क्या धार्मिक ध्रुवीकरण से दूसरे चरण में बढ़ेगा मतदान?
Second Round Voting: 26 अप्रैल, 2024 को लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान में केरल की 20 सीटों, कर्नाटक की 14 सीटों, राजस्थान की 13 सीटों, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की 8 सीटों, मध्य प्रदेश की 6 सीटों, असम और बिहार की 5 सीटों, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की 3 सीटों, जम्मू, मणिपुर और त्रिपुरा की 1-1 सीट सहित कुल 89 सीटों पर जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी।
मतदान के इस दूसरे चरण में कई राजनीतिक दिग्गजों की किस्मत ईवीएम में बंद हो जाएगी। इस चरण में केरल के वायनाड से कांग्रेस के राहुल गांधी, लेफ्ट की एनी राजा और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के. सुरेंद्रन, तिरुअनंतपुरम से कांग्रेस के शशि थरूर और भाजपा से केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर, छत्तीसगढ़ की राजनांदगांव लोकसभा सीट से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, उत्तर प्रदेश की मेरठ लोकसभा सीट से 'रामायण के राम' अरुण गोविल, मथुरा से 'ड्रीमगर्ल' हेमा मालिनी और अमरोहा से दानिश अली, कोटा से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, जालोर से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत, पूर्णिया से निर्दलीय पप्पू यादव, सतना से गणेश सिंह की साख दांव पर है।

पहले चरण में 2019 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले हुए कम मतदान ने सत्ताधारी दल सहित विपक्ष को भी पशोपेश में डाल दिया है। मतदाताओं की उदासीनता और सियासी चुप्पी ने नेताओं को परेशान किया हुआ है। घटे हुए मत प्रतिशत को देखते हुए कोई भी यह दावे से नहीं कह पा रहा कि जो मत पड़ा, वह किसके फेवर में आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब अपनी हर चुनावी सभा में मतदान करने का आग्रह करते देखा-सुना जा सकता है।
वर्तमान में स्थिति यह है कि मतदाता चुनाव के मुद्दों पर रुचि प्रदर्शित ही नहीं कर रहा है। हालांकि पहले चरण के मतदान के बाद अप्रत्याशित रूप से नरेंद्र मोदी ने जिस प्रकार मुस्लिम समुदाय को लेकर बयानबाजी की है, वह कहीं न कहीं हिंदू मतदाताओं को लामबंद करने की जद्दोजहद है। यह पहली बार है जबकि नरेंद्र मोदी ने सीधे तौर पर मुस्लिम समुदाय को लेकर बयानबाजी की है। इससे पहले गुजरात में और बाद में प्रधानमंत्री बनने के पश्चात भी वे सीधे तौर पर 'मुस्लिम' नाम लेने से बचते थे और कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति के बहाने चुनावी तीर चलाते थे। इसके अलावा कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र की मीमांसा प्रधानमंत्री जिस प्रकार करने लगे हैं, वह दोधारी तलवार पर चलने जैसा है।
दरअसल, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव से इतर इस बार का लोकसभा चुनाव आम जनमानस के मुद्दों पर लड़ा जाना चाहिए था क्योंकि हिंदुत्व के जितने भी मुद्दे भाजपा उठाती थी, वे या तो पूरे हो चुके हैं अथवा उनकी राह में आगे बढ़ा गया है। इस बार महंगाई, शिक्षा, रोजगार जैसे मुद्दे अहम हैं और यदि इन मुद्दों पर चुनाव हो, तो 10 वर्षों के भाजपा शासनकाल को अपना 'स्कोरकार्ड' जनता के समक्ष पेश करना ही पड़ेगा।
यह सच है कि महंगाई आज मध्यमवर्ग की कमर तोड़ रही है। उच्च वर्ग को संभवतः इससे फर्क नहीं पड़ता और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए सरकार की कुछ योजनाएं चलती रहती हैं। वैसे भी वह सुविधाओं की उस दौड़ में शामिल ही नहीं होता जिसे बाजार से खरीदना पड़े इसलिए रोजमर्रा की जिन्दगी चलाने से अधिक उसका कोई लक्ष्य ही नहीं होता कि मंहगाई की मार उस पर पड़े।
रोजगार को लेकर भी युवा वर्ग में वर्तमान सरकार के प्रति गुस्सा है। अग्निवीर जैसी योजना से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब के युवा अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं वहीं पेपर लीक की घटनाओं ने देशभर में युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ किया है और सरकार असहाय है।
इन जनहितैषी मुद्दों पर सत्ताधारी भाजपा कहीं न कहीं कमजोर पड़ रही है और उसे एहसास है कि जनता भी इससे अछूती नहीं है इसलिए पार्टी और उसके कर्णधार पुनः उन्हीं मुद्दों पर वापस आ रहे हैं, जो उनकी पहचान हैं। अब इनमें यह तय करना मुश्किल है कि मतदाता इन मुद्दों को कैसे लेता है?
