ओडिशा की पुरी सीट से लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संदेश
Puri Congress Candidate: ओडिशा की पुरी लोकसभा सीट से कांग्रेस की उम्मीदवार सुचारिता मोहंती ने यह कहते हुए टिकट लौटा दी है कि उनके पास चुनाव लड़ने के लिए धन नहीं है, जबकि भारतीय जनता पार्टी और बीजू जनता दल के उम्मीदवार पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं, इसलिए वह उनका मुकाबला नहीं कर सकती|
सुचारिता मोहंती का यह संदेश कांग्रेस के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए है कि चुनाव प्रणाली पर धनाढ्य लोगों का कब्जा हो गया है और लोकतंत्र पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं| सुचारिता ने भारतीय लोकतंत्र की सच्चाई को नंगा करके रख दिया है कि राजनीति अब सेवा नहीं, अमीरों का व्यवसाय बन चुकी है|

चुनावों में धन का बढ़ता प्रभाव लोकतांत्रिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर रहा है| अब बड़े राजनीतिक दल बहुत मजबूरी में ही अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को टिकट देते हैं| पिछले एक दशक में कार्यरत और रिटायर्ड नौकरशाहों का बड़े पैमाने पर राजनीति में प्रवेश हो रहा है| वे किसी भी राजनीतिक दल में प्रवेश पाते ही टिकट पा लेते हैं, और जीवन भर किए गए भ्रष्टाचार से एकत्र कमाई का इस्तेमाल करके चुनाव जीत भी जाते हैं|
ज्यादातर पार्टियां एक आदमी या परिवार के नाम पर चल रही हैं| भारतीय जनता पार्टी भी सिर्फ मोदी के नाम पर चलने वाली पार्टी बनती जा रही है| कांग्रेस के सोनिया-राहुल हैं, सपा के अखिलेश यादव हैं, बसपा की मायावती हैं, आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल हैं, जदयू के नीतीश कुमार हैं, राकांपा के शरद पवार हैं, राजद के लालू हैं, शिवसेना (यूबीटी) के उद्धव ठाकरे हैं, डीएमके के स्टालिन हैं आदि आदि| इन पार्टियों के भीतर कोई लोकतंत्र नहीं है|

ये सारी पार्टियां प्रोपराइटरशिप फर्म या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चल रही हैं| लाखों-करोड़ों लेकर टिकट बेचती हैं और दावा करती हैं कि पार्टी में इंटरनल डेमोक्रेसी है| क्या कारण है कि राजनीतिक दल अपने समर्पित कार्यकर्ता का टिकट काट कर या हक मार कर भ्रष्ट नौकरशाह को टिकट थमा देते हैं| सच यह है कि अपने काले धन के बूते भ्रष्ट लोग राजनीतिक दल को अपनी काली कमाई का एक हिस्सा देकर टिकट हासिल करते हैं, तो वे एक तरह से राजनीति में निवेश कर रहे होते हैं कि जीत कर अपने निवेश का कई गुना वसूल करेंगे| ऐसे नौकरशाहों को पहली बार लोकसभा में पहुंचते ही मंत्री बनते और फिर अगली बार टिकट कटते भी देखा जा रहा है|
सुचारिता ने कांग्रेस पार्टी को अपना टिकट लौटाकर देश को बताया है कि राजनीति और चुनावों में काले धन के बढ़ते इस्तेमाल से देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में आम लोगों की भूमिका लगभग खत्म हो गई है| करीब दस साल पहले दक्षिण एशियाई देशों के एक सम्मेलन में इस विषय पर गहन चर्चा हुई थी| इस सम्मेलन में कहा गया था कि अगर चुनावों में धन बल का इस्तेमाल न रोका गया तो निष्पक्ष चुनाव करवाना मुश्किल हो जाएगा| एडीआर ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था कि चुनाव सुधारों के मद्देनजर राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की ओर से किए जाने वाले खर्च में अपारदर्शिता का मुद्दा बहुत चिंतनीय विषय है|
लोकसभा या विधानसभा चुनावों में एक प्रत्याशी को कितना खर्च करना है, इसकी सीमा तो है, लेकिन पार्टियों के खर्च की कोई सीमा नहीं है| लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए एक उम्मीदवार अधिकतम 90 लाख और विधानसभा चुनाव के लिए अधिकतम 40 लाख खर्च कर सकता है, कुछ छोटे राज्यों के लिए यह सीमा 70 लाख और 28 लाख रूपए है| सच्चाई यह कि उमीदवार तो अपने काले धन से करोड़ों रूपए खर्च करते ही हैं, राजनीतिक दल भी अलग से करोड़ों रूपए खर्च कर देते हैं|
