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Election Commission: चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल क्यों?

Election Commission: अब से पहले तक आम चुनावों की घोषणा होने के बाद राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के अभियान में जुट जाते थे। लेकिन वक्त के साथ अब स्थितियां बदल गई हैं।

2019 से विपक्षी दलों के सियासी एजेंडे में एक और काम जुड़ गया है। वह काम है, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए उसे मोदी सरकार की कठपुतली साबित करना।

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वर्तमान आम चुनावों के लिए सात चरणों के कार्यक्रम की जैसे ही घोषणा हुई, पिछली बार की तरह एक बार फिर चुनाव आयोग सवालों के घेरे में आ गया। कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष लंबे समय तक चलने वाले चुनाव कार्यक्रम के लिए मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को कठघरे में खड़ा कर रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल और तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग को सीधे-सीधे प्रधानमंत्री मोदी का आयोग घोषित कर दिया है।

इनका लगता है कि चुनाव आयोग ने इलेक्शन का इतना लंबा शेड्यूल इसलिए बनाया ताकि मोदी और बीजेपी को फायदा मिल सके। लेकिन सवाल यह है कि क्या पहली बार इतनी लंबी अवधि तक चुनाव प्रक्रिया चलने वाली है? इस तथ्य को समझने के लिए अतीत के चुनावों पर निगाह डाल लेते हैं।

साल 2014 का आम चुनाव पूरे नौ चरणों में संपन्न हुआ था। तब पहला मतदान 13 अप्रैल को हुआ था और उस लोकसभा के लिए आखिरी मतदान 12 मई को हुए थे। इसके बाद 16 मई को नतीजे आए थे। तब देश में करीब 81 करोड़ 45 लाख वोटर थे। जब ये आम चुनाव हुए थे, तब मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए की सरकार थी।

जिस तरह विपक्ष मौजूदा चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है, उस हिसाब से कह सकते हैं कि तब के चुनाव आयोग ने तत्कालीन सरकार और प्रधानमंत्री के इशारे पर चुनाव प्रक्रिया लंबे समय तक चलाई थी। मौजूदा विपक्षी तर्कों के हिसाब से कह सकते हैं कि तब मनमोहन सरकार चलाने वाली ताकतों के इशारे पर लंबी चुनाव प्रक्रिया इसलिए चली ताकि मनमोहन सरकार के खिलाफ गुस्सा धीरे-धीरे कम होता जाए और उसका फायदा तत्कालीन यूपीए को मिले?

साल 2014 की चुनाव प्रक्रिया लोगों को उम्मीदभरी लगी। उसके पहले के तीन दशकों से चूंकि देश अल्पमत की सरकारों को देख रहा था, इसलिए 2014 में भी कुछ ऐसे ही चुनाव नतीजों की उम्मीद लगाए बैठे लोगों की संख्या भी कम नहीं थी। लेकिन 2014 के नतीजों ने तीन दशकों से जारी चुनावी नतीजों की परंपरा को बदल कर रख दिया। इसके बाद कुछ दल जहां चकित नजर आए, वहीं कुछ को इन नतीजों से मिले झटके से उबरने में वक्त लगा।

जैसे ही वे इस झटके से उबरे, उन्होंने ईवीएम पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। इसमें 2009 के आम चुनावों के दौरान बीजेपी के एक वर्ग द्वारा ईवीएम पर उठाए गए सवालों को आधार भी बनाया गया। जब 2019 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को पहले की तुलना में ज्यादा समर्थन मिला तो ईवीएम पर सवालों की बौछार भी तेज हुई और चुनाव आयोग पर सवालों के घेरे भी बढ़ते गए।

जब चर्चा 2019 के आम चुनावों की चली है तो हमें उस बार की चुनावी प्रक्रिया को भी याद कर लेना चाहिए। तब पहला मतदान 11 अप्रैल को हुआ था, जबकि आखिरी बार 19 मई को वोट डाले गए। तब कुल सात चरणों में मतदान हुआ था। जिसके नतीजे 23 मई को घोषित किए गए। उस बार करीब नब्बे करोड़ मतदाता थे।

इस बार चुनाव आयोग ने 16 मार्च को चुनाव प्रक्रिया और तारीखों की घोषणा की। इस दौरान मीडिया ने लंबे वक्त तक चलने वाली मतदान प्रक्रिया को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार से सवाल भी पूछे। तब राजीव कुमार ने जो कहा था, उसकी ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की भौगोलिक स्थिति अलग है। देश का भूभाग बड़ा है। एक ही समय में कहीं बर्फ गिर रही होती है तो कहीं तेज गर्मी पड़ रही होती है। इसी दौरान स्थानीय और महत्वपूर्ण त्यौहार भी होते हैं। इसलिए चुनावी तारीखों का ऐलान करते वक्त भौगोलिक स्थिति और स्थानीय सांस्कृतिक आयोजन और त्योहार आदि का ध्यान रखना पड़ता है।

