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Maya OS: क्या विन्डोज की जगह ले पायेगा माया ओएस?

Maya OS: भारत सरकार अपने कंप्यूटरों में इस साल के अंत तक माया ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्‍तेमाल शुरू कर देगी। शुरुआत सेना, नौसेना और अन्य सुरक्षा संस्‍थानों से की जाएगी। धीरे-धीरे देश के सभी सरकारी संस्‍थानों में कम्‍प्‍यूटरों के दरवाजे विंडोज के लिए बंद हो जाएंगे और उनकी जगह माया ओएस से काम लिया जाएगा।

माया ओएस ओपन-सोर्स उबंटू प्लेटफॉर्म पर आधारित है। वर्तमान में फेडोरा, पेपरमिंट, कुबंटू और उबंटू और इनके जैसे करीब तीन सौ लिनक्स डिस्‍ट्रीब्‍यूशन सक्रिय हैं। इनमें उबंटू सबसे लोकप्रिय लिनक्स डिस्‍ट्रीब्‍यूशन है। एप्‍पल के मैक ओएस और माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज की तरह लिनक्‍स भी एक काफी लोकप्रिय डिस्‍ट्रीब्‍यूशन सिस्‍टम है। इसी प्लेटफार्म पर भारत सरकार के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ), उन्नत कंप्यूटिंग विकास केंद्र (सी-डैक), और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) की एक संयुक्‍त टीम द्वारा माया को विकसित किया गया है।

Maya OS in india Will Maya OS be able to replace Windows?

माया को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि इसे इस्‍तेमाल करने में विंडोज के इस्‍तेमाल के अभ्यस्त कम्‍प्‍यूटर यूजरों को कोई कठिनाई न हो और यह किसी भी साइबर खतरे को नाकाम करने में सक्षम हो। इसके लिए माया में एक घरेलू एंटीवायरस चक्रव्‍यूह जोड़ा गया है। जो वायरस और मैलवेयरों को डेटा तक पहुँचने से रोकता है।

इसे अपनाने के बहुत सारे फायदे हैं। इससे राजकोष पर पड़ने वाला वह बोझ काम होगा जो लाखों की तादाद में वैध विंडोज ओएस खरीदने के लिए हमें वहन करना पड़ता है। यह तकनीक के क्षेत्र में हमारी आत्‍मनिर्भरता, रुतबे को बढ़ाएगा और इन क्षेत्र में नवाचारों को भी प्रोत्‍साहित करेगा। यह हमारी डिजिटल सुरक्षा का तंत्र अभेद बनाने में भी काफी मदद करेगा।

हालांकि इसकी राह में बहुत चुनौतियॉं भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती तो देश के हजारों सरकारी कार्यालयों में कम्‍प्‍यूटर का इस्‍तेमाल कर रहे लाखों कर्मचारियों को एक नए सिस्‍टम को अपनाने के लिए मा‍नसिक रूप से तैयार और प्रशिक्षित करने की है। लेकिन, यह काम इतना असाध्‍य भी नहीं है। इसी प्रश्‍न का उत्‍तर हमने 1985 में भी खोजा था, जब देश में कम्‍प्‍यूटर क्रांति की शुरुआत हुई थी। थोड़ा समय जरूर लग सकता है, लेकिन धीरे-धीरे हम इसे भी अपना ही लेंगे। आखिर विंडोज 95 से विंडोज 11 तक भी तो हमने हर बार अपने आपको नई प्रौद्योगिकी के लिए तैयार किया ही है। फिर माया के लिए क्‍यों नहीं कर सकते ?

सवाल यह है कि आखिर सरकार को इतना बड़ा फैसला लेने की जरूरत क्‍यों पड़ी? दरअसल, भारत साइबर हमलों का शिकार बनने वाले शीर्ष देशों में से एक है। सर्फशार्क की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल के पहले तीन महीनों में ही देश के 21 लाख अकाउंट में सेंध लगाई जा चुकी थी। डेटा चोरी के मामलों में भारत विश्‍व में छठे स्‍थान पर है, जहॉं हर मिनट सोलह खाते डेटा चोरी का शिकार बन रहे हैं। इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए जरूरी है कि कुछ कड़े और कुछ बड़े कदम उठाए जाएं। विंडोज की जगह माया लाने का निर्णय भी ऐसा ही एक महत्‍वपूर्ण कदम है।

कोई भी तकनीक, समाज की भलाई के लिए ही तैयार की जाती है। लेकिन, इंसानी दिमाग बेहद खुराफाती होता है। वह हर तकनीक को हमदर्द की जगह सिरदर्द में बदल देता है। माइक्रोसॉफ्ट का विंडोज ऑपरेटिंग सिस्‍टम भी इसी खुराफाती सोच का शिकार हुआ है। पिछले तीन दशकों से विंडोज को दुनिया का सबसे ज्‍यादा लोकप्रिय ऑपरेटिंग सिस्‍टम माना जाता है। लैपटॉप और डेस्‍कटॉप चलाने वाले यूजर्स में से 74% विंडोज पर ही काम करते हैं। इसके यूजर्स की संख्‍या लगभग 1.5 अरब है। इसका मतलब यह है कि औसतन दुनिया के हर पॉंच मनुष्यों में से एक व्‍यक्ति विंडोज यूजर है। लेकिन साइबर अटैक, रैंसमेवयर, मैलवेयर, डेटा ब्रीच आदि से जुड़े शरारती अथवा अपराधी तत्‍वों में भी यह काफी लोकप्रिय है। इनसे बचने के लिए विंडोज नियमित रूप से खुद को अपडेट करता रहता है, लेकिन इसके समांतर, हमलावर भी खुद को अपडेट करने में पीछे नहीं हैं।

आज हालत यह है कि दुनिया भर में हर रोज करीब 22 सौ साइबर अटैक होते हैं यानि हर साल करीब आठ लाख। वर्ष 2013 से साइबर सुरक्षा में सेंध लगाकर हर रोज औसतन 38 लाख रिकॉर्ड चुराए जा रहे हैं। यह चुनौती कितनी भयावह है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि पिछले साल हरेक डेटा ब्रीच का नुकसान कंपनियों को औसतन 43.5 लाख डॉलर का पड़ा। और, यह कीमत हर साल बढ़ती जा रही है, करीब 23% सालाना। साइबर क्राइम मैगजीन का अनुमान है कि साइबर क्राइम की वजह से विभिन्‍न संस्‍थानों को होने वाला यह आर्थिक नुकसान जो कि वर्ष 2015 में सिर्फ तीन खरब डॉलर ही था, वर्ष 2025 तक सालाना 10.5 खरब डॉलर पहुँच जाएगा।

साइबर अटैक जैसा ही खतरा रैंसमवेयर हमलों का भी है। इसमें अटैकरों द्वारा कम्‍प्‍यूटर को वायरस के जरिए हैक कर लिय जाता है और फिर उन्‍हें फ्री करने के लिए मोटी रकम की मॉंग की जाती है। इस साल इसकी वजह से दुनिया को करीब 30 अरब डॉलर गंवाने पड़ सकते हैं। यह खतरा कितना व्‍यापक है, इसका पता इस बात से चलता है कि बीते साल करीब 90% संस्‍थानों ने इससे प्रभावित होने की बात स्वीकार की। क्‍लाइउडवार्ड्स के मुताबिक रैंसमवेयर, हर 14 सेकेंड में एक नई ऑर्गेनाइजेशन को शिकार बनाते हैं।

आपके कम्‍प्‍यूटर को संक्रमित कर उसे पंगु बना देने के लिए जिम्‍मेदार मैलवेयर कम्‍प्‍यूटर सुरक्षा के लिए एक और बड़ी चुनौती है। पिछले दस सालों में मैलवेयर संक्रमणों के मामलों में 87% की बढ़ोत्‍तरी हुई है। डाटाप्रोट का दावा है कि हर रोज मैलवेयर के लगभग पॉंच लाख साठ हजार नए रूपों का पता चलता है।

ऑफलाइन या ऑनलाइन किए जाने वाले ऐसे तमाम खतरे, न सिर्फ आर्थिक नुकसान का कारण बनते हैं, बल्कि अगर इन्‍हें पहचानने या इनसे निपटने में जरा भी चूक हो जाए तो एक संस्‍थान क्‍या एक पूरे राष्‍ट्र की शांति, सुरक्षा और सम्‍प्रभुता के लिए खतरा साबित हो सकते हैं। विंडोज जैसा ऑपरेटिंग सिस्‍टम इस तरह की समस्‍याओं के लिए अकेला कारण बेशक न हो, लेकिन एक बहुत बड़ा कारण जरूर माना जाता है। क्‍योंकि, यह नियमित अपग्रेडेशन के बावजूद अपने उपयोगकर्ताओं को वैसी सुरक्षा प्रदान नहीं कर पा रहा है, जिसकी उन्‍हें बहुत ज्‍यादा दरकार है।

दरअसल विंडोज की लोकप्रियता उसे अधिक जोखिम भरा बना देती है। साइबर अपराधी भी एक लोकप्रिय प्लेटफ़ॉर्म के लिए ही मैलवेयर और वायरस बनाने में रुचि लेंगे, ताकि अधिक से अधिक लोगों को अपना शिकार बना सकें। दुनिया के तीन चौथाई कम्‍प्‍यूटर यूजर विंडोज़ ओएस यूज करते हैं, जिसकी वजह से यह अटैकरों का भी पसंदीदा टार्गेट है। उनके अधिकांश हमलों की साजिश, इसी ऑपरेटिंग सिस्‍टम की संरचना को ध्‍यान में रखकर रची जाती है।

इस लिहाज से भारत सरकार द्वारा विंडोज को माया से रिप्‍लेस करने का फैसला बहुत ही परिपक्‍व, साहसी और दूरगामी महत्‍व वाला है। अगर यह प्रयोग सफल होता है तो इससे न सिर्फ देश और देशवासियों की सुरक्षा का तंत्र मजबूत होगा, बल्कि यह विंडोज के एक विकल्प के रूप में शेष विश्‍व में अपार कारोबारी संभावनाओं के नए द्वार भी खोल सकता है।

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