Katchatheevu Island: स्टालिन ने गांधी परिवार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया
Katchatheevu Island: तमिलनाडु में भाजपा के सहयोगी दल अन्ना द्रमुक के लिए एक स्वर्णिम अवसर आया है, जब वह मुख्यमंत्री एम के स्टालिन और द्रमुक के खिलाफ वातावरण बना सकता है| एक पुराने मुद्दे में गांधी परिवार को सवालों के घेरे में खड़ा करके यह अवसर खुद स्टालिन ने उपलब्ध कवाया है| श्रीलंका के राष्ट्रपति 20 और 21 जुलाई को दो दिवसीय भारत यात्रा पर थे| इसी दौरान मुख्यमंत्री स्टालिन ने डीएमके के सभी सांसदों से कहा कि वे प्रधानमंत्री से मुलाक़ात करके उन पर दबाव बनाएं कि वह श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे से कच्चातीवु द्वीप वापस लेने के मुद्दे पर बात करें|
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के बीच अनेक मुद्दों पर बात हुई। रानिल विक्रमसिंघे की भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार अजीत डोभाल से भी लंबी बातचीत हुई| इस बातचीत में भारतीय मछुआरों की सुरक्षा का सवाल तो जरुर उठाया गया, लेकिन कच्चातीवु द्वीप वापस लेने पर कोई बात नहीं हुई| तमिलनाडू के मुख्यमंत्री स्टालिन इस द्वीप को वापस लेने का मुद्दा उठा रहे हैं। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1974 में यह द्वीप श्रीलंका को उस समय उपहार स्वरूप दे दिया था, जब स्टालिन के पिता एम. करुणानिधि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थे| उस समय एम. करुणानिधि ने श्रीलंका को कच्चातीवु द्वीप देने का उस ढंग से विरोध नहीं किया था, जैसे उन्हें करना चाहिए था| बाद में जयललिता ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में कच्चातीवु द्वीप को मुख्य राजनीतिक मुद्दा बना लिया था|

वैसे तो कच्चातीवु पिछले सौ साल से श्रीलंका और भारत में विवाद का विषय रहा था, लेकिन 1974 में इंदिरा गांधी ने एक समझौते के तहत उसे श्रीलंका को सौंप दिया| उस समझौते की संसद ने कोई पुष्टि नहीं की थी, जिस पर सवाल उठता है कि इंदिरा गांधी को यह अधिकार किसने दिया था कि वह भारत की जमीन का एक टुकड़ा किसी अन्य देश को उपहार स्वरूप दे दे| यह सवाल सिर्फ आज नहीं उठ रहा, बल्कि पिछले तीस पैंतीस साल से उठ रहा है| संसद में करीब हर साल यह मुद्दा उठता रहा है, लेकिन अब जबकि मुख्यमंत्री स्टालिन ने यह मुद्दा उठाया, और वह कांग्रेस की रहनुमाई में नए बने इंडिया नामक राष्ट्रीय गठबंधन का हिस्सा हैं, और पहले यूपीए का भी हिस्सा थे, तो इस मुद्दे पर गठबंधन का स्टैंड भी पूछा जाएगा| गांधी परिवार सदस्यों की इस मुद्दे पर क्या राय है, क्या वे इंदिरा गांधी की ओर से किए गए अवैध समझौते का समर्थन करते हैं, या विरोध करते हैं|

अब जबकि सुप्रीमकोर्ट देश से जुड़े हर मुद्दे पर प्रो-एक्टिव हो कर फैसले सुना रही है| बिना याचिका मामले अपने हाथ में ले रही है, जैसे मणिपुर का मुद्दा अपने आप ही अपने हाथ में लिया है| जब सुप्रीमकोर्ट 2019 में संसद से पारित 370 हटाने के प्रस्ताव पर भी सुनवाई कर रही है, और दो महीने पहले जारी हुए सरकार के अध्यादेशों पर भी सुनवाई कर रही है| सुनवाई से पहले ही सरकार के अधिकार पर सवालिया निशान लगा रही है, तो क्या उसे कच्चातीवु पर लंबित याचिकाओं पर सुनवाई करके फैसला नहीं करना चाहिए| जबकि भारत का एक महत्वपूर्ण भूभाग किसी अन्य देश को देने की संसद से मंजूरी भी नहीं ली गई थी, तमिलनाडु सरकार और तमिलनाडु विधानसभा से अनुमति नहीं ली गई थी|