भाजपा का मुस्लिम तुष्टिकरण का मुद्दा कर्नाटक विधानसभा चुनाव में नहीं चला और उसे अपनी सरकार गंवानी पड़ी। यही हाल तेलंगाना में हुआ। हिमाचल प्रदेश में अग्निवीर योजना के कारण भाजपा को सत्ता गवानी पड़ी। हालांकि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में वोटिंग पैटर्न बहुत अलग होता है किंतु बेसिक मुद्दों के चलते जनता उसी को वोट करेगी, जो उसे शिक्षा-रोजगार और महंगाई के संकट से मुक्ति दिलाने का 'प्लान' देगा।
दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश की जिन 8 सीटों पर मतदान होना है, वे भाजपा के लिए बहुत अहम हैं क्योंकि इस बार भाजपा-रालोद गठबंधन के चलते दोनों की साख दांव पर है। मुस्लिम बहुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस हिस्से में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने वोटों के बिखराव को रोकने के लिए मुस्लिम प्रत्याशियों के बजाए जातिगत समीकरणों के हिसाब से प्रत्याशी उतारे हैं जबकि बसपा ने कई सीटों पर ऐसे प्रत्याशी उतारे हैं जो भाजपा के वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
केरल की 20 सीटों में से 3 सीटों तिरुअनंतपुरम, त्रिशूर और पथानमथिट्टा में भाजपा को कमल खिलने की आस है जबकि कर्नाटक की 14 लोकसभा सीटों पर असली लड़ाई मोदी और राज्य की कांग्रेस सरकार की गारंटियों के बीच है। असम में भाजपा पांचों सीटों पर जीत के दावे कर रही है तो मध्य प्रदेश में सतना सीट पर ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है। बिहार में पप्पू यादव ने सभी को चौंकाया है तो किशनगंज में कांग्रेस बेहद मजबूत है। इस चरण में महाराष्ट्र में भाजपा में शामिल होकर राज्यसभा सांसद बने अशोक चव्हाण की साख नांदेड में दांव पर है तो अमरावती में शरद पवार की सियासी ताकत का भी इम्तिहान है। पश्चिम बंगाल की तीन सीटों पर भाजपा अभी तो अजेय दिख रही है।
देखा जाए तो नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के ऐसे युग में हैं जहां उनके समकक्ष कोई राजनेता नहीं ठहर पा रहा। 1990 से 2000 के दशक में जिन्होंने खिचड़ी सरकारों की आपसी बंदरबांट को देखा है, वे यकीनन स्थाई सरकार के लिए मतदान करेंगे जिसका एकमेव चेहरा नरेंद्र मोदी हैं किंतु जिन मतदाताओं ने वह दौर ही नहीं देखा, उनके मतदान का पैटर्न उनके मुद्दों के हिसाब से होगा।
हां, राष्ट्रवाद, राम मंदिर, मुस्लिम तुष्टिकरण जैसे मुद्दे वर्तमान राजनीति में सदाबहार हो चुके हैं तो इनका अपना प्रभाव होगा किंतु प्रश्न वही है कि कितना? यदि आम चुनाव फरवरी माह में होते तो निश्चित रूप से भाजपा 400 पार के अपने नारे को चरितार्थ कर लेती क्योंकि पूरा देश 'राममय' हो चुका था। अब राम मंदिर का मुद्दा आम मतदाताओं को कितना उद्वेलित करेगा, इसकी व्याख्या चुनाव परिणाम आने के बाद होगी।
अंत में, जहां तक बात है कम मत प्रतिशत की तो यह भी सत्य है कि भाजपा ने अभी तक जो 450 प्रत्याशी घोषित किए हैं, जिनमें से 116 प्रत्याशी बाहरी हैं अर्थात दलबदलू हैं। इनके भाजपा में आने से उसके पुराने कार्यकर्ता अपने भविष्य को लेकर आशंकित है और गुटबाजी के चलते बेमन से चुनाव में लगे हैं जबकि कांग्रेस में मची भगदड़ ने आतंरिक गुटबाजी को कम किया है।
अब दोनों दलों के जमीनी कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्र के कितने मतदाताओं को घर से निकालने और अपने पक्ष में वोट डलवाने में कामयाब होते हैं, इस पर भी इस चरण के मत प्रतिशत बढ़ने का दारोमदार है। फिलहाल तो 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले चरण ने राजनीतिक पंडितों को चौंका ही दिया है। देखना यह होगा कि आगे क्या मतदाताओं में कोई उत्साह आता है या फिर यह आमचुनाव ऐसे ही बीत जाता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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