राजीव कुमार ने इस सवाल के जवाब में यह भी कहा कि चुनाव आयोग का मकसद पूरे देश में स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव कराना है। इसके लिए उसे सुरक्षा बलों की जरूरत होती है। सुरक्षा बलों और पुलिस पर स्थानीय प्रशासन के साथ ही चुनाव की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। बलों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने और तैनात करने में वक्त लगता है। इसलिए चुनाव की प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है।

वैसे ध्यान रखने की बात यह है कि इस बार पिछले आम चुनाव की तुलना में करीब सात करोड़ ज्यादा यानी करीब 97 करोड़ मतदाता हैं। इतनी तो यूरोप की कुल जनसंख्या नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, समूचे यूरोप की जनसंख्या करीब 75 करोड़ ही है। चुनाव आयोग का दावा है कि वह हर वोटर के पास पहुंचना चाहता है और हर राजनीतिक दल या चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी को समान मौका और सहूलियतें मुहैया कराना चाहता है।

लंबे वक्त तक चुनाव प्रक्रिया का कार्यक्रम बनाने के लिए चुनाव आयोग कानून व्यवस्था का भी तर्क देता है। मणिपुर की एक लोकसभा का मतदान दो चरणों में होना है। आयोग का कहना है कि स्थानीय स्तर पर कानून व्यवस्था को बनाए रखने और इलाका छोड़कर मजबूरी में अपने मतदान केंद्र से दूर रह रहे लोगों की सहूलियत के लिए उसे ऐसा करना पड़ा है।

विपक्षी दलों, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में सात चरणों में होने वाले चुनावों को लेकर ज्यादा आपत्ति है। उनका तर्क है कि चुनाव आयोग ने ऐसा प्रधानमंत्री मोदी के इशारे पर किया है, ताकि वे हर चरण में प्रचार कर सकें और इसका फायदा बीजेपी को मिल सके। अगर विपक्ष के ही तर्क पर भरोसा करें तो दो बातें साफ होती हैं कि वे प्रधानमंत्री मोदी की छवि और प्रचार की ताकत से आशंकित हैं।

इसका मतलब यह है कि पश्चिम बंगाल में विपक्षी दलों को ममता बनर्जी की छवि और ताकत पर भरोसा नहीं है। वैसे पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था की स्थिति कैसी है, यह आए दिन देखने को मिलता रहा है। वहां का स्थानीय प्रशासन जिस तरह काम करता रहा है, वह भी दिखता रहा है। पश्चिम बंगाल के लिए चुनाव कार्यक्रम तय करते वक्त चुनाव आयोग ने इसका भी तो ध्यान रखा होगा।

पश्चिम बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश में भी सभी सात चरणों में चुनाव होने हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि प्रधानमंत्री हर चरण में जाकर अपने दल का प्रचार कर सकें। उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा सरकार के बड़े दावे हैं। ऐसे में एक सवाल तो जरूर उठता है कि चुनाव आयोग को क्या यूपी की मौजूदा कानून व्यवस्था पर भरोसा नहीं है जो सात चरणों में चुनाव कराने की जरूरत महसूस हुई? या 80 सीटों पर करोड़ों मतदाताओं के लिए एक साथ व्यवस्था करना आसान नहीं है।

चार चरणों में चुनाव महाराष्ट्र, उड़ीसा और झारखंड में भी होने हैं, जबकि छत्तीसगढ़ और असम में तीन चरणों में होने हैं। इसे लेकर महाराष्ट्र से सवाल उठे हैं, लेकिन ना तो उड़ीसा से और न ही झारखंड से कोई सवाल सवाल उठा है। बेशक नक्सलवाद पहले की तुलना में अब काबू में है, लेकिन झारखंड और उड़ीसा में चार चरणों में होने वाले चुनाव की एक वजह नक्सलवाद का खतरा भी है। इस खतरे को स्थानीय प्रशासन समझता है, शायद यही वजह है कि इन राज्यों की गैर बीजेपी सरकारों ने अब तक सवाल नहीं उठाया है।

विपक्षी दलों की ओर से चुनाव आयोग पर उठाए जा रहे सवालों को लेकर एक अवधारणा यह भी बन रही है कि उन्होंने किंचित चुनावी नतीजों को अभी से ही स्वीकार करना शुरू कर दिया है। बहरहाल जनता-जनार्दन का जो फैसला होगा, वह तो चार जून को नतीजों के बाद पता चलेगा। अभी चुनाव प्रक्रिया शुरू ही हुई है। जैसे-जैसे प्रचार अभियान बढ़ेगा, ऐसे ढेर सारे आरोपों के लिए लोगों को तैयार रहना होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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