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Women in Elections: मध्य प्रदेश में महिलाओं की हिस्सेदारी बनाम भागीदारी का सवाल

Women in Elections: स्त्री शक्ति की आराधना के पर्व नवरात्रि के शुभारंभ के साथ ही मध्य प्रदेश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर पक्ष-विपक्ष में ठन गई है। भाजपा और कांग्रेस ने एक-दूसरे पर महिलाओं की अनदेखी करने का आरोप मढ़ा है जबकि सत्यता यह है कि महिलाओं की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी में पिछड़ेपन में कोई दल किसी से पीछे नहीं है।

राजनीति को केंद्र में रखकर देखें तो हाल ही में मोदी सरकार ने महिला आरक्षण बिल अर्थात नारी शक्ति वंदन अधिनियम को क़ानून बनाया है जिसके अंतर्गत महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है। यदि ईमानदारी से क़ानून का पालन किया जाए तो बड़ी संख्या में महिलाएं राजनीतिक परिदृश्य में दिखेंगी किंतु यह अभी दूर की कौड़ी है।

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वर्तमान समय में मध्य प्रदेश के 230 विधायकों में मात्र 21 महिलाएं हैं। यदि नारी शक्ति वंदन अधिनियम को शत-प्रतिशत लागू किया जाए तो प्रदेश में महिला विधायकों की संख्या 76 हो जाएगी। हो सकता है महिलाओं का विधानसभा में आँकड़ा इससे भी अधिक बढ़े। हालांकि इतिहास देखें तो मध्य प्रदेश में महिला नेत्रियों की राजनीति कुछ ख़ास नहीं चली है। 2003 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा ने महिला नेत्री उमा भारती को चेहरा बनाया था, पूरे प्रदेश से 199 महिलाएं चुनावी मैदान में उतरी थीं किंतु इनमें से मात्र 19 अर्थात् 10.09 प्रतिशत ही जीत पाई थीं।

2018 के विधानसभा चुनाव में तो मात्र 17 महिला प्रत्याशी ही चुनाव जीत पाई थीं जबकि पूरे प्रदेश से 250 से अधिक महिलाओं ने राजनीति के अखाड़े में क़िस्मत आजमाई थी। फिर जीतने वाली महिलाएं भी किसी न किसी राजनीतिक दल की अधिकृत प्रत्याशी थीं जबकि छोटे दलों तथा निर्दलीय चुनाव लड़ने वाली 192 महिला प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई थी।

अपवादों को छोड़ दें तो भी पता नहीं क्यों किंतु राजनीति में महिलाओं को जनता भी बहुत हद तक स्वीकार नहीं कर पाती। महिलाओं को स्वीकार करने की जद्दोजहद तो हालांकि राजनीतिक दल भी नहीं करते। नवरात्रि के पहले दिन घोषित कांग्रेस की 144 प्रत्याशियों की सूची में मात्र 19 महिलाओं को अधिकृत प्रत्याशी घोषित किया गया है जबकि भाजपा ने अब तक 136 घोषित प्रत्याशियों में मात्र 17 महिलाओं को ही चुनाव लड़ने योग्य माना है। दोनों दलों के शेष बचे उम्मीदवारों में भी महिलाओं को बड़ी संख्या में टिकट मिलने की संभावना लगभग नगण्य है। ऐसे में राजनीतिक दल मात्र उनकी बड़ी मतदाता संख्या को भुनाने का ही उपक्रम करते नजर आ रहे हैं।

महिला वोटरों को साधना बड़ी चुनौती

हाल ही जारी अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, मध्य प्रदेश में महिला मतदाताओं की संख्या 2,72,33,945 अर्थात् 48.57 प्रतिशत है जबकि पूर्व के आँकड़ों को देखें तो लोकतंत्र के महायज्ञ में आहुति देने में इनमें से 75 प्रतिशत महिलाएं अपने "मत" का प्रयोग करती हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार, 2003 में 74.58 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया जबकि 2008 में 79.21 प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाला। 2013 के विधानसभा चुनाव में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत बढ़कर 83.17 प्रतिशत हो गया जबकि 2018 के विधानसभा चुनाव में महिला वोटिंग प्रतिशत गिरा और 74.03 प्रतिशत हो गया।

