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Poverty: भारत की सीमित अमीरी में असीमित गरीबी की मिलावट

नीति आयोग के आंकड़ों के आधार पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2024-25 के लिए अंतरिम बजट पेश करते हुए दावा किया कि सरकार की रणनीतिक कार्रवाई, नवाचार, स्थिरता और समावेशिता के जरिए पिछले 9 वर्षों में भारत में करीब 25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी के दुष्चक्र से बाहर आ गए हैं।

poverty in india

संसद सत्र शुरु होते समय महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी इसे प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। नीति आयोग के अनुसार, भारत में बहुआयामी गरीबी 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत हो गई, इस अवधि के दौरान लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी के दायरे से बाहर निकल गए।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, राजस्थान में गरीबों की संख्या तेजी से घट रही है। गरीबी बढ़ने की रफ्तार 47 से घटकर अब 44% रह गई है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसे बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रहा है।

राजनीतिक व्यवस्था कोई भी हो उसका लक्ष्य अपने नागरिकों की भलाई सुनिश्चित करना होता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि उदारीकरण के बाद विकास की प्रक्रिया में तेजी आने से गरीबों की तादाद लगातार कम होती रही है। लेकिन जनवरी 2023 में आई ऑक्सफैम की रिपोर्ट कुछ और ही हकीकत बयां कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक इस समय पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब भारत में है जिनमें लगभग 23 करोड़ लोग तो असहनीय गरीबी में जी रहे हैं, जबकि इस बीच में अरबपतियों की संख्या में 63 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

एक साथ गरीबी बढने और अमीरों की संख्या भी बढ़ने का यह विषम अनुपात क्या अचरज की बात नहीं है? विश्व बैंक की 'पॉवर्टी एंड शेयर्ड प्रोस्पेरिटी-2022' रपट के मुताबिक बीते 2 वर्षों में देश के लगभग 6 करोड़ लोग निम्न मध्य वर्ग की हैसियत से फिसल कर गरीबी रेखा के नीचे पहुंच गए हैं। दुनिया भर में जो गरीबों की कुल संख्या 7.1 करोड़ बढ़ी है, उनमें से 80 प्रतिशत तो अकेले भारत के हैं। भारत की विषमता पूर्ण अर्थव्यवस्था का आंकलन करने वाली 'विश्व असमानता रिपोर्ट' के मुताबिक देश के कमजोर, वंचित परिवारों की नई पीढ़ी का भविष्य अधिक असुरक्षित होता जा रहा है। राष्ट्रीय आय का 57 प्रतिशत हिस्सा 10% बड़े लोग हजम कर रहे हैं।

कुपोषित बच्चों के मामले में भारत दुनिया में निचले पायदान पर है, और एक तरह से अत्यंत गरीब अफ्रीकी देशों के साथ होड़ कर रहा है। वैश्विक भूख सूचकांक के मुताबिक कम वजन के बच्चों के मामले में भारत की गिनती बहुत निचले स्थान पर है। यहां भी यह सवाल खड़ा होता है कि सरकारी आंकड़ों को सही मानें तो एक तरफ जहां सरकारी आंकड़ों में गरीबों की संख्या घट रही है वहीं दूसरी तरफ कुपोषित बच्चों की संख्या कैसे बढ़ रही है?

इसी तरह अगर भारत में बेरोजगारी के पिछले 10 वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो इसे दूर करने संबंधी प्रयास निराशाजनक ही नजर आते हैं। 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2023' की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2019 के बाद से सरकारी संगठनों और नियमित मान्य वेतन की नौकरियों का सृजन बहुत धीमी गति से हुआ है।

नेशनल इंस्टीट्यूशन रैंकिंग फ्रेमवर्क की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में प्रतिवर्ष 50 लाख युवा उच्च शिक्षा की ओर रुख करते हैं जिनकी उम्र लगभग 19-20 वर्ष होती है। ये युवा अपनी स्नातक की पढ़ाई लगभग 24 वर्ष की उम्र तक पूरी कर लेते हैं। जबकि भारत में 25 वर्ष से कम उम्र के स्नातक स्तर पर 42% और परा स्नातक स्तर पर 23 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी तथा ब्लूमबर्ग के नवीनतम अध्ययन में देश में कुल बेरोजगारी दर 7.95 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई गई है।

