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कितना प्रासंगिक है जनाधार खिसकने और बरकरार रहने का गणित

By आर एस शुक्ल
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नई दिल्ली। वैसे तो अक्सर ही किसी भी पार्टी की ताकत के बारे में बात करने समय यह ध्यान में रखा जाता है कि उसका जनाधार क्या है, खिसक चुका है अथवा बरकरार है। इसी के आधार पर चुनाव में उसकी स्थिति के बारे में आकलन किया जाता है। यह समझने-समझाने की कोशिश की जाती है कि किसी दल की जीत-हार में इसकी कितनी भूमिका है। चूंकि वर्तमान दौर गठबंधन राजनीति का है, इसलिए दलों के बीच तालमेल में भी जनाधार को आधार के रूप में लिया जाता है। इस प्रक्रिया में कई बार यह देखने में आता है कि कम जनाधार वाले को ज्यादा महत्व मिल जाता है, तो कई बार बड़े जनाधार वाले को भी कम महत्व मिल पाता है।

जनाधार को लेकर कई धारणाएं

जनाधार को लेकर कई धारणाएं

इस दौरान यह भी देखने में आता है कि जो जहां मजबूत स्थिति में होता है, वही यह तय करने लगता है कि उसका जनाधार कितना है और उसे कितना महत्व दिया जा सकता है। इसमें किसी दल की सांगठनिक स्थिति को भी आधार बनाया जाता है। कई बार यह घोषित कर दिया जाता है कि उक्त पार्टी का अपना कोई संगठन नहीं है और उसकी कोई राजनीतिक ताकत भी नहीं है। ठीक उसी समय ऐसा करने वाला दल अपनी सांगठनिक स्थिति और अपने जनाधार की अनदेखी कर रहा होता है और बनाई गई धारणा के आधार पर ही विश्वास कर लेता है। बाद में पता चलता है कि बनाई गई धारणा पूरी तरह सही नहीं थी।

ऐसे समय जब लोकसभा चुनाव हो रहे हैं और सभी दल एक दूसरे के साथ गठबंधन में जाने को उत्सुक हैं, जनाधार और सांगठनिक ताकत पर बहुत बातें हो रही हैं। इन बातों में क्षेत्रीय दलों की ओर से यह सवाल ज्यादा मजबूती के साथ उठाया जा रहा है और दोनों ही बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस को इससे जूझना पड़ रहा है। अब जैसे बिहार में भाजपा को जदयू के सामने झुकना पड़ा। लेकिन अगर जनाधार के लिहाज से देखा जाए तो राज्य में भाजपा को कहीं से भी कमतर नहीं माना जा सकता है। यह अलग बात है कि जदयू की स्थिति थोड़ी बेहतर कही जा सकती है लेकिन इतनी भी नहीं जितनी वह बताने की कोशिश में लगा है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब समेत कई अन्य राज्यों में में भी भाजपा को अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के समक्ष झुकने को मजबूर होना पड़ा है, तो इसके पीछे जनाधार का तर्क ही सामने रखा गया है। ये हालात तब हैं जब यह एक तरह से स्थापित तथ्य है कि भाजपा न केवल बड़ी सत्ताधारी पार्टी है बल्कि माना जाता है कि उसका जनाधार भी लगातार बढ़ रहा है।

कांग्रेस के सामने परेशानी

कांग्रेस के सामने परेशानी

कांग्रेस को लेकर तो यह संकट कुछ ज्यादा ही है। उसके सहयोगी माने जाने वाले दल भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं लगते कि उसका कोई जनाधार बचा है। पिछले 2014 के चुनाव के बाद तो इस सोच को और ज्यादा मजबूती मिल गई जब संसद में उसकी संख्या दहाई तक पहुंच गई जो अब तक के इतिहास में सबसे कम रही है। इस चुनाव में भाजपा की ओर से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया गया था। जाहिर है कांग्रेस को इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा था। यह तो फिलहाल की स्थिति है। यह भी सच है कि बीते करीब चार दशकों में कांग्रेस कमजोर होती चली गई और उसके मजबूत वोट आधार दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े यहां तक ब्राह्मण भी उससे छिटकते चले गए। ऐसे में एक तरह से यह स्थापित हो गया कि कांग्रेस का जनाधार समाप्ति के कगार पर है। इसके साथ ही यह भी देखने में आया कि कांग्रेस का सांगठनिक ठांचा भी एक तरह टूट-टूटकर बिखरता चला गया। उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई हिंदी भाषी राज्यों में उसके पास कोई क्षेत्रीय बड़ा नेता तक नहीं मिलने लगा। आपसी गुटबाजी और समर्पित कार्यकर्ताओं में निराशा की भावना भी बढ़ती रही। शायद इसी सब का परिणाम यह रहा कि अब जब कांग्रेस के साथ किसी तालमेल की बात आती है, तब उसके जनाधार को लेकर सवाल उठाए जाते हैं और इस बात के लिए मजबूर किया जाता है कि जितना उसे दे दिया जाए, उसी पर वह तैयार हो जाए।

इस जनाधार के गणित को कुछ उदाहरणों के जरिये समझा जा सकता है कि क्या वह हमेशा एक सा रहता है अथवा उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और किसी समय विशेष में एक कमजोर ताकत बहुत मजबूती के साथ उभरकर सामने आ जाती है। अब जैसे कभी कम्युनिस्टों का कुछ राज्यों में बोलबाला हुआ करता था, लेकिन वे आज बहुत कमजोर स्थिति में हैं। कभी जनता पार्टी और जनता दल बहुत मजबूत माने जाते थे, लेकिन अब वह कहां हैं। बिहार में कभी राजद बहुत स्थिति में हुआ करता था। एक समय वह काफी कमजोर हो गया और फिलहाल एक बार फिर बिहार की बहुत ताकत बनकर सामने आ गया है। महाराष्ट्र में शिवसेना कभी बहुत मजबूत हुआ करती थी। फिलहाल उसकी पुरानी स्थिति कहां है। असम में कभी असम गण परिषद ने सभी को अपना लोहा मनवा दिया था। आज उसे पिछलग्गू बनने को मजबूर होना पड़ा है।

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 मजबूत होकर उभरती है कांग्रेस

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इसी तरह कांग्रेस का इतिहास भी रहा है कि कई बार कमजोर होते-होते अचानक नए सिरे से मजबूत होकर उभर आती है। सन 2004 के चुनावों को इस रूप में देखा जा सकता है कि कोई आसानी से यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि उसकी सत्ता में वापसी हो सकती है। अभी हाल में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में भी किसी को यह आसान नहीं लग रहा था कि वहां कांग्रेस की वापसी हो सकती है। उत्तर प्रदेश में भी बहुत बुरी हालत में भी कभी उसे 21 सीटें मिल गई थीं। एक उदाहरण बसपा का लिया जा सकता है जिसे उत्तर प्रदेश में बहुत मजबूत जनाधार वाली पार्टी माना जाता रहा है। लेकिन उसे बीते लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी और विधानसभा चुनाव में भी उसकी हालत काफी पतली रही है।

इससे ऐसा लगता है कि किसी भी दल के बारे में जनाधार और सांगठनिक हालत के आधार पर तालमेल अथवा चुनावी परिणामों के बारे में कोई अंतिम राय बनाना सुसंगत नहीं कहा जा सकता। वक्त और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही इस तरह की चीजों को देखा जाना तर्कसंगत कहा जा सकता है। शायद अन्य दलों और नेताओं की तुलना में इस समय भाजपा और उसके नेतृत्व की ओर से ली जा रही पहलकदमियों को ज्यादा सुसंगत और तर्कसंगत माना जा सकता है क्योंकि उसके एजेंडे में चुनाव है और चुनाव में जीत हासिल कर सत्ता में आना है। संभवतः इसीलिए वह ऐसे किसी पचड़े में पड़े केवल इस पर ध्यान लगाए हुए है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा सीटें जीती जा सकती हैं। इसके लिए अगर कहीं झुकना भी पड़े, तो वह आसानी से इसके लिए तैयार है। विपक्ष का रवैया इसके ठीक विपरीत लगता है। वहां हर कोई अपने अहम में चूर लगता है और दूसरे को समझने की गुंजाइश किसी में नहीं लगती। इसीलिए लोगों में यह धारणा बन रही है कि विपक्ष की चिंता खुद को बचाने की ज्यादा चुनाव में जीत हासिल करने और सत्ता पाने
की कम है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

English summary
lok sabha elections 2019 congress bjp political parties vote bank myth or true
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