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Long Life: लंबे जीवन के लिए बड़ा पूंजी निवेश

Long Life: स्वस्थ और सुंदर दिखने की बात अब पुरानी हो गयी है। अब अगला लक्ष्य है मनुष्य की उम्र को बढ़ाना ताकि वह अपनी औसत उम्र से कम से कम दस साल अधिक जिन्दा रहे। इंसान की औसत उम्र जितनी बढ़ती जा रही है, उसकी और ज्‍यादा जीने की लालसा भी बढ़ती जा रही है। अपार व्‍यावसायिक संभावनाओं से भरपूर इस अभिलाषा को पूरा करने के लिए बाजार की ताकतें भी पूरी तरह तत्पर हैं। यह संभवत: पहली बार है, जब इतनी बड़ी तादाद में टेक्‍नोलॉजी की दुनिया के दिग्‍गज स्‍लो-एजिंग (धीमी गति से उम्र बढ़ना) और लोंजेविटी (लंबी जिंदगी) के क्षेत्र में काम कर रहे स्‍टार्ट्अप्‍स में निवेश कर रहे हैं।

इन कंपनियों में पहला नाम तो चैट जीपीटी डेवलप करने वाली ओपेन एआई के सीईओ सैम ऑल्‍टमैन का ही है। उन्‍होंने दस साल जिंदगी बढ़ाने का दावा करने वाली रेट्रो बायोसाइंसेज में 1500 करोड़ रुपए का निवेश किया है। उनके अलावा गूगल के फाउंडर सर्गेई बिन और उनके पार्टनर लैरी पेज, अमेजॉन के मालिक जेफ बेजोस, पेपाल के को-फाउंडर पीटर थिएल जैसे कई और भी निवेशक इस तरह की कंपनियों में निवेश करने वालों में शामिल हैं। विज्ञान और टेक कंपनियों का यह गठजोड़, स्‍वस्‍थ जीवन जी रहे लोगों को ज्‍यादा लंबी जिंदगी देने की कोशिशों पर दांव लगा रहा है।

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उम्र बढ़ाने के धंधे में लगी इन कंपनियों की महत्‍वाकांक्षाएं और इन्‍हें मिलने वाली फंडिंग की राशि हैरान कर देने वाली है। उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को उलटने के उद्देश्‍य से दो साल पहले स्‍थापित बायोटेक कंपनी अल्‍टोस लैब ने 3 अरब डॉलर से अधिक की फंडिंग जुटाई है। वहीं यूनिटी बायोटेक्नोलॉजी, विभाजित होना बंद कर चुकी वृद्ध कोशिकाओं को सक्रिय करने पर काम कर रही है। उसे एक अरब डॉलर की फंडिंग मिली है। गूगल की पैरेंट कंपनी अल्‍फाबेट तो इस क्षेत्र में 2013 से काम कर रही है। इसके लिए गठित कंपनी केलिको में भी अरबों डॉलर की फंडिंग का अनुमान है।

केलिको उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को समझने और उसमें हस्तक्षेप करने के लिए नई तकनीक विकसित कर रही है। रेट्रो बायोसाइंसेज इसके लिए जीन थेरेपी विकसित कर रही है। उसे 18 करोड़ डॉलर से अधिक की फंडिंग हुई है। जीवन काल को बढ़ाने के लिए दवाएं और उपचार विकसित कर रही जुवेनसेंस 20 करोड़ डॉलर से अधिक की फंडिंग जुटा चुकी है। इन कंपनियों के अलावा, ऐसे वेंचर कैपिटलिस्‍ट और एंजल इन्‍वेस्‍टर की बड़ी तादाद है, जो दीर्घायु पर केंद्रित स्‍टार्ट अप्‍स और पहले से ही स्थापित कंपनियों में पैसा लगा रहे हैं।

लंबे समय तक जीने का जुनून एक वैश्विक प्रवृत्ति है, और आने वाले वर्षों में दीर्घायु उत्पादों और सेवाओं के बाजार में तेजी से वृद्धि जारी रहने वाली है। ग्‍लोबल वेलनेस इंस्टिट्यूट की 2021 की एक स्‍टडी के मुताबिक वैश्विक दीर्घायु बाजार करीब 70 हजार करोड़ डॉलर का है। इसके वर्ष 2025 तक डेढ़ लाख करोड़ डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। जाहिर है, जब बाजार इतना बड़ा है तो कारोबारी इसका लाभ उठाने में क्‍यों पीछे रहेंगे?

अब सवाल उठता है कि आखिर एक इंसान को कितने लंबे समय तक जीना चाहिए और क्‍यों जीना चाहिए? ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से लोग दीर्घायु होने की इच्छा रखते हैं। कुछ लोग अधिक समय तक जीवित रहना चाहते हैं ताकि वे प्रियजनों के साथ अधिक समय बिता सकें, अपने शौक पूरे कर सकें, अपने काम जारी रख सकें या दुनिया में कुछ अलग कर सकें। अन्य लोग शायद मृत्यु से डरते हैं और जितना लंबे समय तक इसे टाला जा सके, इससे बचना चाहते हैं। इसमें हम काफी सफल भी रहे हैं। अगर हम महज सवा सौ साल पहले, वर्ष 1900 की स्थिति देखें तो मनुष्य का औसत जीवन सिर्फ 31 वर्ष था। लेकिन, बाद के दशकों में चिकित्सा प्रौद्योगिकी में प्रगति, स्वच्छता और पोषण के प्रति जागरुकता के चलते इसमें काफी वृद्धि हुई और अब यह बढ़कर लगभग ढाई गुनी, 73.16 वर्ष हो गई है। फिर भी इसे बढ़ाने के प्रयास जारी हैं।

इन सवा सौ सालों को अगर दो हिस्‍सों में बांटा जाए तो हम पाएंगे कि औसत जीवन प्रत्‍याशा बढ़ी जरूर है, लेकिन पहले हिस्‍से में इसके बढ़ने की सालाना दर अधिकतर ऊपर की ओर जाती नजर आती है, वहीं वर्ष 1964 के बाद से यह लगातार घट रही है। वर्ष 1964 में जीवन प्रत्‍याशा 52.03 वर्ष थी और वृद्धि दर 1.66%, तीस साल बाद वर्ष 1994 में क्रमश: 64.77 वर्ष और 0.330%, वहीं वर्ष 2023 में यह क्रमश: 73.16 वर्ष और 0.240% दर्ज की गई है। इसका अर्थ यह है कि एक समय आने के बाद जीवन प्रत्‍याशा का बढ़ना बंद हो जाएगा और हो सकता है कि फिर इसमें कमी भी आने लगे। और यही स्थिति दीर्घायु के 70 हजार करोड़ डॉलर के बाजार के लिए भारी मुनाफे का माहौल तैयार कर रही है।

बेशक एक लंबा स्‍वस्‍थ जीवन, या दीर्घायु की इच्छा, हमेशा अमरत्‍व की चाह नहीं होती, लेकिन मानवीय स्‍वभाव को देखते हुए यह असंभव नहीं लगता कि अधिक से अधिक जीने की चाह, किसी दिन कभी न मरने की चाहत में बदल जाए। बहुत सारे ऐसे प्रयोग हो चुके हैं, और बिना किसी शोर-शराबे के अभी भी चल रहे हो सकते हैं। ऐसा ही एक प्रयोग क्रायोनिक्स है। क्रायोनिक्स एक ऐसा प्रोसेस है, जिसमें मृत्यु के बाद शरीर को बहुत कम तापमान, आमतौर पर -130 डिग्री सेल्सियस, पर फ्रीज कर दिया जाता है, ताकि कोशिकाओं को क्षय होने से रोका जा सके। फिर शरीर को एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए कंटेनर क्रायोस्टेट में एक स्थिर तापमान पर सुरक्षित रख दिया जाता है।

लगभग चार दशक पहले आरंभ क्रायोनिक्स के तहत, अतिसम्‍पन्‍न वर्ग से संबंधित अनेक धनिकों ने इस उम्मीद में कि भविष्य की चिकित्सा प्रगति व्यक्ति का पुनर्जीवित होना और किसी भी बीमारी से ठीक होना संभव बना सकती है, फिर से जीवन पाने की आशा में अपने शवों को संरक्षित/ जमा करने के लिए लाखों का निवेश किया था। ऐसी कई कंपनियाँ हैं जो क्रायोनिक्स सेवाएँ प्रदान करती हैं। क्रायोनिक्स की लागत कंपनी और वांछित सेवा के स्तर के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। चूंकि, यह बहुत महंगी प्रक्रिया है, इसलिए बहुत अधिक धनी व्‍यक्ति ही इसमें निवेश कर सकते हैं। बहुत से लोग इसे पैसे और संसाधनों की बर्बादी मानते हैं।

दीर्घायु हासिल करने के लिए यह खर्चीला जुनून सामाजिक दृष्टि से काफी विवादास्‍पद रहा है। क्‍योंकि यह समझा जाता है कि सिर्फ पैसे वाले लोग ही इसका लाभ उठा सकते हैं। लेकिन, हर व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करने का अधिकार है, हमें उसका सम्मान करना चाहिए, लेकिन हमें बढ़ती आबादी की संभावित चुनौतियों के बारे में भी जागरूक होना चाहिए। एक स्वस्थ और सक्रिय वृद्ध जनसंख्‍या सुनिश्चित करने के लिए अनुसंधान और विकास में निवेश किया जा सकता है। पर हमें साथ-साथ यह भी ध्‍यान रखना है कि इस तरह की सुविधाओं तक सभी की पहुँच हो।

इस प्रवृत्ति को एकदम नकारात्‍मक रूप से नहीं देखने की बजाए, इसके अच्‍छे पहलुओं की ओर भी विचार किया जाना चाहिए। लोग ज्‍यादा उम्र तक स्‍वस्‍थ रहेंगे तो समाज को अपने अनुभवों और ज्ञान का ज्‍यादा योगदान दे सकेंगे। इसके अलावा दीर्घायु अनुसंधानों में प्रगति से नए उपचार और प्रौद्योगिकियां सामने आ सकती हैं जो मानव जीवन की गुणवत्ता और अवधि बढ़ा सकती हैं। वैसे भी भारत में जीवेत् शरद: शतम् और चिरंजीवी भव का आशीर्वाद तो दिया ही जाता है। इस आशीर्वाद को फलित करने की दिशा में विज्ञान जगत भी प्रयास कर रहा है तो इसमें बुराई क्या है?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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