वोटिंग घटने से सीटें बढ़ने के सपने देख रहा विपक्ष
Voting Percent: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा है कि इंडी एलायंस के पक्ष में अंडर करंट है, इसलिए मोदी सरकार जा रही है| मल्लिकार्जुन खड़गे से ज्यादा आत्मविश्वास इंडी एलायंस की दूसरी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल को है, जिन्होंने कहा है कि दिल्ली में इंडी एलायंस सातों सीटें जीत रहा है और केंद्र में एलायंस की सरकार बनने जा रही है|
राहुल गांधी ने अभी तक अरविन्द केजरीवाल के साथ मंच साझा करने से परहेज किया है, क्योंकि अंदर ही अंदर कशमकश चल रही है कि अगर 2004 वाली स्थिति पैदा हुई तो दोनों प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं| हालांकि आम आदमी पार्टी सिर्फ 22 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन अरविन्द केजरीवाल की उड़ानें बहुत ऊंची है| उन्हें उम्मीद है कि कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा साठ सीटों पर अटक जाएगी और तब केजरीवाल क्षेत्रीय दलों से समर्थन हासिल कर लेंगे| इसलिए उन्होंने इंडी एलायंस से विचार विमर्श किए बिना ही पूरे देश में मुफ्त बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य का एलान कर दिया|

असल में पहले दौर की कम वोटिंग के बाद से विपक्ष 2004 जैसे नतीजों के सपने देख कर बैठा है| 1999 के मुकाबले 2004 में 1.92 प्रतिशत वोटिंग कम हुई थी| इस बार भी करीब डेढ़ से दो प्रतिशत वोटिंग कम हो सकती है| हालांकि नतीजों के वक्त पता चला था कि वोटिंग भाजपा और कांग्रेस दोनों के पक्ष में कम हुई थी| भाजपा की वोटिंग 1999 के मुकाबले 1.59 प्रतिशत घटकर 22.16 प्रतिशत रह गई थी, जबकि कांग्रेस की वोटिंग 1.77 प्रतिशत घट कर 26.53 प्रतिशत रह गई थी। लेकिन चुनाव में भाजपा की सीटें 182 से घटकर 138 हो गई थी और कांग्रेस की सीटें 114 से बढ़कर 145 हो गई थी|
2004 में कांग्रेस की सीटें भाजपा के मुकाबले सिर्फ सात ज्यादा थी। ऐसा नहीं था कि भाजपा सरकार नहीं बना सकती थी, लेकिन भाजपा के खिलाफ बात यह गई थी कि उसके गठबंधन के सहयोगी दल भी बुरी तरह हार गए थे, जबकि भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दलों के निर्वाचित सांसदों की संख्या में वृद्धि हो गई थी| उन सबने चुनाव बाद गठबंधन करके कांग्रेस की सरकार बनवा दी थी|

मल्लिकार्जुन खड़गे, अरविन्द केजरीवाल, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी वैसी ही स्थिति की कल्पना कर रहे हैं| लेकिन सवाल यह है कि वोटिंग कहाँ घट रही है, जिसका चुनाव परिणामों पर असर होगा| भाजपा विरोध वाले दो राज्यों केरल और तमिलनाडु में वोटिंग घटी है, तो उसका भाजपा पर कोई असर होने की संभावना नाममात्र भी नहीं है, जबकि तमिलनाडु में वोटिंग घटने का तो भाजपा समर्थक स्थानीय गठबंधन को फायदा और सत्ताधारी द्रमुक गठबंधन को नुकसान हो सकता है|