मालूम हो कि वर्ष 2014 में बेरोजगारी की दर 5.44 प्रतिशत थी जो 2020 में 8% और वर्ष 2023 में 10.01% तक पहुंच गई। श्रम बल की भागीदारी लगभग 46% है यानी कुल कामकाजी आयु वर्ग के प्रत्येक सौ भारतीयों में से 54 तो श्रम बल में भागीदार ही नहीं है। वर्ष 2018-19 में नियमित वेतन भोगी कर्मचारियों का हिस्सा 24 प्रतिशत था जो वर्तमान में अब घटकर 20% रह गया है।

हालांकि आंकड़ों को लेकर हमारे देश में हमेशा विमर्श होता रहा है। कई बार तो ऐसा लगता है कि कहीं ना कहीं झोल है। लेकिन इन आंकड़ों को बारीकी से देखें तो पता चलता है कि सब नापने के तरीकों का मामला है। गरीबी नापने के तरीके समय-समय पर बदलते रहते हैं। याद कीजिए, नए आर्थिक सुधारों के शिल्पकार नरसिंह राव के प्रधानमंत्री के दौर को, जब योजना आयोग ने गरीबी के आंकलन को एकदम घटा दिया था। उस दौर में गरीबों की तादाद 37 प्रतिशत से घटाकर 19 प्रतिशत घोषित की गई थी। फिर सवाल उठता है कि नापने के तरीकों में हेर फेर करके गरीबों की संख्या को क्यों और कैसे कम दिखाया जा सकता है?

पिछले 30 वर्षों में देश में गरीबी रेखा को परिभाषित करने को लेकर कई सारे आंकलनों से हम गुजरे हैं। कुछ साल पहले तेंदुलकर कमेटी ने बताया कि भारत की 37% आबादी गरीबी में जी रही है। इसके पहले अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी ने बताया था कि भारत की 77% आबादी प्रतिदिन ₹20 से अधिक खर्च नहीं कर पाती।

सरकार द्वारा ही गठित एनसी सक्सेना कमेटी ने बताया कि गरीबों की तादाद 50% है। सक्सेना कमेटी ने गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को जानने के लिए नए पैमाने प्रस्तावित किए थे- औसत प्रति व्यक्ति खर्च जो शहरों में ₹1000 प्रति माह और गांव में ₹700 प्रतिमाह या पक्के मकान या दो पहिया वाहन या ट्रैक्टर जैसे संसाधन की मालकियत। तब की सरकार सक्सेना कमेटी के निष्कर्षो से चिंतित हो उठी थी। तब योजना आयोग को सक्सेना कमेटी को लिखना पड़ा था कि अगर गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या 50% कहेंगे तो हमें उन सभी के लिए अनुदान का इंतजाम करना पड़ेगा।

आंकड़ों में दावे चाहे जो भी किये जा रहे हों पर देश में बसावटों का जनतांत्रिक ढांचा गांव और शहर दो इकाइयों में विभाजित है, जिनके बीच अपनी आधारभूत संरचनाओं में भारी अंतर और हठधर्मी योजनाओं, आर्थिक उपक्रमों में अदूरदर्शिता के चलते असमानता बढ़ती जा रही है। विस्थापन के लिए अभिशप्त गांव के गांव उजाड़ होते जा रहे हैं। आर्थिक अभाव के चलते शिशु मृत्यु दर घटने की बजाय लगातार बढ़ रही है।

एक ओर अपरिमित विकास के दावे हैं तो दूसरी ओर निम्न आय वाले परिवारों के ज्यादातर बच्चे आज भी पढ़ाई के लिए जरूरी तकनीकी माध्यमों से वंचित हैं। एक तरफ कर्मचारियों की तनख्वाह में 3.19 प्रतिशत की कटौती हुई है वहीं सीईओ के वेतन में 9% तक का इजाफा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की अर्थव्यवस्था अन्य देशों की तुलना में ज्यादा तेज गति के साथ आगे बढ़ रही है। लेकिन हमें ठहर कर यह भी देखना होगा कि अपनी आर्थिक वृद्धि पर इतराते भारत में गरीबी भी बढ़ रही है, बेरोजगारी भी बढ़ रही है, असमानता भी बढ़ रही है तथा इन सबों से जुड़कर भूखे लोगों की तादाद भी बढ़ रही है।

भले ही गिनती के तरीकों में उलट फेर करके अच्छा-अच्छा दिखाने-बताने की कोशिश की जाए लेकिन सच्चाई यह भी है कि देश में 83 करोड़ लोगों को मुफ्त सरकारी राशन वितरित किया जा रहा है। इसीलिए कभी हमारी समृद्ध संस्कृति के प्रतीक रहे गांवों में गरीबी घटने के दावों पर विश्वास करना मुश्किल ही नहीं, अमीरी में गरीबी की मिलावट जैसा लगने लगता है।

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