1991 में जब अनाद्रमुक की जे. जयललिता मुख्यमंत्री बनी, तो उन्होंने तमिलनाडु विधानसभा में इस द्वीप को वापस लेने के लिए प्रस्ताव पास करवाया| 2008 में मुख्यमंत्री जयललिता इस मसले को सुप्रीम कोर्ट ले गई, बाद में 2013 में करुणानिधि भी इस मसले को सुप्रीमकोर्ट ले गए, लेकिन सुप्रीमकोर्ट लंबी तान कर सोया हुआ है| दोनों याचिकाओं में इंदिरा गांधी की ओर से कच्चातीवु द्वीप श्रीलंका को गिफ्ट में दिए जाने को असंवैधानिक करार देने की मांग है| दोनों बार कांग्रेस सरकारों ने सुप्रीमकोर्ट में हल्फिया बयान देकर कहा कि यह दोनों देशों के बीच समझौता है|
केंद्र सरकार के इस हल्फिया बयान का संसद में दोनों तमिल दल विरोध करते रहे हैं| अन्ना द्रमुक तब से इस मुद्दे को लगातार संसद में उठाती रही है| 2014 में मामला मद्रास हाई कोर्ट में भी गया था| जहां विदेश मंत्रालय ने हलफनामा दिया कि मामला सुलझ चुका है और श्रीलंकाई जलक्षेत्र में जाने का भारतीय मछुआरों को कोई हक नहीं है| इस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिठ्ठी लिखकर फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था| पिछले साल भी संसद में यह मुद्दा उठाते हुए अन्ना द्रमुक के सांसद थंबीदुरै ने कहा कि कच्चातीवु द्वीप में मछली पकड़ना तमिलनाडु के मछुआरों का परंपरागत अधिकार है, लेकिन इंदिरा गांधी के असंवैधानिक समझौते की वजह से उनके इस अधिकार का हनन हो रहा है|
कच्चातीवु भारतीय रामेश्वर से उत्तरपूर्व की दिशा में करीब 10 मील की दूरी पर 285 एकड़ का निर्जन द्वीप है| 14वीं शताब्दी में ज्वालामुखी विस्फोट के कारण यह द्वीप बना था| कच्चातीवु द्वीप रामनाथपुरम के राजा के अधीन हुआ करता था और बाद में मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा बना| भारत और श्रीलंका पर ब्रिटिश शासन के दौरान दोनों देशों के मछुआरे संयुक्त रूप से इसका इस्तेमाल करते थे|
ब्रिटिश शासनकाल में वहां एक चर्च बना दिया गया, शायद अंग्रेज दोनों देशों के बीच इस द्वीप को ईसाई जमीन के तौर पर स्थापित करना चाहते थे, लेकिन वहां पीने का पानी ही उपलब्ध नहीं है| अब चर्च में साल में एक बार धार्मिक आयोजन होता है, जिसमें दोनों देशों के ईसाई पहुंचते हैं। रामेश्वरम के भारतीय ईसाई वहां बिना वीजा के जाते हैं| 1921 में भारत और श्रीलंका दोनों ने मछली पकड़ने के लिए इस भूमि पर अपना-अपना दावा किया, लेकिन विवाद अनसुलझा रहा|
आजादी के समय यह क्षेत्र भारत को मिला था, लेकिन 26 जून 1974 को इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में श्रीलंका की राष्ट्रपति सिरिमाओ भंडारनायके से साथ हुए एक समझौते के तहत यह क्षेत्र श्रीलंका को दे दिया, तब समझौते में कहा गया था कि भारत के मछुआरे यहां मछली तो नहीं पकड़ सकते, लेकिन अपना जाल सुखाने और आराम करने के लिए इस द्वीप का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन 1976 में जब अन्तरराष्ट्रीय समुद्री सीमा तय हुई तो श्रीलंका ने 1974 के समझौते का फायदा उठाया| समुद्री क्षेत्र भी पूरी तरह श्रीलंका के अधिकार में आ गया|
1977 में जब पहली बार अनाद्रमुक के एम.जी. रामचन्द्रन मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने विधानसभा में इंदिरा गांधी के समझौते का कड़ा विरोध किया| हालांकि भारतीय मछुआरे बेहतर क्षेत्र की खोज में श्रीलंका के जलक्षेत्र में जाते रहे| दस पन्द्रह साल तक कोई बड़ी समस्या खडी नहीं हुई, लेकिन 90 के दशक में समस्या तब गंभीर होने लगी जब भारतीय उपमहाद्वीप क्षेत्र में मछली और जलीय जीवन कम होने लगा| श्रीलंका की सेना आए दिन भारतीय मछुआरों को गिरफ्तार करने लगी| तब से तमिलनाडु में यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है| तमिलनाडु के मछुआरों के लिए यह समझौता इंदिरा गांधी का बड़ा ब्लंडर साबित हुआ है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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