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न राहुल असफल हुए, न प्रियंका होंगी फेल, बीजेपी का बिगड़ेगा खेल

By प्रेम कुमार
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नई दिल्ली। 2013 में राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखा था और 2019 में प्रियंका गांधी ने। एक तुलना बनती है। तब राहुल के लिए भी बड़ी-बड़ी उम्मीदें पाली गयी थीं, अब प्रियंका के लिए भी ऐसा ही हो रहा है। राहुल और प्रियंका गांधी की तुलना कर एक कोशिश प्रियंका के प्रभाव को कम आंकने की हो रही है। इसके मकसद को भी समझा जा सकता है। कांग्रेस के लिए मुश्किल है कि वह इस कोशिश पर निरपेक्ष मूल्यांकन पेश नहीं कर सकती। दुविधा है, उलझन है। मगर, राहुल और प्रियंका दोनों के राजनीति में आगमन का निरपेक्ष मूल्यांकन सम्भव है।

कांग्रेस के बुरे दौर में महासचिव बने थे राहुल

कांग्रेस के बुरे दौर में महासचिव बने थे राहुल

जनवरी 2013 में राहुल कांग्रेस के महासचिव बने थे और जनवरी 2019 में प्रियंका कांग्रेस की महासचिव बनी हैं। तब राहुल गांधी के कांग्रेस महासचिव बनने पर बीजेपी नेता शाहनवाज हुसैन ने प्रतिक्रिया दी थी, "राहुल गांधी पहले भी कांग्रेस में नंबर दो थे, ये कोई नई बात नहीं है। उनके उपाध्यक्ष बनने से न तो देश को कोई लाभ होनेवाला है और ना ही कांग्रेस पार्टी को कोई लाभ होनेवाला है।" निश्चित रूप से 2014 के चुनाव परिणाम की शक्ल में कांग्रेस को राहुल गांधी के महासचिव बनने का फायदा नहीं हुआ। मगर, क्या कोई इस बात से इनकार कर सकती है कि 2014 में इतनी बड़ी पराजय के बाद कांग्रेस में बिखराव नहीं हुआ? कांग्रेस 10 साल बाद सत्ता से बाहर हुई थी और अन्ना आंदोलन के बाद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ऐसा हुआ था। इसलिए वक्त लगना था। राहुल गांधी के प्रयासों को विफलता का जामा पहना दिया गया, उन्हें राजनीतिक विरोधियों ने पप्पू करार दिया। 2019 आते-आते उन्हीं राहुल गांधी के बारे में धारणा बदल गयी।

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राहुल ने बदल दी अपने बारे में धारणा

राहुल ने बदल दी अपने बारे में धारणा

5 राज्यों में चुनाव नतीजों के बाद जब कांग्रेस को राहुल ने 3 राज्यों में सत्ता दिलायी, तो कई धारणाएं टूट गयीं। मसलन,
· राहुल जहां चुनाव प्रचार करते हैं, कांग्रेस की हार होती है।
· पंजाब में चुनाव प्रचार नहीं किया, कांग्रेस जीत गयी।
· नरेंद्र मोदी अपने दम पर चुनाव जिताने की क्षमता रखते हैं।
· मोदी के पास योगी जैसे एक से बढ़कर एक होनहार हैं।
· राहुल का नेतृत्व कौन स्वीकार करेगा?
· घटक दल राहुल के नाम से मुंह बिचकाते हैं।

राहुल गांधी को 5 साल लगे अपने बारे में धारणाएं बदलने में। मगर, उन्होंने धारणा को बदल दिया। अब राहुल गांधी कांग्रेस के निर्विरोध अध्यक्ष हैं। विपक्ष की कोई ऐसी पार्टी नहीं जो राहुल के साथ बैठना पसंद नहीं करती। बल्कि, अब प्रियंका के रोड शो से पहले आन्ध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के सवाल पर धरना दे रहे एन चंद्रबाबू नायडू के समर्थन में पहुंचे राहुल का उदाहरण सामने है। गर्मजोशी से सबने उनका स्वागत किया।

राहुल के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं प्रियंका

राहुल के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं प्रियंका

प्रियंका गांधी कहीं अधिक लाभ की स्थिति में हैं। राहुल ने जब कांग्रेस महासचिव का पद सम्भाला, तब देश में कांग्रेस के लिए दो-दो लगातार सरकारों की एंटी इनकम्बेन्सी थी। जब प्रियंका ने यह जिम्मेदारी सम्भाली है तब बीजेपी के लिए देश में जबरदस्त एंटी इनकम्बेन्सी है। प्रियंका कांग्रेस की रणनीतिकार रही हैं। उनमें ग्लैमर है। उनमें राहुल से बेहतर वाकपटुता और भाषण क्षमता है। जनता से इंटरेक्ट करने की बात हो या फिर राजनीतिक अभियानों में इनोवेशन की बात, प्रियंका अनुभव के साथ उतरी हैं।