लोकसभा चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले मार्च के शुरू में कांग्रेस पार्टी ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके कहा था कि आयकर विभाग ने उसके खाते सील कर दिए हैं और उसके पास चुनाव लड़ने के लिए कोई पैसा नहीं बचा| सुचारिता मोहंती ने उसी की पुष्टि की है, जब उन्होंने टिकट लौटाते हुए अपनी चिठ्ठी में लिखा कि जब उन्होंने उड़ीसा के चुनाव प्रभारी अजय कुमार से इलेक्शन फंडिंग के लिए पूछा तो उन्होंने कहा कि चुनाव के लिए उन्हें खुद ही पैसा जुटाना होगा|
इससे यह भी जाहिर हुआ कि अगर मजबूरी में कोई राजनीतिक दल किसी कार्यकर्ता को टिकट दे भी देता है, तो उसके खुद के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वह चुनाव लड़ सके| उसे अपने राजनीतिक दल पर निर्भर रहना पड़ता है, सुचारिता ने यही सोचा था कि जैसे हमेशा से कांग्रेस पार्टी अपने उम्मीदवार को चुनाव में खर्च करने के लिए सूटकेस भेजती है, वैसे उसे भी सूटकेस मिलेगा|
इस घटनाक्रम ने यह भी साबित कर दिया कि राजनीतिक दल जब सत्ता में होते हैं, तो बड़े बड़े उद्योगपति और कॉरपोरेट घराने उन्हें अपने पक्ष में नीतिया बनाने और सरकारी काम के ठेके देने के बदले खूब चंदा देते हैं| जब सरकार नहीं होती, वे उन उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों को किसी लाभ पहुँचाने की स्थिति में नहीं होते, तो उन्हें चंदा या तो मिलता ही नहीं या कम हो जाता है|
2014 तक सभी राजनीतिक दलों को सभी उद्योगपति और कॉरपोरेट घराने कैश में ब्लैक मनी देते थे| राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले फंड में काले धन के मुकाबले चैक से मिलने वाले सफेद धन की मात्रा बहुत कम होती है| पिछले दिनों जब सुप्रीमकोर्ट ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक ठहरा कर बंद किया तो खुलासा हुआ कि सत्ताधारी राजनीतिक दल भाजपा को विपक्षी दल कांग्रेस से पांच गुना ज्यादा चंदा मिला था| इलेक्टोरल बॉन्ड काले धन को खत्म करने का एक उपाय था, क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल को इस माध्यम से मिलने वाला चंदा बैंक के माध्यम से मिल रहा था, जो उनकी आयकर रिटर्न में भी होता|
जब इलेक्टोरल बॉन्ड बंद किए गए तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि 90 के दशक में जब भाजपा ने तय किया कि वह कैश में चंदा नहीं लेगी, तो उनके बैंक खाते खाली हो गए थे| राजनीति में काले धन का कितना इस्तेमाल होता है, उसका एक उदाहरण 2013 में तब मिला जब दिल्ली विधानसभा के चुनावों के वक्त एक अखबार ने कैश लेकर राजनीतिक दलों का विज्ञापन छापना बंद कर दिया था, तो कांग्रेस पार्टी ने उस अखबार को विज्ञापन ही नहीं दिया|
कोई भी राजनीतिक दल नहीं चाहता कि उन्हें मिलने वाले चंदे को आरटीआई के दायरे में लाया जाए| जब जब राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की मांग उठी थी, सारे राजनीतिक दलों ने इकट्ठे होकर उसका विरोध किया, लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड पर विपक्षी दल पारदर्शिता की मांग करने लगे, क्योंकि उनका चंदा घट गया था और सत्ताधारी दल का बढ़ गया था|
सवाल यह है कि कोई उम्मीदवार अपने चुनाव पर करोड़ों रूपए खर्च क्यों करता है| कोई राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए करोड़ों रूपए खर्च क्यों करता है| कोई उद्योगपति और कॉरपोरेट घराना किसी राजनीतिक दल को करोड़ों रूपए का चंदा क्यों देता है| साफ़ है कि जो करोड़ों खर्च करेगा, चुनाव जीतने के बाद उसकी भरपायी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कहीं न कहीं नुकसान पहुंचा कर ही करेगा|
यहीं से पक्षपात और घपले-घोटालों की शुरुआत होती है, जो लगातार लोकतंत्र को कमजोर करती जा रही है| लोकतंत्र के लिए समस्या गंभीर है, लेकिन सरकारों और राजनीतिक दलों को समाधान खोजने की चिंता इसलिए नहीं है, क्योंकि उनकी मोटी कमाई इसी व्यवस्था से हो रही है| चुनावों में धनबल पर लगाम कसने के लिए चुनाव आयोग ने कई कोशिशें की हैं, लेकिन फिर भी हर चुनाव में करोड़ों रूपए की नकदी बरामद की जाती है| वह भी आटे में नमक जितना भी नहीं होता। उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के बीच एक तरह से यह चूहे-बिल्ली का खेल चलता रहता है, और चुनावों में धन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications