Marital Problems: जोखिम से भरा है लव मैरिज और लिव इन रिलेशन
जीवन के सबसे बड़े निर्णय विवाह की बात जब आती है तो फिर लव मैरिज या लिव इन रिलेशन के रिस्क फैक्टर की पहचान पर जोर क्यों नहीं दिया जाता है?
मॉडर्न फाइनेन्सियल मैनेजमेन्ट सिस्टम में जिस बात पर सबसे अधिक जोर दिया जाता है वह है रिस्क मैनेजमेन्ट। इसके तहत किसी बिजनेस में उसके संभावित जोखिम का आंकलन, अध्ययन और फिर निराकरण का उपाय किया जाता है। दुनिया की हर बड़ी कॉरपोरेट कंपनी अपनी वित्तीय सुरक्षा के लिए इस रिस्क मैनेजमेन्ट पर भारी भरकम रकम खर्च करती है। केपीएमजी को दुनिया की सबसे बड़ी रिस्क मैनेजमेन्ट कंपनी माना जाता है जिसका सालाना कारोबार 28 खरब 84 अरब रूपये का है। ऐसी एक नहीं छोटी बड़ी सैकड़ों कंपनियां हैं जो रिस्क मैनेजमेन्ट का बिजनेस करती हैं।

लेकिन इन्हीं कंपनियों में काम करनेवाले या फिर ऐसे ही कॉरपोरेट घरानों को आधुनिकता का पर्याय मानने लोग अपने जीवन का रिस्क मैनेजमेन्ट कितना करते हैं? वित्तीय प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले या इसे बहुत संवेदनशील मानने वाले क्या जीवन में रिश्तों को लेकर कोई प्रबंधन करते हैं? क्या मॉडर्न लोग या मॉडर्न लोगों के प्रभाव में आने वाले लोग ये सोच पाते हैं कि उन्होंने अपनी लाइफ को कितना रिस्क फ्री किया है?
दिल्ली में श्रद्धा वॉकर की हत्या हो या फिर अब मुंबई में सरस्वती वैद्य की हत्या। इन दोनों ही हत्याओं में कई तरह की समानताएं हैं। दोनों ही मामलों में लड़कियों ने स्वतंत्र निर्णय लेकर अपने लिए जीवन साथी का चुनाव किया। उसके लिए परिवार और समाज को पीछे छोड़ दिया। यानी दोनों ही मामलों में लड़कियों ने लव मैरिज या लिव इन रिलेशनशिप के नाम पर एक रिस्क जोन में प्रवेश किया। एक ऐसा रिस्क जोन जहां किसी भी प्रकार की परिस्थिति आने पर वो निरा अकेली पड़ जाने वाली हैं। उनके आसपास किसी भी प्रकार की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। कोई ऐसा स्वजन उनके आसपास नहीं है जो संकट की घड़ी में उसका साथ दे।
सरस्वती वैद्य के माता पिता तो नहीं है लेकिन श्रद्धा वालकर के मामले में वह अपने पिता को कहकर आयी थी कि वह मर जाएगी लेकिन उनके पास लौटकर नहीं आयेगी। ऐसा संभवत: उसने आफताब पर भरोसे के कारण ही कहा होगा। लेकिन जब आफताब के साथ झगड़े शुरु हुए, आफताब ने उसे मारना पीटना शुरु किया तो वह चाहकर भी अपने पिता के सामने अपना दुखड़ा नहीं बता पाई। मॉडर्न मैनेजमेन्ट सिद्धांत के मुताबिक देखें तो जीवन का सबसे अहम फैसला लेते हुए उसने जोखिम का आकलन ही नहीं किया। अगर उसने "स्टैंड एलोन रिलेशन" में आनेवाले खतरों का अध्ययन या विश्लेषण किया होता तो निश्चित ही वह इतना बड़ा कदम नहीं उठाती।
लेकिन लव मैरिज हो या फिर लिव इन रिलेशन दोनों ही मामलों में लड़के या लड़की का स्वभाव विद्रोह करने वाला होता है। सब मामलों में न सही लेकिन अधिकांश मामलों में यह विद्रोह तो दिखता ही है। लव मैरिज या लिव इन रिलेशनशिप के लिए वह परिवार और सामाजिक व्यवस्था की उन रक्षात्मक दीवारों को तोड़ रहा होता है जो एक प्रकार से नवविवाहित जोड़ों के लिए सुरक्षा चक्र प्रदान करती है।
सामाजिक रूप से नवविवाहित जोड़े के लिए जो तीन सुरक्षा चक्र हैं वो हैं, कुल-जाति, धर्म और क्षेत्र। ये तीन लेयर होती हैं जो नवविवाहित जोड़े को नया जीवन शुरु करने के लिए त्रिस्तरीय सुरक्षा प्रदान करती हैं। भारतीय समाज में विवाह में जोखिम को कम करने के लिए तीन प्रकार के आधार हैं। लेकिन हमें ये समझाया जाता है कि जाति, धर्म और क्षेत्र ये रुढिवादी विचार हैं इसलिए विवाह में इन बातों को खारिज कर देना चाहिए। लेकिन जो नहीं बताया जाता वह यह कि भारत जैसे देश में जहां सरकार सोशल सिक्योरिटी देने में पूरी तरह से अक्षम है वहां यही आधार हमारी मैरिड लाइफ में सबसे अधिक सिक्योरिटी देते हैं।
