Manipur Crisis: मणिपुर में भाजपा की मुश्किल क्या है?

Manipur Crisis: मणिपुर में दो महीने से जारी लगातार हिंसा ने मोदी सरकार के नौ साल के जश्न को फीका कर दिया है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से मणिपुर हिंसा ऐसा पहला वाकया है, जिसने प्रधानमंत्री मोदी और देश के गृहमंत्री अमित शाह की सख्त प्रशासक वाली छवि पर प्रतिकूल असर डाला है। भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का ऑफ द रिकार्ड कहना है कि 'जम्मू कश्मीर से हमने बिना एक भी गोली चलाए धारा 370 को हटा दिया लेकिन मणिपुर में हमारी ही सरकार होने के बाद भी मणिपुर को लेकर हम पूरी तरह असफल साबित हुए है।' भाजपा के कई अन्य बड़े नेता भी ऐसा ही मानते हैं।

दरअसल भाजपा के भीतर ही मणिपुर मामले को लेकर मतभेद उभर आए हैं। भाजपा सूत्र बताते हैं कि गृहमंत्री अमित शाह और असम के मुख्यमंत्री और नार्थ ईस्ट राज्यों के समन्वयक हिमंता बिस्व सरमा, मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को हटाने के पक्ष में नहीं है। वहीं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे नेताओं की सलाह है कि बीरेन सिंह को तत्काल पद से हटा कर किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री बना देना चाहिए। प्रधानमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने मणिपुर का मामला गृह मंत्री अमित शाह के हवाले कर दिया है। यही कारण रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने न मणिपुर का दौरा किया और न ही मणिपुर को लेकर सर्वदलीय बैठक बुलाई। सर्वदलीय बैठक भी गृह मंत्री अमित शाह ने तब बुलाई जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका के दौरे पर थे।

manipur violence create challenges for BJPs difficulty in Manipur

मणिपुर को लेकर भाजपा की कशमकश सिर्फ दिल्ली के वरिष्ठ नेताओं की नहीं है, मणिपुर में भी भाजपा से ताल्लुक रखने वाले कुकी विधायकों ने बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व से की है। मणिपुर में जारी लगातार हिंसा ने कुकी और मैतेई जनजाति समुदाय के साथ साथ मणिपुर भाजपा के बीच गहरे असंतोष को जन्म दे दिया है। भाजपा के कुकी विधायकों ने अमित शाह के मणिपुर दौरे के समय मुख्यमंत्री बीरेन सिंह को हटाने की मांग की थी। मुख्यमंत्री बीरेन सिंह पर आरोप है कि उन्होने मणिपुर हिेंसा के दौरान मैतेई समुदाय के उपद्रवियों के साथ नरमी बरती जिसके कारण मणिपुर हिंसा ने इतना विकराल रूप ले लिया। मैतेई समुदाय से आने वाले मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का विरोध करते हुए भाजपा के चार विधायक अपने प्रशासनिक पदों से इस्तीफा दे चुके हैं। इसके अलावा मणिपुर भाजपा के राज्य सचिव पाओकाम हाओकिप ने भी बीरेन सिंह को पद से हटाने का समर्थन किया है।

मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को लेकर एक मजेदार तथ्य यह है कि 2015 में भी मणिपुर में जातीय हिंसा छिड़ गई थी और उस समय बीरेन सिंह ने अपनी ही कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह पर हिंसा से निपटने में असफल रहने का आरोप लगाकर भाजपा का दामन थाम लिया था। उस समय राज्य के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह थे। बाद में बीरेन सिंह भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री बन गए थे।

मार्च 2022 में हुए मणिपुर विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 60 सीेटों में से 32 सीटें जीतकर मणिपुर में स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। मणिपुर के 60 में से 40 निर्वाचन क्षेत्र छह जिलों में फैले घाटी क्षेत्र में है। बाकी 20 निर्वाचन क्षेत्र 10 से ज्यादा जिलों में फैले पहाड़ी क्षेत्र में हैं। घाटी के जिलों में मैतेई समुदाय का दबदबा है। घाटी के इन जिलों का इलाका राज्य के क्षेत्रफल का महज 11 फीसद है, पर यहां 57.2 फीसदी आबादी रहती है। बाकी 42.8 प्रतिशत लोग पहाड़ी जिलों में बसे है, जिनमें नागा और कुकी का दबदबा है। इन तीनों समुदाय के बीच जातीय झगड़ों का लंबा इतिहास है। हर छोटे बड़े विरोध और अधिकारों के लिए आर्थिक नाकाबंदी का तरीका अपनाया जाता रहा है। 2017 के चुनाव के ठीक पहले राज्य चार माह लंबी आर्थिक नाकेबंदी से गुजरा था।