राजस्थान में वोटिंग घटी है, तो वहां जरुर भाजपा को ही नुकसान होने का अनुमान ज्यादा है| जिसका चुनाव नतीजों पर असर पड़ता है तो भाजपा दो से लेकर छह तक सीटें हार सकती है| पहले और दूसरे दौर की वोटिंग में मध्यप्रदेश की भी 13 सीटों पर चुनाव हो चुका था, जो सभी 2019 में भाजपा ने जीती थीं| मध्यप्रदेश में पहले दो दौर की वोटिंग में 2019 के मुकाबले 8 प्रतिशत वोटिंग कम हुई थी| उत्तर प्रदेश की पहले और दूसरे दौर की 16 सीटों में से 6 विपक्ष के पास और दस भाजपा के पास थी|
लेकिन जैसे जैसे वोटिंग आगे बढी है पहले चरण की वोटिंग के बाद स्थिति सुधरती चली गई है| पहले दौर में 3.82 प्रतिशत, दूसरे दौर में 2.72 प्रतिशत वोटिंग कम हुई थी| इन दोनों दौर में जिन 190 सीटों पर चुनाव हुए थे, उनमें से 98 सीटें भाजपा के पास थीं| इसलिए इन दो दौर के चुनावों में भाजपा की सीटें 8 से दस तक घट जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा|
भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीसरा दौर था, जिसकी 94 सीटों में से 72 भाजपा की थी| अगर तीसरे दौर में भी पहले और दूसरे दौर की तरह ही तीन प्रतिशत के आसपास वोटिंग घटती तो भाजपा के लिए मुश्किल होती| लेकिन नरेंद्र मोदी ने प्रचार की रणनीति बदल कर अपने कार्यकाल के दौरान हुई उपलब्धियों पर ज्यादा जोर देने के बजाए विपक्ष के मुस्लिम परस्त होने, भ्रष्टाचारी होने और परिवारवादी होने के एजेंडे पर प्रचार शुरू कर दिया| जिसने निरुत्साहित भाजपा वर्कर और भाजपा के कोर वोटर में उत्साह भर दिया|
नतीजतन घोर गर्मी के बावजूद तीसरे दौर की 94 सीटों पर हुई वोटिंग में सुधार हुआ और 2019 के मुकाबले सिर्फ 1.21 प्रतिशत वोटिंग कम हुई| चौथे और पांचवें दौर में जब सौ फीसदी भाजपा के प्रभाव वाला इलाका आया तो वोटिंग बढ़ गई है| चौथे दौर में 0.04 प्रतिशत और पांचवें दौर की फाइनल वोटिंग (62.20 प्रतिशत) 2019 के मुकाबले 0.38 प्रतिशत ज्यादा है, 2019 में 61.82 प्रतिशत वोटिंग हुई थी|
अब सिर्फ दो दौर और 115 सीटों पर वोटिंग बची है, जिनमें से 59 सीटें पिछली बार भाजपा जीती थी| भाजपा ने चौथे दौर की वोटिंग के बाद ही कह दिया था कि उसे 270 सीटें हासिल हो चुकी हैं| यह वोटरों पर उसी तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति है, जैसे 370 और 400 पार का माहौल बनाया गया था और समूचा विपक्ष पूरे चुनाव में 400 पार के जुमले में ही अटक कर रह गया|
यह भाजपा भी जानती है कि उसके लिए 370 सीटें हासिल करना और एनडीए का 400 सीटें हासिल करना बहुत कठिन है| लेकिन इस जुमले ने निश्चित तौर पर काम किया है, भाजपा कम से कम 2019 वाली स्थिति पर बने रहने की उम्मीद में है, जैसे 1999 में भी 1998 की तरह 182 सीटें हासिल कर ली थीं|
विपक्ष वोटिंग घटने से लाभ मिलने की गलतफहमी का शिकार हो गया है, हर बार जरूरी नहीं होता कि वोटिंग घटने से सीटें घटती हैं| 2004 में ही कांग्रेस की वोटिंग 1.77 प्रतिशत घट गई थी, जबकि उसकी सीटें 31 बढ़ गई थी| वैसे भी 2019 की 67.40 प्रतिशत वोटिंग के मुकाबले अब तक 66.95 प्रतिशत वोटिंग हो चुकी है और उम्मीद है कि बाकी बची 115 सीटों पर वोटिंग के बाद 0.45 प्रतिशत की जो कमी दिख रही है, वह भी पूरी हो जाएगी और वोटिंग का अंतिम आंकडा 67.40 प्रतिशत ही होगा|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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