Manipur Women: इक्कीसवीं सदी में भी क्यों हो रहा है स्त्री का चीरहरण?

Manipur Women: अगर मनुष्य ईश्वर की रचना है तो ईश्वर ने जब मानव को गढ़ा होगा तो उसने उसकी जाति, समुदाय, वर्ग, पंथ, धर्म निर्धारित नहीं किये होंगे। उसने मानव जाति को सिर्फ दो लिंगों में विभाजित किया है जो एक-दूसरे के पूरक हैं। मगर प्रकृति के इन मानकों के ठीक विपरीत अगर कुछ देखना है तो सम सामयिक मणिपुर इसका उदाहरण है। यहाँ मानव समाज ने स्वयं का वर्गीकरण इस प्रकार कर लिया है कि यह 'होमो सेपियेंस' की एक प्रजाति तो प्रतीत हो ही नहीं रही। जिस विधाता ने, प्रकृति ने, स्त्री पुरुष को समान रचा था उस स्त्री को आदि मानव की तरह 21 वीं सदी में भी पुरुष "जीती हुई ट्रॉफी" की तरह इस्तेमाल कर रहा है।

मणिपुर की कुकी जनजाति की दो स्त्रियों को वसन विहीन कर, उनके बाल पकड़ कर, वासना के वशीभूत हो उनमें से एक का बलात्कार करके पूरे इलाके में घुमाया गया है वह किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक समान है। मणिपुर अगर सिर्फ आग और हिंसा में जल रहा होता तो शायद पूरे देश की निगाह उस ओर नहीं जाती। मगर स्त्रियों के नग्न वीडियो ने पूरे देश का ध्यान मणिपुर समस्या की ओर खींचा है।

manipur violence update why women not safe even in the 21st century?

ऐसा लग रहा जैसे दो समुदायों के बीच की लड़ाई ने 'कबिलाई लड़ाई' का रूप ले लिया है जहाँ दूसरे को परास्त करने, नीचा दिखाने और पुरुषत्व को ललकारने का माध्यम स्त्रियाँ बन रही हैं। जिस तरह से केश कर्षण करते हुए स्त्रियों के शरीर से कपड़े हटाये गए महाभारत कालीन द्रौपदी के भरी सभा में निर्वस्त्र करने की चेष्टा को बरबस ही याद दिला गया। क्या द्वापर से आज तक स्त्री अपमान को "जीती हुई ट्राफी" की तरह ही समझा जायेगा?

यह वीडियो 4 मई 2023 का बताया जा रहा है जिसका कारण मैतेई समाज की किसी स्त्री के बलात्कार की अफवाह को माना जा रहा है। अफवाह तंत्र के शिकार होकर स्व विवेक खो चुके कुछ लोगों ने 5 कुकी लोगों को बंधक बनाया जिसमें दो पुरुष और तीन स्त्रियाँ थी। समाज की कुत्सित मानसिकता का स्याह सच यह भी देखिए कि 42 और 52 वर्ष की महिलाओं को मात्र नग्न कर परेड कराया गया और उनके प्राइवेट पार्ट के साथ छेड़छाड़ की गयी परंतु रिपोर्ट के अनुसार सामूहिक बलात्कार सिर्फ 21 वर्ष की नवयुवती के साथ किया गया। पुरुष मानसिकता का यह निकृष्ट पहलू समाज के लिए कितना भयावह है?

हमें इस बात को भी समझने की दरकार है कि हम अपने बेटों में इस बात की कितनी समझ भरते हैं कि लड़कियाँ वस्तु नहीं हैं, वासना, क्षोभ और नफरत पूर्ति का माध्यम नहीं हैं। एक तथाकथित सभ्य समाज जो हार-जीत का निर्णय, अधिकार और वर्चस्व की लड़ाई में स्त्री को ढाल और हथियार दोनों बनाता हो, सभ्यता की कौन सी परिभाषा को गढ़ता है?

ऐसा भी नहीं है कि केवल कुकी समाज की महिलाएं ही प्रताड़ित की गयी हैं। अभी पिछले महीने 20 जून को मैतेई समाज की 75 महिलाएं दिल्ली आयी थीं, न्याय मांगने के लिए। उन्होंने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की थी और कहा था कि हमारा उत्पीड़न हो रहा है। मणिपुर जल रहा है। लेकिन उस समय न तो सरकार ने उनकी बात सुनी और न मीडिया ने ही बहुत तवज्जो दी। ऐसे में महिलाओं के उत्पीड़न पर कुकी और मैतेई का विभाजन भी ठीक नहीं है। इसके राजनीतिक लाभ तो हो सकते हैं लेकिन सामाजिक रूप से दोनों ओर से महिलाओं को प्रताड़ना झेलनी पड़ी है।

मणिपुर से दूर बैठे लोग अपने अपने राजनीतिक लाभ के अनुसार इस वीडियो को देखने और फॉरवर्ड करने वाले भी दोषी हैं जो समाज के एक डरावने सच को उजागर करता है जहाँ स्त्री की मर्यादा एक न्यूज़, सेंसेशन से ज्यादा कुछ भी नहीं। राजनीति और प्रशासन की जवाबदेही कम नहीं होती और प्रधानमंत्री पर विपक्ष का आरोप है कि उन्होंने चुप्पी तोड़ने में बहुत देर कर दी। परंतु सच्चाई यह भी है कि कोई राजनैतिक दल स्त्री सुरक्षा पर खरी उतरती नज़र नहीं आता। इसका कारण यह भी है कि कोई नेता या राजनीतिक दल मानसिकता बदलने का जादू नहीं जानता।

जब तक हम सबके भीतर यह जिम्मेदारी नहीं आयेगी कि 'हमारे बेटे ने नारी अस्मिता पर प्रहार' किया तो हमारा कुल कलंकित होगा तब तक ऐसी समस्या दिखती रहेगी। क्योंकि ऐसी समस्या सिर्फ मणिपुर की नहीं है। कल कोई और मणिपुर था आज कोई और है, कल कोई और होगा जो स्त्री को अपनी हार जीत का विषय बनायेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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