 सवर्ण, 5 अनुसूचित जाति और 5 अनुसूचित जनजाति वर्ग सहित 5 महिलाओं को मंत्री बनाकर भाजपा नेतृत्व ने "भागीदारी-हिस्सेदारी" की राजनीति पर लगाम लगाने का प्रयास किया है। अब इसमें वह कितनी सफलता प्राप्त करता है, यह लोकसभा चुनाव परिणाम तय कर देगा। फ़िलहाल तो भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने जो निर्णय मध्य प्रदेश को लेकर लिए हैं, वे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही जनता के गले भी नहीं उतर रहे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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