लेकिन मणिपुर में जारी वर्तमान हिंसा के बाद भी बीरेन सिंह मुख्यमंत्री बने हुए हैं तो इसका कारण बीरेन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के 28 में से 15 विधायकों का भाजपा का दामन थाम लेना है। बीरेन सिंह ने कांग्रेस से विद्रोह इसी वादे के साथ किया था कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाएगा और भाजपा ने अपना वादा पूरा करते हुए बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया। हालांकि मार्च 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मणिपुर में किसी को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश नहीं किया था, लेकिन असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वसरमा ने बीरेन सिह को भरोसा दिया था कि सरकार आने पर वही मुख्यमंत्री होगे। भाजपा ने 32 सीटों के साथ बेहद मामूली बहुमत हासिल किया। कांग्रेस को 5 सीटें, एनपीपी को 7 सीटें, एनपीएफ को 5 सीटें और अन्य को 11 सीटें मिली थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 21 सीटें जीतने के बाद एनपीपी और एनपीएफ के चार-चार विधायकों और एक तृणमूल तथा एक निर्दलीय विधायक की मदद से सरकार बनाई थी।

दरअसल, भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व का इस बात का डर सता रहा है कि अगर कांग्रेस से मुख्यमंत्री बनने के लिए भाजपा में आए बीरेन सिंह को पद से हटा दिया जाता है तो वह अपने सहयोगी विधायकों के साथ विद्रोह कर देंगे और विपक्षी पार्टियों के साथ गठबंधन कर सरकार बना सकते हैं। इसके अलावा भाजपा को इस बात का भी डर है कि बीरेन सिंह नार्थ ईस्ट में भाजपा के बनाए गए उत्तर पूर्व डेमोक्रेटिक एलायंस को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। भाजपा ने इसका गठन अमित शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते नार्थ ईस्ट में भाजपा को मजबूत और भाजपा की सरकार बनाने के लिए किया था। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वसरमा इसके संयोजक हैं और हिमंता भी बीरेन सिंह को हटाने के पक्ष में नहीं है। ऐसे मे भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व के सामने फिलहाल बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री बनाए रखने की राजनीतिक मजबूरी है।

लेकिन हिंसा के लगातार जारी रहने की दशा में भाजपा हाईकमान द्वारा बीरेन सिंह को बचाना आसान नहीं होगा। मणिपुर की चुनावी राजनीति अक्सर केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी के हिसाब से चलती रही है। इस समय दोनों जगह राज्य और केन्द्र में भाजपा की सरकार है, ऐसे में मणिपुर हिंसा को रोकने में नाकाम रहने पर केन्द्र के पास कोई विश्वसनीय बहाना नहीं होगा।

मणिपुर के ऐसे हालात में कांग्रेस भी अपने लिए आपदा में अवसर देख रही है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री को हटाने की मांग पर अपना ध्यान केन्द्रित कर दिया है। कांग्रेस का नेतृत्व जानता है कि बीरेन सिंह के खून में कांग्रेसी डीएनए है, ऐसे में बीरेन सिंह भाजपा हाईकमान के सामने आसानी से हथियार नहीं डालेंगे और यहीं से कांग्रेस की मणिपुर में सत्ता की राह खुलेगी। इसीलिए सोनिया गांधी के बयान के बाद अब राहुल गांधी स्वयं दो दिन के दौरे पर 29 जून को मणिपुर पहुंच रहे हैं। राहुल गांधी इम्फाल और चूराचांदपुर में राहत शिविरों का दौरा करेंगे और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों से भी मिलेंगे। इससे मणिपुर में भाजपा के लिए मुश्किल कम होने की बजाय और बढ़ेगी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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