जहां इनकी मर्यादा में रहकर विवाह किये जाते हैं वहां 99 प्रतिशत मामलों में ये लड़कियों के लिए सोशल सिक्योरिटी का काम करते हैं। मैनेजमेन्ट जैसे वित्तीय प्रबंधन में जोखिम की पहचान करके निराकरण खोजता है वैसे ही पर्सनल लाइफ में ये हमारे जीवन में जोखिम को न्यूनतम करते हैं। जहां सामाजिक व्यवस्था का पालन करते हुए विवाह होते हैं वहां समस्याएं नहीं होती हैं, ऐसा नहीं है। लेकिन समस्याएं होने पर अधिकांश मामलों में पारिवारिक या सामाजिक हस्तक्षेप से समस्याओं का कोई न कोई समाधान निकल आता है।
भारतीय समाज की सामाजिक संरचना ऐसी है कि विवाह को समाज का आधार बनाया गया है। यह विवाह ही होता है जहां से समाज का विस्तार होता है। भारत में विवाह दो व्यक्तिगत लोगों का यूनियन तो होता है लेकिन इसके साथ ही वंश, कुल और समाज का विस्तार भी होता है। इसलिए विवाह में कुल, जाति, धर्म और क्षेत्र आदि की बातों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसे जब आप थोड़ा गहराई से समझने जाएंगे तो पायेंगे कि ये सारी व्यवस्था और छानबीन लड़की की सुरक्षा से जुड़ी होती है।
भारतीय समाज में विवाह सदैव स्त्रियों का ही होता है। पुरुष उसमें सिर्फ पूरक की भूमिका निभा रहा होता है। इसलिए भारत के अधिकांश हिस्सों में ऐसी व्यवस्था आपको दिख जाएगी जिसमें कन्या के लिए वर खोजा जाता है। सामाजिक रूप से वर के लिए उपयुक्त कन्या खोजने का चलन बहुत कम है। यह सीधे सीधे लड़की की सामाजिक और व्यक्तिगत सुरक्षा और समृद्धि को सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है। परिवार द्वारा उसके नये घर में जाने पर वहां आनेवाले संभावित रिस्क फैक्टर का संपूर्ण आंकलन किया जाता है। जहां परिवार या समाज को लगता है कि उनकी लड़की के लिए रिस्क फैक्टर न्यूनतम है वहीं अपना रिश्ता तय करते हैं।
लेकिन यही लड़की या लड़का जब स्वयं से लव मैरिज या लिव इन रिलेशन में रहने का निर्णय लेता है तो क्या वह उन सभी आधारों पर अपने भविष्य के जीवन का आकलन कर पाता है जितना उसका परिवार उसके लिए कर सकता था? भारतीय जीवन दर्शन में विवाह के जो 6 आधार बताये जाते हैं उसमें एक गंधर्व विवाह भी है। गंधर्व विवाह का अर्थ वर्तमान में लव मैरिज से ले सकते हैं जहां दो नौजवान एक दूसरे से आकर्षित होकर यौन संबंध बनाते हैं और विवाह बंधन में बंध जाते हैं। लेकिन ऐसे विवाह को अगर भारतीय जीवन दर्शन में हेय माना गया है तो इसके पीछे का वही सामाजिक सिद्धांत है जो अंतत: विवाह के द्वारा परिवार की सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करता है।
संसार में जहां जहां सामाजिक आधार को खत्म करके लव मैरिज को बहुत अधिक बढ़ावा दिया गया, वहां विवाहित जीवन पूरी तरह से अस्त व्यस्त है। अमेरिका में जहां लव मैरिज सर्वाधिक होते हैं वहां के एक शहर न्यूयार्क में तलाक की दर 80 प्रतिशत है। यानी 100 में 80 लव मैरिज तलाक में कन्वर्ट हो जाती हैं। इसी तरह भारत में 2018 का आंकड़ा है कि महिला थानों में वैवाहिक संबंधों में विवाद के जो 860 मामले आये उसमें 520 लव मैरिज के थे। जहां परिवार और समाज नदारद है, वहां छोटी मोटी बातों पर भी अलगाव की अर्जी लगा देना स्वाभाविक है।
तलाक की दर उन्हीं देशों में सर्वाधिक है जहां लव मैरिज का सबसे ज्यादा प्रचलन है। इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव आनेवाली पीढ़ी यानी बच्चों पर होता है। इस दुष्प्रभाव को भारत जैसे देश इसलिए रोक पा रहे हैं क्योंकि आज भी कमोबेश विवाह यहां सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है। बीते महीने मई में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और संजय करोल की पीठ ने अगर ये टिप्पणी की है कि "ज्यादातर तलाक के मामले लव मैरिज में ही उभर रहे हैं," तो गलत नहीं कहा है। जहां विवाह दो लोगों का निजी संबंध है वहां दोनों के लिए रिस्क फैक्टर बहुत बड़ा है। मॉडर्न मैनेजमेन्ट माइंड से भी अगर विवाह को देखें तो घर परिवार और सामाजिक दायरे में रहकर संपन्न होने वाला विवाह ही सुखी जीवन की सबसे अधिक गारंटी देता है।












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