Modi in Tamil Nadu: अलगाववादी द्रविड़ राजनीति के जवाब में नरेन्द्र मोदी का कलई वणक्कम्
Modi in Tamil Nadu: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 12 अप्रैल 2018 को तमिलनाडु के कांचीपुरम् में डिफेन्स एक्सपो का उद्घाटन करने गये थे। अपने भाषण की शुरुआत उन्होंने कलई वणक्कम् से किया। तमिल में कलई वणक्कम् का अर्थ होता है सुप्रभातम्। इसके बाद उन्होंने तमिल के महान कवि थिरुवल्लुवर की एक कविता की पंक्तियां भी पढ़ी, "थोट्टानैथु थूरुम मनारकेनी मांधारकु, कत्रनैथु थूरुम अरिवु।" अर्थात "रेत और मिट्टी में आप जितनी गहराई में उतरते हैं, आप नीचे झरने तक पहुंचते हैं। जितना अधिक आप सीखते हैं, ज्ञान की मुक्त धाराएं बहती हैं।"
कांचीपुरम न केवल शंकराचार्य की पीठ के लिए विख्यात है बल्कि अलगाववादी द्रविड़ राजनीति के जनक कहे जानेवाले रामास्वामी पेरियार की नास्तिकता का संदेश देनेवाला केन्द्र भी है। उस कांचीपुरम में जब नरेन्द्र मोदी ने महान तमिल राज्य के लोगों को कलई वणक्कम् किया तो बहुत देर तक तालियों की गूंज होती रही। संभवत: तालियों की यह गूंज चेन्नई के मैलापुर तक पहुंची जहां डीएमके का संचालन करनेवाला करुणानिधि का परिवार रहता है।

अगस्त 2018 में जब करुणानिधि का निधन हुआ तो पीएम मोदी ने ट्वीट किया "हमने एक ऐसा मास लीडर खो दिया जिनका जीवन गरीबों और वंचितों के लिए समर्पित था।" इतना ही नहीं, जब करुणानिधि का स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया था तब नवंबर 2017 में मोदी उनका कुशलक्षेम पूछने उनके आवास पर भी गये थे। एक ऐसी पार्टी जिसकी जड़ें आरएसएस में निहित हो उस पार्टी के पीएम द्वारा यह अपनापन पाकर डीएमके नेता भले अभिभूत हुए हों लेकिन चिंता भी जरूर गहराई होगी। क्या मोदी तमिलनाडु में अपनी पार्टी भाजपा की जड़ें जमाना चाहते हैं?
जयललिता के निधन के बाद जिस तरह से मोदी की एआईएडीएमके के साथ नजदीकियां बढ़ीं, उसका फायदा भाजपा को सिर्फ दिल्ली में ही नहीं होनेवाला था। राज्य में पहली बार भाजपा को दो द्रविड़ दलों में से एक का पुरजोर समर्थन मिल रहा था जिसकी बदौलत भारतीय जनता पार्टी तमिलनाडु में राजनीतिक उपस्थिति महसूस करा सकती थी।
लेकिन पीएम मोदी सिर्फ करुणानिधि परिवार से मिलने या उनकी मृत्यु पर शोकसंवेदना प्रकट करने वाली औपचारिकता तक सीमित नहीं रहे। वो तमिल राजनीति में उत्तर दक्षिण के गहरे विभाजन को समझते हैं। उन्हें संभवत: इस बात का भी बखूबी अहसास था कि तमिलनाडु में संस्कृत और तमिल के बीच विभाजक रेखा खिंची हुई है जिसे सिर्फ तभी मिटाया जा सकता है जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमिल भाषा और तमिल संस्कृति का गुणगान किया जाए।
समय समय पर मोदी को जब भी मौका मिला तमिल भाषा और तमिल संस्कृति ही नहीं चोल राजवंश की भूरि भूरि प्रशंसा करते रहे। सितंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिये अपने भाषण में तमिल को विश्व की प्राचीनतम भाषा बताते हुए तमिल कवि कनियन पुंगुदरानर की एक कविता का उल्लेख किया "यदुम ऊरे यावरुम केलिर", जिसका अर्थ है 'हम सभी स्थानों और सभी के हैं'। मोदी ने तमिल कविता का उल्लेख करते हुए कहा कि सीमाओं से परे अपनेपन की यह भावना भारत के लिए अद्वितीय है।
इसके अगले महीने 11 अक्टूबर 2019 को प्रधानमंत्री मोदी ने महाबलीपुरम में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का स्वागत किया। यहां वो पारंपरिक तमिल वेशभूषा में पहुंचे थे जो इस बात का संकेत था कि वो भारत की तमिल संस्कृति का कितना सम्मान करते हैं। इसी साल जनवरी में दिल्ली में छात्रों से बात करते हुए उन्होंने तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी भाषा बताया। इसी साल जुलाई महीने में पीएम मोदी जब फ्रांस के दौरे पर थे तब एक बार फिर उन्होंने भारतीय समुदाय के लोगों से संवाद करते हुए कहा था कि "तमिल दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है। एक भारतीय होने के नाते हम सबको इस बात पर गर्व होना चाहिए।"
हालांकि उनके इस बयान के बाद संस्कृत के जानकार लोगों ने आपत्ति भी दर्ज कराई लेकिन इससे मोदी के उस तमिल एकता अभियान को कोई खास फर्क नहीं पड़ता जो वो बीते तीन दशक से चला रहे हैं। नब्बे के दशक में मोदी खुलकर श्रीलंका के तमिल टाइगर्स का समर्थन करते थे। इसके बाद कन्याकुमारी से कश्मीर तक डॉ मुरली मनोहर जोशी ने जो यात्रा निकाली थी उसका संयोजन भी मोदी ही कर रहे थे।
अपने लंबे राजनीतिक अनुभव से मोदी समझते हैं कि तमिलनाडु की द्रविड़ कटुता को कम करना है तो तमिल भाषा और संस्कृति के साथ अपने आप को एकाकार दिखाना होगा। जिस तरह से सदियों पहले आदि शंकराचार्य ने उत्तर दक्षिण और शैव वैष्णव के बंटवारे को कम करने के लिए न केवल संस्कृत में प्रचुर साहित्य की रचना की बल्कि काशी को कांचीपुरम से जोड़ा। दक्षिण और उत्तर के लोगों के बीच एकता के जो सूत्र शंकराचार्य ने प्रतिपादित किये थे मोदी उन्हीं सूत्रों को मजबूत करना चाहते हैं।
केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से पिछले साल नवंबर 2022 में काशी में तमिल संगमम का आयोजन किया गया था जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने किया था। इस कार्यक्रम में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को भी निमंत्रित गया था लेकिन वो नहीं आये। लेकिन इससे मोदी को फर्क नहीं पड़ता। एक कदम और आगे बढते हुए उन्होंने नए संसद भवन में चोल राजवंश में राजदंड के रूप में प्रयुक्त होनेवाले सेंगोल की स्थापना की। सी राजगोपालाचारी ने जिस सेंगोल को 1947 में तमिल इतिहास से खोज निकाला था उसे प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा कक्ष में स्थापित करवा दिया।
यहां यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि द्रविड़ राजनीति करनेवाले लोग चोल राजवंश के तमिल शासक होने पर गर्व तो करते हैं लेकिन चोल राजाओं को हिन्दू शासक मानने से परहेज करते हैं। पिछले साल अक्टूबर में राजराजा चोला के जीवन पर आधारित फिल्म "पोन्नियिन सेल्वन" रिलीज हुई थी तो कमल हासन ने यह कहकर विवाद पैदा कर दिया था कि राजराजा हिन्दू शासक नहीं थे। वो शैव थे। इस विवाद पर उस समय डीएमके नेता टीकेएस एलंगोवन ने कहा था कि दक्षिण भारत में शैव और वैष्णव का विवाद सब जानते हैं। इसके लिखित प्रमाण भी मौजूद हैं। राजराजा चोला शैव राजा थे इसलिए उन्हें हिन्दू राजा कहना गलत होगा।
असल में दक्षिण में हिन्दू या सनातन धर्म के खिलाफ चलनेवाले अभियानों में यही शैव वैष्णव का झगड़ा मूल में है। तमिल भूमि पर नौंवी सदी से अलवार और नयनार संतों की परंपरा जरूर रही लेकिन बारहवीं सदी आते आते अलवार (वैष्णव) संतों की परंपरा लुप्त हो गयी। आज ऊपरी तौर पर भले सनातन धर्म बनाम नास्तिकता, द्रविड़ बनाम आर्य या फिर दक्षिण बनाम उत्तर की लड़ाई दिखती हो लेकिन इसके मूल में शैव वैष्णव का सदियों पुराना झगड़ा ही है जो बदलते समय के साथ नये नये रूप धर लेता है।
दक्षिण भारत के दो राज्यों आंध्र प्रदेश और केरल में वैष्णव धर्म पर्याप्त प्रचलन में है और यहां ऐसा कोई विरोध भी नहीं है लेकिन तमिलनाडु और कर्नाटक में शैव मत का जोर ज्यादा रहा है इसलिए यहां वैष्णव को बाहरी या उत्तर भारत से आया धर्म माना जाता है और शैव मत के लोग इसके साथ सहज नहीं होते। कर्नाटक में बसवन्ना के मतानुसार निराकार शिवभक्ति करनेवाले लिंगायत अपने आपको हिन्दू धर्म से बाहर करने की मांग करते ही रहते हैं।
पेरियार जैसे स्वघोषित नास्तिक ने भी सच्ची रामायण लिखकर वैष्णव मत पर हमला तो बोला लेकिन लंबे समय तक शैव मत पर मौन रहे। इसका कारण संभवत: अडिगलार मरयिमलाई की मित्रता थी जो रेशनल शैविज्म की बात करते थे। पेरियार ने जो रावण लीला शुरु करवाई वो रावण भी शिव भक्त था। आज भी डीएमके या फिर द्रविड़ अलगाववाद की राजनीति करनेवाले नेता कहते ही हैं कि नरसिंह के रूप में विष्णु ने हिरण्यकशिपु की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि वो शिव की पूजा करते थे।
ऐसे गहरे विभाजन के बीच उत्तर में तमिल संस्कृति के प्रतीक चिन्हों को स्थापित करके मोदी उसी खाईं को पाटने की कोशिश कर रहे हैं। चोल राजवंश की विरासत सेंगोल हो या फिर नटराज की प्रतिमा। मोदी ने बहुत योजनापूर्वक उन प्रतीकों को भारत राष्ट्र का प्रतीक बनाकर दिल्ली में स्थापित करवा दिया है। संसद में सेंगोल के बाद अब जी20 शिखर सम्मेलन के लिए चुने गये भारत मंडपम में 20 टन वजनी नटराज को स्थापित करके महान तमिल संस्कृति को कलई वणक्कम् किया है, जो अलगाववादी द्रविड़ राजनीति को तमिलनाडु की जमीन पर सूक्ष्म रूप से कमजोर ही करेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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