Manipur: कहीं पूर्वोत्तर का दूसरा "असम" न बन जाए मणिपुर
मणिपुर में मेइति समुदाय की शिकायत को सावधानी से सुनने की जरूरत है। जिस तरह से मणिपुर में बाहरी लोगों की संख्या बढ़ रही है उससे खतरा पैदा हो गया है कि कहीं असम की तरह यहां भी स्थानीय लोगों से अधिक अप्रवासी न बस जाएं।

Manipur: मणिपुर में तीन समुदायों मेइति, नागा और कुकी के बीच जातीय प्रतिद्वंद्विता का एक लंबा इतिहास रहा है। पहाड़ी जनजातियों का दावा है कि घाटी के लोगों ने राज्य में सभी विकास कार्यों पर कब्जा कर लिया है क्योंकि उनका राजनीतिक प्रभुत्व है जबकि मेइति का आरोप है कि वे अपनी पैतृक भूमि में तेजी से हाशिए पर जा रहे हैं। उनकी संख्या, जो 1951 में मणिपुर की कुल जनसंख्या का 59 प्रतिशत थी, 2011 की जनगणना के अनुसार घटकर 44 प्रतिशत हो गई है। मेइति समुदाय का आरोप है कि नागा और कुकी इम्फाल घाटी में तेजी से बसकर मेइति को भूमिहीन बना रहे हैं।
भौगोलिक रूप से, मणिपुर को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- इंफाल घाटी और पहाड़ी क्षेत्र। मणिपुर के 60 विधानसभा क्षेत्रों में से 40 घाटी क्षेत्रों में हैं, जिनमें छह जिले शामिल हैं- इंफाल पूर्व, इंफाल पश्चिम, थौबल, बिष्णुपुर, काकचिंग और कांगपोकपी। शेष 20 सीटें अन्य 10 जिलों में फैली हुई हैं। मेइती समुदाय के वर्चस्व वाले घाटी के जिले, जो मुख्य रूप से हिंदू हैं, भौगोलिक क्षेत्र का सिर्फ 11 प्रतिशत हिस्सा है। लेकिन 28 लाख (जनगणना, 2011) की कुल आबादी का 57 प्रतिशत यहीं निवास करते हैं।
नागा और कुकी जनजातियों के वर्चस्व वाले पहाड़ी जिलों में, जो ज्यादातर ईसाई हैं, मात्र 43 प्रतिशत आबादी रहती है। इस प्रकार मेइती के पास मात्र 11% और पहाड़ी ट्राइबल्स (नागा और कुकी) के पास 89% भूमि है। वर्तमान कानून के कारण मेइती पहाड़ों में भूमि नहीं खरीद सकते। मतलब उन्हें 11% भाग से बाहर बसने का अधिकतर नहीं है। जबकि 89% पर पहले से काबिज नागा और कुकी कहीं भी भूमि खरीद सकते हैं और बस सकते हैं।
यही कारण है कि कई संगठन मेइति समुदाय को आदिवासी दर्जा देने की मांग करते रहे हैं। मेइति जनजाति संघ द्वारा मणिपुर उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका में तर्क दिया गया था कि मेइति समुदाय को 1949 में भारत संघ के साथ मणिपुर की रियासत के विलय से पहले एक जनजाति के रूप में मान्यता दी गई थी, लेकिन विलय के बाद एक जनजाति के रूप में अपनी पहचान खो दी। समुदाय को "संरक्षित" करने के लिए, और मेइती लोगों की "पूर्वज भूमि, परंपरा, संस्कृति और भाषा को बचाने" के लिए, वे जनजातीय पहचान वापस चाहते हैं। ऐसे में जैसे ही उच्च न्यायालय ने मैतेई को जनजाति का दर्जा दिया उनका विरोध शुरु हुआ।
इस संघर्ष का दूसरा कारण म्यांमार से नागा और कूकी ट्राइब का अवैध आप्रवासन हैं। मार्च में, मेइती समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले कई छात्र संगठनों के नेताओं ने मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के घर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि "म्यांमार, नेपाल और बांग्लादेश के अवैध अप्रवासी" "मणिपुर के स्वदेशी लोगों" को हाशिए पर डाल रहे हैं। उन्होंने नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) के कार्यान्वयन और जनसंख्या आयोग की स्थापना की मांग की।
छात्रों के समूहों का आरोप है कि पहाड़ियों में अप्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि हुई है। वे 2011 की जनगणना में घाटी और पहाड़ियों के बीच जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर के अंतर की ओर इशारा करते हैं- घाटी में 16 प्रतिशत जबकि पहाड़ियों में 40 प्रतिशत। कुकी पर अक्सर "प्रवासी" या "विदेशी" कहकर आरोप लगाया जाता है। मेइति समुदाय का आरोप है कि मणिपुर के कुकी और नागा म्यांमार के कुकी और नागा को पहाड़ों में अवैध रूप से बसाकर जनसांख्यिकी में बदलाव कर रहे हैं।
