क्या टीवी पर भी लगेगी विवादित बयानों के दोहराने पर रोक?

नई दिल्ली। योगी आदित्यनाथ, मायावती, आज़म खां और मेनका गांधी- 2019 के आम चुनाव में इन सभी नेताओं को चुनाव आयोग ने एक दिन में ही एक डंडे से हांक दिया है। हुआ कुछ ऐसा है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को हांका, तो चुनाव आयोग ने आगे इन नेताओं को। दो से तीन दिन के लिए ये नेता चुनाव प्रचार से दूर रहेंगे। आम चुनाव के वक्त यह बड़ी सज़ा है। पर, खता भी कोई छोटी नहीं थी। प्रश्न ये है कि जो खता चुनाव आयोग करता रहा है उसके लिए उसे क्या सज़ा मिले?

क्या टीवी पर भी लगेगी विवादित बयानों के दोहराने पर रोक?

जिन चार नेताओं को 15 अप्रैल को दंडित किया गया है उनमें से एक योगी आदित्यनाथ को बीते हफ्ते ही एक अन्य मामले में दोषी पाया गया था। भारतीय सेना को 'मोदी की सेना' बोलने का गुनाह उन्होंने किया था। इसकी याद दिलाने का मतलब यह कतई नहीं है कि तब उन्हें सज़ा नहीं दी गयी तो अब क्यों, बल्कि असली सवाल ये है कि क्या चुनाव आयोग योगी को दोषी ठहराते वक्त भी गम्भीर था?

कहां गम्भीर है चुनाव आयोग?

अगर चुनाव आयोग गम्भीर होता, तो वह योगी आदित्यनाथ के उस बयान के मीडिया में बारम्बार चलने को भी रोकने की कोशिश की होती। ऐसा न तब किया गया, न अब किया गया है जब चार नेताओं के चार अलग-अलग बयान लगातार मीडिया में चल रहे हैं। स्थिति ये है कि सज़ा भुगतने के बावजूद अपराधी की मंशा बुलन्द हो रही है। अली-बजरंगबली वाले बयान का मकसद ध्रुवीकरण था। योगी ने एक बार भाषण दिया, जिसे मीडिया रोज़ाना सैकड़ों बार दोहरा रहा है। चुनाव आयोग की सज़ा के एलान के बाद भी योगी का बयान देना थमा नहीं है। वे 3 दिन तक चुनाव प्रचार तो नहीं कर सकेंगे, लेकिन उनके आपत्तिजनक बयान लगातार दोहराए जाते रहेंगे।

टीवी पर मौजूद होकर बयान दोहरा रहे सैकड़ों ऐसे लोग कब और कैसे दंडित होंगे- यह बड़ा सवाल है। इसी तरह मुसलमानों से एकजुट होकर वोट मांगती मायावती का इसी अंदाज और मकसद से टीवी चैनल पर वोट मांगना कब रुकेगा? वोटरों को वोट नहीं देने पर दंड का भय दिखा रहीं मेनका गांधी आखिरकार कब चुप होंगी? आज़म खां ने जो आपत्तिजनक बयान दिया है उससे अधिक आपत्तिजनक है उस बयान को बारम्बार टीवी पर दिखाया जाना। क्या ये बातें भी चुनाव आयोग को समझानी पड़ेंगी? क्या इसके लिए भी सुप्रीम कोर्ट की फटकार का इंतज़ार कर रहा है चुनाव आयोग?

मास मीडिया माध्यमों की ताकत नहीं समझता आयोग?

चुनाव आयोग को मास मीडिया की ताकत और इसके दुरुपयोग का अंदाजा ही नहीं है। भोपाल में कमलनाथ के करीबियों पर छापे पड़े। इनकम टैक्स ने छापे मारे। मगर, इस छापेमारी के जो विजुअल्स सामने आए, उसे जारी करने से लेकर उसका इस्तेमाल कांग्रेस के विरुद्ध करने तक में जो चपलता दिखलायी गयी, उसे पकड़ पाने में भी चुनाव आयोग पूरी तरह से विफल रहा। अब उस घटना को कौन याद कर रहा है? पहले चरण के मतदान से पहले के वे रोचक विजुअल्स थे जिसने चुनाव पर असर डाला। क्या चुनाव आयोग नादान है?

चुनाव आयोग के पास राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं की शिकायतें हैं जिन पर कार्रवाई अपेक्षित है। मगर, चुनाव आयोग को यह देखना होगा कि वह एक मामले पर जब फैसला कर रहे हैं तो उस मामले के बहाने जो देशभर में प्रचार या कुप्रचार हो रहे हैं और उससे चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है, उसे कैसे रोका जाए। कभी चुनाव के समय हाथी की मूर्तियां तक को ढंक देने वाला चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी की तारीफ करती फ़िल्मों के प्रदर्शन पर रोक की मुकम्मल व्यवस्था कैसे करेगा? नमो टीवी का प्रसारण अब भी नियंत्रित नहीं हुआ है। उस पर लगातार नरेंद्र मोदी के प्रचार चल रहे हैं। इसकी निगरानी आयोग कैसे करने वाला है। इस पर सबकी नज़र है और इन नज़रों की अपेक्षा पर चुनाव आयोग को खरा उतरना होगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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