केरल और तमिलनाडु में कम मतदान का नुकसान विपक्ष को होगा?

Matdaan Pratishat: भाजपा विरोधी मीडिया और विपक्षी दलों में अटकल लगाई जा रही है कि वोटिंग घटने से भारतीय जनता पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा और वह सत्ता से बाहर भी हो सकती है| हालांकि ऐसा कोई तय फार्मूला नहीं है कि वोटिंग घटने से सत्ताधारी पार्टी को हमेशा नुकसान ही उठाना पड़ता है|

हर बार कुछ नए वोटरों के जुड़ने से हर जगह असर अलग अलग हो सकता है, और वोटिंग घटने के बावजूद सत्ताधारी दल पहले से भी ज्यादा बहुमत से जीत सकता है| दिल्ली का उदाहरण हमारे सामने है, जहां 2019 में 2014 के मुकाबले कम वोटिंग हुई थी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी सातों सीटें 2014 के मुकाबले ज्यादा मार्जिन से जीती थी|

Matdaan Pratishat

पहले चरण में 3.82, दूसरे चरण में 2.72 और तीसरे चरण में 1.21 प्रतिशत कम वोटिंग से ऐसा लग रहा था कि वोटिंग ढाई प्रतिशत तक गिर सकती है, लेकिन चौथे और पांचवें चरण में वोटिंग प्रतिशत में मामूली सुधार के बाद उम्मीद बनी थी कि आखिर में वोटिंग की गिरावट एक प्रतिशत पर आ जाएगी| लेकिन छठे चरण में भी 63.36 प्रतिशत वोटिंग के बावजूद 0.86 की गिरावट दर्ज की गई| जिससे संकेत मिलता है कि 2019 के मुकाबले आखिरकार डेढ़ से पौने दो प्रतिशत गिरावट होगी|

अब तक 486 सीटों पर हुई हुई वोटिंग में 2019 के मुकाबले सिर्फ पौने दो प्रतिशत की गिरावट रिकार्ड की गई है| 2019 में 67.7 प्रतिशत वोटिंग हुई थी, तो इस बार छठे चरण तक 65.9 प्रतिशत वोटिंग रिकार्ड की गई है| लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि 2019 के मुकाबले 2.38 करोड़ ज्यादा वोटरों ने वोटिंग में हिस्सा लिया है| छठे चरण की वोटिंग तक 2019 में 55,27,34,806 वोटरों ने मतदान किया था, जबकि इस बार 57,65,36,217 वोटरों ने मतदान किया|

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उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनाव में जीत हार में सबसे ज्यादा मायने रखता है| विपक्ष की तरफ से दावा किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा कम से कम तीस सीटों पर कड़े मुकाबले में फंस गई है, इसलिए जो भाजपा यह सोच रही थी कि उत्तर प्रदेश में वह कम से कम 71 सीटें हासिल करेगी और उसके तीनों सहयोगी भी अपनी सभी पांच सीटों पर जीत हासिल करेंगे, उसे 2019 का आंकडा बचाना भारी पड़ रहा है| 2019 में भाजपा ने 62 सीटें हासिल की थी, जबकि उसके सहयोगी अपना दल ने दो सीटों पर जीत हासिल की थी| जिन 67 सीटों पर चुनाव हो चुका है, उन सीटों पर 2019 में 59 प्रतिशत वोटिंग हुई थी, जबकि इस बार 57.13 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई है| इसके बावजूद 2019 के मुकाबले दस लाख वोट ज्यादा पड़े हैं|

उत्तर प्रदेश के अलावा बाकी राज्यों में भी इसी तरह का रूख देखा गया है, वोटिंग भले ही एक दो प्रतिशत कम हुई हो, लेकिन वोट ज्यादा पड़े हैं| लेकिन तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है, जहां वोट प्रतिशत भी गिरा है और वोटिंग भी घटी है, और यह गिरावट अच्छी खासी है| 2019 में 72.40 प्रतिशत वोटिंग हुई थी और 4.34 करोड़ वोटरों ने मताधिकार का इस्तेमाल किया था, जबकि इस बार 70.89 प्रतिशत वोटिंग और 4.07 करोड़ वोटरों ने मताधिकार का इस्तेमाल किया| यानि तमिलनाडु में पिछली बार के मुकाबले 27 लाख कम वोटरों ने मताधिकार का इस्तेमाल किया|

इसी तरह 2019 में केरल में 77.84 प्रतिशत वोटिंग रिकार्ड की गई थी, इस बार 71.27 प्रतिशत ही वोटिंग हुई| राहुल गांधी की सीट वायनाड पर तो 11 प्रतिशत वोटिंग कम हुई| इसलिए जिन लोगों का आकलन है कि वोटिंग घटने से सत्ताधारी पार्टी को नुकसान होता है, तो फिर तमिलनाडु और केरल में वोटिंग घटने से किसे नुकसान होगा| इन दोनों राज्यों में भाजपा की एक भी सीट नहीं थी और दोनों ही राज्यों में वोटिंग काफी कम हुई है|

इन दोनों राज्यों की 58 लोकसभा सीटों में से 55 सीटें पिछली बार द्रमुक, वामपंथियों और कांग्रेस के पास थीं| ये तीनों ही पार्टियां इस समय इंडी एलायंस का हिस्सा है| अगर वोटिंग कम होने से सत्ता पक्ष को ही नुकसान होता है, तो इसका मतलब है कि भाजपा और उसके सहयोगी दल इन दोनों ही राज्यों में ज्यादा नहीं तो 10-15 प्रतिशत सीटें हासिल कर सकते हैं, जो छह से लेकर नौ तक सीटें हो सकती हैं|

दक्षिण के पांच राज्यों की 131 सीटों में भाजपा पिछली बार सिर्फ 29 सीटें जीती थी, कर्नाटक में 25 और तेलंगाना में चार| जबकि कांग्रेस 27 सीटें जीती थी, केरल में 15, तमिलनाडू में 8, तेलंगाना में तीन और कर्नाटक में एक| भाजपा का दावा है कि इन पाँचों राज्यों में उसकी सीटों की संख्या 35 से ज्यादा होंगी|

वोटिंग प्रतिशत कम होने से यह नेरेटिव बना है, या बनाया गया है कि भाजपा बहुमत से वंचित हो सकती है| लेकिन यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि मोदी का करिश्मा कम नहीं हुआ है और पिछली बार भाजपा ने 224 सीटें 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटों से हासिल की थीं| इसलिए उन 224 सीटों पर विपक्ष का साझा उम्मीदवार होने पर भी भाजपा को हराना मुश्किल काम है| जबकि कांग्रेस ने जो 52 सीटें जीती थीं, उनमें 18 सीटें ही ऐसी थी, जो वह 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटों से जीती थी|

अब हम अगर 2014 से मुकाबला करें तो भाजपा 136 सीटें 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटों से जीती थी, जबकि कांग्रेस 7 सीटें 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटों से जीती थी| पिछली बार भाजपा को 37 प्रतिशत और एनडीए को 45 प्रतिशत वोट मिले थे, इस बार अगर एनडीए के पांच प्रतिशत वोट इंडी एलायंस को चले भी जाएं, तब भी एनडीए 300 सीटें जीत कर आसानी से सरकार बना लेगा| लेकिन एनडीए के वोट सात प्रतिशत घट जाते हैं, तो वह 270 पर अटक सकता है, लेकिन सरकार फिर भी एनडीए की ही बनेगी| जब तक एनडीए के दस प्रतिशत वोट इंडी एलायंस को ट्रांसफर नहीं होते, तब तक एनडीए के सत्ता से बाहर होने की कोई आशंका खड़ी नहीं होती|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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