2018 के विधानसभा चुनाव में 10 विधानसभा सीटों पर महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से अधिक थी किन्तु चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन 10 विधानसभा सीटों में से मात्र 2 सीटें भाजपा के खाते में आई थीं, वहीं कांग्रेस को 8 सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। इस बार की मतदाता सूची के अनुसार प्रदेश की 29 विधानसभा सीटों पर महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं के मुकाबले अधिक है जिनमें बैहर, निवास, बिछिया, अलीराजपुर, कुक्षी, पानसेमल, परसवाड़ा, मंडला, बालाघाट, सैलाना, पेटलावाद, जोबट, झाबुआ, मानवर, बदनावर, बरघाट, सरदारपुर, डिंडोरी, रतलाम शहर, वारसोनी, कटंगी, थांडला, छिंदवाड़ा, पुष्पराजगढ़, शाहपुरा, उज्जैन उत्तर, जावरा, इंदौर-4 और सेंधवा शामिल हैं।

यही कारण है कि भाजपा-कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल महिलाओं को लुभाने के लिए थोक में दर्जन भर से अधिक योजनाओं की घोषणा कर चुके हैं। सबसे अधिक रार "लाड़ली बहना" योजना को लेकर हो रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि कांग्रेस लाड़ली बहना योजना बंद करने का षड्यंत्र कर रही है जिसमें अभी 1,250 रुपये प्रतिमाह बहनों के खाते में आ रहे हैं जो भविष्य में बढ़कर पहले 1,500 और बाद में 3,000 रुपये करने का दावा है, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का वादा है कि जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनेगी तो नारी सम्मान योजना के तहत 1,500 रुपये प्रतिमाह और 500 रुपये में गैस सिलेंडर के साथ ही 100 यूनिट तक बिजली बिल माफ और 200 यूनिट तक बिजली बिल हाफ किया जाएगा।

जाहिर है, यह सारी क़वायद 48.57 प्रतिशत महिला वोटरों को लुभाने के लिए है क्योंकि मतदाताओं के इतने बड़े वर्ग की अनदेखी कोई भी नहीं करना चाहता। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में महिलाएं किस कदर निर्णायक भूमिका में हैं और कई सीटों पर हार-जीत का फैसला ही महिलाओं के हाथ में होगा।

शिवराज को है लाडली बहना से आस

विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से पूर्व भाजपा-कांग्रेस ने कई सर्वे करवाये थे। इनमें से भाजपा के आंतरिक सर्वे में यह तथ्य सामने आए थे कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ग्रामीण महिलाओं में ख़ासी लोकप्रियता है और इसी के चलते भाजपा ने विधानसभा चुनाव में सारा फोकस महिला वोट प्रतिशत बढ़ाने पर कर दिया।

भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि जहां हार-जीत का अंतर पांच से दस हजार वोटों के बीच होता है वहां महिलाओं का इतना वोट प्रतिशत बढ़ने से सीटें पार्टी जीत लेगी। अब यह वोट प्रतिशत कैसे बढ़ेगा तो इसके लिए बीते एक वर्ष से लेकर अब तक शिवराज सरकार की महिलाओं को लेकर योजनाओं अथवा घोषणाओं का विश्लेषण करने से स्थिति साफ हो जाएगी।

शिवराज सरकार की महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाओं के अंतर्गत कन्यादान योजना, लाडली लक्ष्मी, जननी योजना, महिला मजदूरों को प्रसव पर आर्थिक सहायता, छात्राओं को मुफ्त साइकिल और स्कूल ड्रेस, छात्रवृत्ति, बुजुर्ग महिलाओं को तीर्थ दर्शन कराने की योजना, महिलाओं को गैस चूल्हा बांटने वाली उज्जवला योजना, मुख्यमंत्री लाडली बहना, आवास योजना आदि ने महिलाओं में भाजपा की लोकप्रियता को बढ़ाया है। हालांकि यह लोकप्रियता वोटों में कितना तब्दील होगी यह 3 दिसंबर को साफ हो जाएगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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