प्रियंका जब से कांग्रेस की महासचिव बनी हैं कोई दिन ऐसा नहीं है जब वह सुर्खियों में नहीं रही हैं। प्रियंका का इकलौता रोड शो देश की राजनीति का बड़ा इवेंट बनकर पेश हुआ। प्रियंका ने ट्विटर अकाउन्ट खोला भर था कि देखते-देखते 75 हज़ार लोग फॉलो करने लग गये। जब वह ट्वीट किया करेंगी, तब अलग से ख़बर बना करेंगी। प्रियंका के लिए प्रियंका सेना बन गयी। जब प्रियंका ने रोड शो से पहले ऑडियो संदेश दिया, तो वह खुद में एक ख़बर थी।

कहने का मतलब ये है कि प्रियंका अपने हर कदम को कांग्रेस के हक में प्रचारित करने का गुण रखती हैं। प्रियंका की उसी तरह खिंचाई जरूर शुरू हो गयी है जिस तरह राहुल गांधी की हुई थी। मगर, एंटी इनकंबेंसी झेल रही कांग्रेस राहुल का या खुद राहुल भी खुद का बचाव नहीं कर पायी। मगर, आज प्रियंका की खिंचाई होने पर खुद बीजेपी के नेता बैकफुट पर हैं। वे सुर में सुर नहीं मिला पा रहे हैं। वजह ये है कि एंटी इनकम्बेन्सी अभी बीजेपी के ख़िलाफ़ है और अगर प्रियंका की ज्यादा खिंचाई की गयी, तो यह बीजेपी को उल्टा पड़ जा सकता है।

परिवारवाद के नाम पर प्रियंका पर हमला

परिवारवाद के नाम पर प्रियंका पर हमला

प्रियंका गांधी के पार्टी में महासचिव बनने पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता और मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद की टिप्पणी गौर करने लायक है, 'प्रियंका जी महासचिव बनी हैं, मेरी ओर से उन्हें शुभकामनाएं। चूंकि यह परिवार का मसला है, तो इस तरह के पद अस्वाभाविक नहीं हैं। मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि उन्हें केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश में सीमित भूमिका क्यों दी गई? वास्तव में उनका व्यक्तित्व बड़ी भूमिका का हकदार था।'' बीजेपी की कोशिश प्रियंका को परिवारवाद से जोड़ने की है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रियंका के मुद्दे पर अपनी पार्टी में सबसे ज्यादा लोकतंत्र होने की बात कही थी, ''लोकतंत्र भाजपा के रगों में दौड़ता है. यही वजह है कि देश के लोग अपने को इस पार्टी के करीब महसूस करते हैं।"

दरअसल गांधी-नेहरू परिवार का त्याग इतना बड़ा है कि परिवारवाद का लम्बे समय से चलता रहा आरोप कभी परवान नहीं चढ़ सका। इस पर बहस होती रहेगी। मगर, परिवारवाद के हमले से प्रियंका को रोक सकेगी बीजेपी, ऐसा सोचना भूल होगी। ऐसा भी नहीं है कि प्रियंका गांधी की राजनीति में एंट्री को बीजेपी हल्के में ले रही है। आज की तारीख में बीजेपी के नेता राहुल गांधी से ज्यादा प्रियंका गांधी पर हमलावर हैं। यह प्रियंका की अहमियत को बताता है।

निर्गुण पॉलिटिक्स नहीं करेंगी प्रियंका

निर्गुण पॉलिटिक्स नहीं करेंगी प्रियंका

राहुल को 5 साल लगे अपने बारे में सोच को बदलने में, लेकिन प्रियंका को 100 दिन भी नहीं लगने हैं। कारण ये है कि प्रियंका के आने से वास्तव में कांग्रेस में नयी जान आती दिख रही है। इसके अलावा प्रियंका निर्गुण पॉलिटिक्स नहीं करतीं। यूपी में कांग्रेस को वह अकेले चुनाव मैदान में रखेंगी, ऐसा भी मान कर न चलिए। एसपी-बीएसपी के साथ औपचारिक या अनौपचारिक सहमति बनाकर ही वह पूर्वांचल के चुनावी मैदान को साधेंगी। अगर वह ऐसा करने में कामयाब रहती हैं तो बड़े नतीजे लेकर प्रियंका सामने दिखेंगी। ये है प्रियंका गांधी का मतलब।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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English summary
Lok sabha Elections 2019: Rahul Gandhi Priyanka Gandhi BJP Amit Shah Narendra Modi
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