कुकी-विरोधी भावना तब और तेज हो गई जब कुकी-चिन-ज़ोमी-मिज़ो समुदाय से संबंधित कई म्यांमार शरणार्थी, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड की पहाड़ियों में रहने वाली अपनी जनजातियों के साथ जातीय मूल साझा करते हुए, इन राज्यों में म्यांमार जुन्टा द्वारा आतंकवाद विरोधी अभियानों के बाद भाग आये और बसने लगे। मेइति छात्रों के समूहों का दावा है कि आरक्षित वन भूमि में नए गांव उभर रहे हैं और इसके कारण अफीम के बागान नए क्षेत्रों में फैल रहे हैं। मुख्य मंत्री बीरेन सिंह ने भी यह कहा है कि म्यांमार के अप्रवासी राज्य में वनों की कटाई, अफीम की खेती और नशीली दवाओं के खतरे के लिए जिम्मेदार हैं। यहां तक कि उन्होंने अवैध अप्रवासियों की पहचान करने और अस्थायी आश्रय स्थापित करने के लिए एक कैबिनेट उप-समिति का भी गठन किया ताकि वे फिर से अपने देश लौट सकें।
तीसरा कारण मेइति और कुकी के बीच तनाव का एक बड़ा उत्प्रेरक पिछले साल 24 मई को मार्क टी. हाओकिप की गिरफ्तारी थी, जिन पर कुकी के लिए एक मातृभूमि स्थापित करने के लिए राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप था। 37 वर्षीय मार्क एक अलगाववादी संगठन कुकीलैंड पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक की सरकार के प्रमुख हैं, और मणिपुर और म्यांमार में स्थित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ के राज्य अध्यक्ष भी हैं। अधिकांश मेइती ऐसे संगठन को राष्ट्र विरोधी मानते हैं।
चौथा कारण जिसने विशेष रूप से कुकी को नाराज किया, वह अगस्त 2022 में जारी राज्य सरकार का एक नोटिफिकेशन है, जिसमें आदेशित किया गया है कि चुराचंदपुर-खौपुम संरक्षित वन क्षेत्र (चुराचंदपुर और नोनी जिलों में) में 38 गांव अवैध बस्तियां हैं। 1970 के दशक में वन बंदोबस्त अधिकारी द्वारा इन 38 गांवों को संरक्षित वनों से बाहर कर दिया गया था। पिछले नवंबर में, मुख्यमंत्री ने उस आदेश को रद्द कर दिया। बीरेन सिंह ने तब कहा, "मणिपुर का लगभग 19 प्रतिशत क्षेत्र आरक्षित वन है और इन वन भूमि और आरक्षित क्षेत्रों में अवैध बस्तियां हैं। हम इन अवैध अतिक्रमणों को हटा रहे हैं।"
वर्तमान संघर्ष का पांचवा कारण मणिपुर की बीरेन सिंह सरकार द्वारा ड्रग्स और अफीम की खेती के खिलाफ अभियान चलाना है। मणिपुर के कई पहाड़ी क्षेत्रों में, जहां नागा और कुकी रहते हैं और जो अधिकांश ईसाई हैं, अतिरिक्त आय के लिए अफीम की अवैध खेती करते हैं। पिछले एक साल में, बीरेन सिंह सरकार ने अफीम की खेती को खत्म करने और राज्य को नशीली दवाओं के दुरुपयोग से बचाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया है। इस अभियान से प्रभावित अधिकांश गांवों में कुकी समुदाय का निवास है।
मणिपुर अगेंस्ट पॉपी कल्टिवेशन (एमएपीसी), विद्वानों, सामाजिक और राजनीतिक विचारकों, परिवर्तन एजेंटों, युवाओं और कानूनी दिग्गजों द्वारा शुरू किया गया एक आंदोलन है, जो अफीम की खेती के खिलाफ बीरेन सिंह के अभियान की सराहना करता है, किन्तु जिसे नागा और कुकी जातीय और धार्मिक चश्में से देखकर बीरेन सिंह की नीयत पर इसलिए प्रश्न चिन्ह लगाता है कि वह मेइती हैं। जनवरी में, संगठन ने चेतावनी दी थी कि अगर अफीम की खेती के मुद्दे को ठीक से नहीं संभाला गया, तो यह नियंत्रण से बाहर हो सकता है और पहाड़ियों और घाटी को विभाजित कर सकता है।
Recommended Video

अभी तात्कालिक तौर पर केन्द्र सरकार के हस्तक्षेप और सेना की सक्रियता से परिस्थितियां भले नियंत्रण में आ रही हों लेकिन इस हिंसा में 56 लोगों ने अपनी जान गंवा दी और 23 हजार लोग विस्थापित हो गये। आगे फिर ऐसा न हो इसके लिए आवश्यक है कि मेइति समुदाय की समस्या का उचित समाधान हो। अगर समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं निकाला गया तो कोई आश्चर्य नहीं कि मणिपुर पूर्वोत्तर का दूसरा असम बन जाएगा, जहां स्थानीय निवासी से अधिक बाहरी शरणार्थी होंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications